विचार / लेख
कनुप्रिया
सरकार अनाज दे देती है, सिलेंडर भी दे देती है, झोपड़पट्टी डाल लेते हैं, खर्चा ही क्या है गरीब लोगों का। देश की जीडीपी देखिये, टमाटर ही तो थोड़ा महँगा हुआ है, बाकी कहाँ है महँगाई।
अक्सर ये तर्क मोदी समर्थकों से सुन लेती हूँ, वो लोग ये तर्क देते हैं जो खुद बढिय़ा सरकारी नौकरी में हैं, या पुश्तैनी बिजनेस है या अच्छी कॉरपोरेट जॉब है, बच्चे लाखों की फीस देकर बढिय़ा स्कूल-कॉलेज में हैं, अच्छे मकान और 2-4 प्रॉपर्टीज हैं, महँगी कारें खरीद सकते हैं और विदेश जाना not a big deal ।
गरीब और निम्न वर्गीय लोग शायद उनके लिये भेड़-बकरी हैं जिन्हें बस खाने को आटा और चावल चाहिये, हगने की सुविधा भी न हो तो चलेगा। कोई सरकार बिजली-पानी मुफ्त दे दे तो बड़े लोगों के पेट में ऐंठन होने लगती है कि देखो रेवडिय़ाँ बंट रही हैं। महिलाओं को फ्री मेट्रो टिकट देने पर अच्छे-अच्छे प्रगतिशील लोगों के माथे पर बल पड़ गए थे।
अच्छी शिक्षा की उन्हें जरूरत नहीं, सरकारी स्कूल खस्ताहाल हों तो हों। न अच्छी चिकित्सा की जरूरत है, राजस्थान सरकार right to health bill लाई तब भी उन्हीं लोगों ने सबसे अधिक विरोध किया जो महँगे अस्पताल अफोर्ड कर सकते हैं।
जो अपने घर गाँवों में रहते हैं उनके पास शायद पुश्तैनी छत हो वरना बड़े शहरों की खूबसूरती नष्ट करने के सिवा उनके पास कोई चारा नहीं कि कमाने तो वहीं जाना पड़ेगा, वरना महंगा किराया दो। कपड़े लत्ते तो फुटपाथ मार्केट से मिल जाते हैं मगर एक सुख जिव्हा का ही रह जाता है वो भी न रहे महँगाई के चलते तो बच्चे पैदा करने के सिवा क्या उपाय है।
कभी-कभी लगता है कि धीरे-धीरे दुनिया की आधी आबादी से right to live भी छीन लिया जाएगा, जो आज बोलते हैं कि ये लोग किसी लायक नहीं महज देश की जनसंख्या बढ़ाते हैं, वहीं कल इन पर बम गिरा देने के भी हिमायती होंगे।
जितना देश घूमा है, कह सकती हूँ कि इस देश को गरीब देश यूँ ही नही कहा जाता, वाकई बहुत गरीबी है। और जो लोग कहते हैं कि चुनावी मुद्दा महंगाई नहीं राम होना चाहिये, वो INDIA पर ऐतराज भले कर लें मगर रहते वहीं हैं, वो नहीं जानते कि असल भारत क्या है।


