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कनक तिवारी लिखते हैं- राहुल कथा में पेंच दर पेंच : मजिस्ट्रेटी नासमझी में संविधान का कचूमर
06-Aug-2023 7:24 PM
कनक तिवारी लिखते हैं- राहुल कथा में पेंच दर पेंच : मजिस्ट्रेटी नासमझी में संविधान का कचूमर

राहुल गांधी के खिलाफ  एक फौजदारी मामला फिलवक्त बतंगड़ के लायक नहीं है। लेकिन उसका बतंगड़ कुछ लोग अब भी मनाते रहेंगे। मेरे इस लेख का आशय वह सब नहीं है, जिसकी जानकारी लोगों को मीडिया या सोशल मीडिया के कारण हो चुकी है। मैं कुछ उलझे हुए नये सवाल उठाना चाहता हूं। उनका प्रकाशन मेरी पसंद के अखबार ‘छत्तीसगढ़’ और संपादक सुनील कुमार के जरिए बेहतर हो सकता है। 

लब्बोलुआब यह है कि 13 अप्रेल 2019 को कर्नाटक के कोलार की एक सभा में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने हल्के-फुल्के मूड में राजनीतिक घटनाओं के जिक्र में देश के धनकबाडू भगोड़े ललित मोदी और नीरव मोदी के नामों का उल्लेख करते पूछ लिया कि क्या सभी मोदी चोर होते हैं? उस कटाक्ष को कुछ लोगों और खासकर भाजपा नेताओं ने प्रधानमंत्री को केन्द्र में रखकर समझा। बात आई-गई हो गई। लेकिन कुछ अरसा बाद गुजरात के भाजपा विधायक पूर्णेश मोदी ने सूरत में ही मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में मानहानि का फौजदारी मामला राहुल के खिलाफ दायर किया। पूर्णेश ने आरोप लगाया कि राहुल ने देष के सभी मोदियों को मानो चोर कहा है और उसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी शामिल किए गए। बहरहाल इस मामले में 23 मार्च 2023 में राहुल को भारतीय दंड संहिता की धारा 499 के तहत दोषी ठहराते अधिकतम प्रावधानित दो वर्ष की सजा सुनाई गई। सत्र न्यायाधीश और हाईकोर्ट में सजा को स्थगित करने की राहुल की कोशिश असफल रही। आखिर सुप्रीम कोर्ट ने सजा ही नहीं दोषसिद्धि (कन्विक्षन) को भी स्थगित कर दिया। राहुल गांधी को मजिस्ट्रेट द्वारा दी गई सजा को सेशन्स कोर्ट में लंबित अपील के निराकरण होने तक स्थगित कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस भूषण रामकृष्ण गवई की अध्यक्षता की तीन सदस्यीय बेंच ने जो कहा, वह राहुल के इस मामले की भविष्यमूलक संभावना भी है। गवई आगे चलकर चीफ  जस्टिस भी बन सकते हैं। कोर्ट ने मजिस्ट्रेट और हाई कोर्ट दोनों का उल्लेख करते कहा कि फैसले में सैकड़ों पेज रंग दिए गए, लेकिन यह नहीं बताया जा सका कि राहुल को अधिकतम सजा किन न्यायिक सिद्धांतों पर दी गई। न्यायिक सिद्धांतों की तो एक पुष्ट और अनुभवजन्य परंपरा है। हाई कोर्ट जज ने तो स्थगन आवेदन का निपटारा करने में ही 66 दिन का समय बर्बाद किया। जजों को माननीय प्रधानमंत्री क्यों लिखना चाहिए। संविधान पहले माननीय और आखिर में जी जोडऩे का समर्थन नहीं देता। मजिस्ट्रेट की अदालत में इतनी कानूनी खामियां हुईं जिनका ब्यौरा देना फिलवक्त जरूरी नहीं। राहुल गांधी को सजा मिलने के बाद लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8 (3) के तहत लोकसभा सचिवालय के आदेश पर सांसदी खत्म कर दी गई। आनन फानन में उनका सरकारी मकान मोदी सरकार ने पूरी तरह से खाली करा लिया। ऐसा प्रायोजित प्रचार भी हुआ कि राहुल गांधी का संसदीय राजनीतिक जीवन संकट में है और आगे उसके खात्मे की शुरुआत की जाने की कोशिश भी हो रही है। अलबत्ता जस्टिस गवई ने यह भी कहा कि राहुल गांधी ने जो कहा वह ‘गुड टेस्ट‘ (भोलेपन) में नहीं था। 

अंगरेजों के वक्त 1860 में ही भारतीय दंड संहिता बदनाम लेकिन जहीन कानूनज्ञ लॉर्ड मैकाले के हाथों लिखी गई। उसमें संशोधन होते रहे। उसकी धारा 499 एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह की मानहानि की सजा और परिभाषा के बाबत है। कोई व्यक्ति जानबूझकर नीयतन गलत बात कहता है जिससे दूसरे व्यक्ति की सार्वजनिक रूप से तौहीन होती हैऔर वह भी झूठे आधार पर। तब मानहानि का अपराध होता है। जहीन मैकॉले ने लेकिन उन दस अपवादात्मक परिस्थितियों को भी शामिल किया जिनके रहते अपराध करना लगने पर भी अपराध होना नहीं माना जाएगा। मसलन किसी सार्वजनिक प्रश्न के बाबत किसी व्यक्ति के आचरण और चरित्र के बारे में अगर कुछ कहा जाता है। तो लोकप्रश्न शामिल होने से ऐसा कहा जाना मानहानि नहीं करता। राहुल राजनीतिक व्यक्ति हैं। उन्होंने असहमत राजनीति के कुछ किरदारोंं द्वारा पोषित और पल्लवित ललित मोदी और नीरव मोदी जैसे विश्व प्रसिद्ध भारतीय धन कबाड़ू भगोड़ों के बारे में कुछ बात कही। तो सार्वजनिक मसलों पर देष की दौलत के लुटेरोंं के मोदी उपनाम का उल्लेख करते किसकी तौहीन हो गई? राहुल के वकीलों और खासतौर पर सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने पूर्णेश मोदी के आरोप पत्र को कई तरह से तार तार किया। उसकी नियामक समझ मजिस्ट्रेट हरीष हंसमुख भाई वर्मा मेंं होनी चाहिए थी लेकिन सिंघवी की बौद्धिकता या तो मजिस्ट्रेट के सिर के ऊपर से निकल गई या मजिस्ट्रेट ने अभियोगी पक्ष से प्रभावित होकर राहुल के खिलाफ  कोई गांठ बांध ली होगी। खुद शिकायत कुनिदंा पूर्णेश ने कहा ही था कि देश में करोड़ों मोदी हैं। उनकी जनभावनाएं आहत हुई हैं। इसलिए मैं उनकी ओर से भी यह परिवाद पेश कर रहा हूं। राजनीति का फितूर यहां तक कह गया कि मोदी पिछड़ी जातियों का एक उपनाम है। वह नरेन्द्र मोदी का भी है। इसलिए राहुल का कथन पिछड़ी जातियों का खुला अपमान है। राजनीतिक मुद्दे इस तरह भी न्यायालय के लिए पैदा किए जाते हैं। 

सचाई यह है कि मोदी उपनाम की कोई कानूनी मान्यता की पहचान नहीं है। खुद पूर्णेश ने अपना मोदी उपनाम इस्तेमाल करना पहले ही छोड़ रखा है। नरेन्द्र मोदी, ललित मोदी, नीरव मोदी, सैयद मोदी, पीलू मोदी वगैरह नाम एक ही धर्म, जाति या कुनबे के मोदी नहीं हैं। फिर भी मुकदमा तो किया ही जाना था और हो गया। चुनावी या अन्यथा जनसभाओं के माहौल में हल्की फुल्की बातें तमाम नेताओं द्वारा कहे जाने की रवायत रही है। राहुल के कटाक्ष के बाद सभा में या बाहर भृकुटियां नहीं तनीं। लोग हंसे होंगे मुस्कराए भी। तालियां भी बजीं और उस दिन मामला हवा में उड़ गया। ऐसे किस्से होते रहते हैं। उन्हेंं धारा 499 की बेडिय़ों में नहीं जकड़ा जाता रहा है। फ्रांसीसी विमान राफेल खरीदी विवाद में कई दिनों तक राहुल कहते रहे ‘चौकीदार ही चोर है।’ चौकीदारों के संगठनों ने मुकदमा दायर नहीं किया। उस चौकीदार ने भी नहीं, जिसकी ओर इषारा किया गया समझा गया होगा। चोरों के संगठन ने भी नहीं किया कि हमें चौकीदार क्यों कहा जा रहा है। राहुल के मुकदमे में मजिस्ट्रेटी फैसला आने के बाद गुजरात में ही मोदी समाज के नाम पर एक बड़ी सभा केन्द्र और गुुजरात सरकार के अप्रत्यक्ष इशारे या मदद के साथ की गई। पहले ऐसे कथित मोदी समाज का कोई सार्वजनिक सम्मेलन किया गया हो, ऐसा सुनाई नहीं पड़ता। केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सम्मेलन में पूर्णेष मोदी का उल्लेख करते उनका अभिनंदन किया। इस तरह मजिस्ट्रेट के फैसले को भाजपा ने खुलेआम जुडक़र अपना राजनीतिक हथियार बना लिया। नरेन्द्र मोदी चुप रहे। उन्हें ‘आग लगाए जमालो दूर खड़ी‘ वाला मुहावरा मालूम रहा होगा। 

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने गुजरात हाई कोर्ट के आचरण पर भी चुप्पी नहीं बरती। जो कहना था सो कह दिया। गुजरात के ही निवासी सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को कोर्ट से अनुरोध करना पड़ा कि गुजरात हाई कोर्ट के जज को लेकर और टिप्पणी नहीं की जाए। वरना उसका परिणाम कुछ और हो सकता है। तब भी बेंच ने कहा कि गुजरात से तरह तरह के फैसले आते हुए दिखाई तो पड़ रहे हैं। इससे ज़्यादा कोई क्या कहेगा? कोई चार पांच महीने तक राहुल गांधी को जिल्लत झेलनी पड़ी। सांसदी गई। राजनीतिक हैसियत का षासकीय मकान छीना गया। उनके खिलाफ तरह तरह के लांछन लगाए गए, जिनकी ज़रूरत नहीं थी। फिर भी राहुल गांधी ने हर स्तर पर कहा वे अपने कहे को लेकर माफी नहीं मांगेंगे। यह सिद्ध हुआ कि इस प्रकरण में माफी मांगने से अपने आत्मसम्मान का गुड़ गोबर कर देना होता। राहुल और उनकी कानूनी सलाहकार टीम को इत्मीनान रहा होगा कि नीचे चाहे जो हो। सुप्रीम कोर्ट में तो उनके साथ कानूनी नस्ल का न्याय होगा और वह हुआ। 

मुख्य सवाल राहुल गांधी के मुकदमे के सफल होने का नहीं है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों की रोषनी में सत्र न्यायालय में लम्बित अपील शिकायत कुनिंदा के लिए टांय टांय फिस्स होने वाली है। भाजपा नेताओं ने होम करने का सोचा था लेकिन उनकी प्रतिष्ठा के हाथ जल गए। अचरज है उनके बड़े विधिक सलाहकारों ने भी टीवी चैनलों पर आकर ऐसी थोकबन्द बुड़बक बयानी की जिससे उनके कानूनी ज्ञान पर ही संदेह होता है। उन्होंने स्तुति वाचक के रूप में अपना कायांतर कर लिया होगा। सवाल है कि एक मजिस्ट्रेट को  एक सांसद या विधायक के मामले में इतने कानूनी अधिकार क्यों मिल गए हैं कि वह यदि मामले में आरोपी सांसद या विधायक को दो वर्ष की सजा दे तो उस राजनेता का भविष्य एक तरह से खात्मे की ओर धकेल दे। वह कम से कम छ: साल चुनाव नहीं लड़ पाएगा। 

आजादी के बाद 26 जनवरी 1950 से संविधान ही देश का बुनियादी कानूनी दस्तावेज है। संविधान के अनुच्छेद 19 में बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी मुख्य अधिकार है। लेकिन उस पर कुछ प्रतिबंध भी हैं। मानहानि भी एक प्रतिबंध है। व्यक्ति का मानहानि करना प्रतिबंधित संवैधानिक अधिकार होगा। भारतीय दंड संहिता की धारा 499 के तहत मानहानि अंगरेजी हुकूमतशाही की उपज है। तब संविधान नहीं था। मानहानि का अपराध दंड संहिता में सबसे लचर, कमजोर और सरकार के हस्तक्षेप के अयोग्य अपराध है। यह तत्काल जमानत योग्य है। सरकार और पुलिस इसका संज्ञान नहीं ले सकते। आरोपी तथा षिकायतकुनिंदा किसी बाहरी हस्तक्षेप के बिना भी समझौता कर सकते हैं। इतना लाचार, मासूम, उपेक्षित और दो व्यक्तियों के बीच कोर्ट कचहरी करने के निजी इरादों में शामिल बेचारा अपराध एक मजिस्ट्रेट के हाथ पडक़र संविधान के सबसे दंडनीय हथियार के रूप में इस्तेमाल हो गया। भारत में हजारों मजिस्ट्रेट हैं। लाखों क्या करोड़ों राजनीतिक महत्वाकांक्षी उम्मीदवार हो सकते हैं। ऐसे किसी अपराध में कोई भी प्रभावशाली व्यक्ति एक मजिस्ट्रेट को पटाकर (जो कठिन नहीं है)। अपने किसी विरोधी को दो बरस की सजा दिला दे। फिर तो षडय़ंत्र करने वाले व्यक्ति की पौ बारह है।

राहुल प्रकरण से एक चिंताजनक संवैधानिक स्थिति पैदा हुई है। सब जानते हैं देश में मजिस्ट्रेटों की बौद्धिक और नैतिक क्या हालत होती है। अदालतों से कैसे भी आदेश किसी के खिलाफ भी हो जाते हैं या ले लिए जाते हैं। फिर तो फैसले के कारण बवंडर मचेगा ही। राजनीतिक उथल पुथल होगी। किसी प्रतिनिधि का भाग्य या उसका भविष्य खराब हो सकता है। अब सजा को लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम से जोड़ दिया गया। तब कई फैसले जानबूझकर कराए जा सकते हैं। देश के नेताओं और बड़े अन्य निर्वाचित प्रतिनिधियों के खिलाफ  प्रवर्तन निदेशालय उर्फ ईडी, इन्कम टैक्स, सीबीआई सब का हंगामा है। अब किसी को भी 2 वर्ष की सजा दिलाना कठिन नहीं होगा। कई मुकदमों में हो चुका है। लालू यादव का मुकदमा सबको याद रखना चाहिए।        
      
ऐसी हालत में लोक प्रतिनिधित्व कानून को समझना बहुत ज़रूरी है। सांसदों, विधायकों के भविष्य को मजिस्ट्रेटों के विवेक पर नहीं छोड़ा जा सकता। मसलन अश्लीलता को लेकर दंड संहिता में धारा 292, 294 आदि हैं। वहां किसी भी लेखक की कृति, पुस्तक, कविता, उपन्यास, चित्रकला, नाटक की कब्जेदारी या प्रदर्षन को लेकर कोई भी रिपोर्ट कर सकता है कि यह रचना अश्लील है। उसमें पुलिस हस्तक्षेप कर सकती है। थानेदार कविता में अश्लीलता कैसे ढूंढ सकता है? लेकिन ढूंढ लेता है। सजा हो गई तो उस निर्वाचित प्रतिनिधि का भविष्य थानेदार के विवेक की सलीब पर हो सकता है। यह अनुमति संविधान क्यों देता है? भारतीय अपराध व्यवस्था में बहुत झोल है। अब तो राजनेता इस तरह के हो गए हैं कि दूसरे की गर्दन मरोडऩे, गड्ढे में डालने में उन्हें कोई हिचक नहीं होती। उनके अंदर ईमान और परस्पर सहानुभूति का तो दौर खत्म हो गया है। आगे और बुरा दौर आने वाला है। गुजरात के ही एक मजिस्ट्रेट ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के खिलाफ  जमानती वारंट षायद निकाल दिया था न?                   
                             
आजादी के बाद संसद में लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 बनाया गया। उसकी धारा 8 (3) में लिखा है यदि किसी व्यक्ति को दो वर्ष के लिए सजा दे दी जाए। तो अगले 6 वर्ष तक चुनाव लडऩे के काबिल नहीं रहेगा। लेकिन धारा 8 (4) के मुताबिक ऐसा ही होने पर सांसदों विधायकों के लिए सुरक्षा है कि सजा के खिलाफ अपील या रिवीजन कर दें। जब तक उसका निपटारा नहीं होता, तब तक वे सांसद या विधायक बने रह सकते हैं और अगला चुनाव भी लड़ सकते हैं। यह संशोधन राजीव गांधी के प्रधानमंत्री काल में 15/03/1989 को किया गया। यह बात कुछ समाज सेवकों को गैर मुनासिब लगी। 1999 में स्वैच्छिक संस्था असोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉम्र्स (एडीएफआर) ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दी कि उम्मीदवारों की पूरी कुंडली उनकी योग्यता, अपराध, आर्थिक स्थिति वगैरह के बारे में जनता को दिया जाना सुनिश्चित हो। अचरज है कि सभी राजनीतिक पार्टियों ने याचिका का विरोध किया कि संविधान में इस बात का प्रावधान नहीं है। हाईकोर्ट ने शासन को सीधा निर्देष तो नहीं दिया लेकिन चुनाव आयोग से कहा कि मुनासिब कार्यवाही करें। इसके समानान्तर पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबरटीज (पीयूसीएल) ने सीधे सुप्रीम कोर्ट मे याचिका लगाई कि जनता के मूल अधिकारों को कानूनी जामा पहनाया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने यह बात मानते 2 मई 2002 को अनुकूल फैसला किया। सरकार नेे अधिनियम की धारा 33 (क) के तहत सूचनाएं देना तो मंजूर किया लेकिन धारा 33 (ख) के तहत कई प्रतिबंध लगा दिए। पीयूसीएल ने फिर याचिका लगाई कि धारा 33 (ख) को निरस्त किया जाए। मामले की सुनवाई के बाद कोर्ट ने फैसले में कटाक्ष भी किया कि पहले कभी जमाना था। जब 60 बरस की उम्र का कोई डाकू किसी नवयुवती से जबरिया शादी कर लेता था। अब ऐसी सामाजिक हालत नहीं है क्योंकि ये डाकू वृत्ति राजनीतिक उम्मीदवारों के लिए कायम रहने दी गई। जनता के संवैधानिक अधिकार उम्मीदवारों के अधिनियमित अधिकारों से कहीं श्रेष्ठ हैं। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने उपरोक्त कथित धारा 33 (ख) 13 मार्च 2003 को रद्द कर दी। उसे अटल बिहारी की भाजपाई सरकार ने षामिल किया था कि देश की किसी भी अदालत या चुनाव आयोग को राजनीतिक पार्टियों और उम्मीदवारों के चरित्र के संबंध में सवाल करने का अधिकार नहीं है। ऐसा अधिकार केवल संसद को है। कांग्रेस और भाजपा एक दूसरे को कोसती भर हैं कि मेरी कमीज तेरी कमीज से ज़्यादा उजली है। बाकी कई पार्टियां स्वार्थ में सहायक भूूमिका में तालियां बताती हैं। लोकतंत्र में जनता गफलत, सांसत और हैरानी में रखी जाती है। अब युवजन अपनी मर्जी से भी जीवन साथी चुन सकते हैं। क्या ऐसी ही स्थिति उम्मीदवारों और मतदाताओं के संबंधों को लेकर नहीं होनी चाहिए? क्या एक गतिषील लोकतंत्र में मतदाता को यह जानने का अधिकार नहीं होना चाहिए कि जो प्रतिनिधि उसके शासक, विधायक बल्कि भाग्यनिर्माता बनेंगे उनका जीवन परिचय क्या है? सुप्रीम कोर्ट ने 56 पिछले फैसलों की सिलसिलेवार व्याख्या की और पूर्वज न्यायिक वचनों में व्यक्त चिंताओं का दोबारा इज़हार किया। सुप्रीम कोर्ट ने विदेशी लोकतंत्रों की पुष्ट परंपराओं पर भी प्रकाश डाला। न्यायमूर्ति एम.बी.शाह, पी. वेंकटरामा रेड्डी और देवदत्त माधव धर्माधिकारी की तीन सदस्यीय पीठ ने सर्वसम्मत फैसला किया कि पिछले फैसले में चुनाव आयोग को दिए गए सुप्रीम कोर्ट के सभी निर्देष अन्तिम रूप से लागू रहेंगे। असंवैधानिक आधारों की कोख से निकली धारा 33 (ख) को सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल प्रभाव से खारिज कर दिया।

कांग्रेस मतदाताओं को यह कैसे समझा पाएगी कि लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 8 (4) में सांसदों और विधायकों को संविधानेतर महामानव बनाने का कुचक्र कांग्रेस के ही शासन काल में क्यों रचा गया। इस प्रावधान के कारण देश में कितने दागी सांसदों और विधायकों को संवैधानिक लाभ मिल गया। जनता के अधिकारों का कितना मखौल उड़ाया गया। इस असंवैधानिक कृत्य की भरपाई कौन करेगा? कांग्रेस की बगलगीर दिखती भारतीय जनता पार्टी के नरेन्द्र मोदी भी क्या देश की जनता को बताएंगे कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उपहास करने की मुद्रा में उनकी पार्टी ने लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में धारा 33 (ख) क्यों जोड़ी? उसे सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में 2003 में नोचकर फेंक दिया। इस संशोधित धारा के अनुसार यह भाजपाई सरकार का विचार था कि देश की किसी भी अदालत या चुनाव आयोग को राजनीतिक पार्टियों और उम्मीदवारों के चरित्र के संबंध में सवाल करने का अधिकार नहीं है। क्यों नहीं कांग्रेस और भाजपा मिलकर देश के सामने एक माफीनामा जारी करें कि चुनावी भ्रष्टाचार को लेकर दोनों की पार्टनरषिप रही है और अब भी है। सांसदों के वेतन भत्ते और सुविधाओं को बढ़ाने के नाम पर संसद की कार्यवाही कभी ठप्प नहीं होती। लेकिन जनता की समस्याओं को लेकर सभी पार्टियां मुखौटे लगाती हैं जिससे पीछे का घिनौना चेहरा जनता को दिखाई नहीं दे। उपरोक्त निर्णय के निर्देषों का आधा अधूरा पालन करने की आड़ में एन.डी.ए. सरकार ने लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में धारा 33 (क) और धारा 33 (ख) जोड़ते हुए पहले अध्यादेश और बाद में अधिनियम पारित किया। धारा 33 (क) के तहत उम्मीदवार को बताना होगा कि उसके खिलाफ  गंभीर अपराधिक वृत्ति के मुकदमों का निर्णय हुआ या कायमी है जिनके तहत दो वर्ष से अधिक की सजा हुई है या हो सकती है। इसके अलावा यदि उम्मीदवारों को धारा 8 में वर्णित अन्य अपराधों की सजा मिली हो तो उनकी जानकारी भी शपथ पत्र पर दी जाए। लेकिन इस धारा में उम्मीदवारों की आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति के बारे में जान-बूझकर ओढ़ी हुई खामोशी बोलती रही। धारा 33 (ख) की भाषा तो फैसले का सीधा मज़ाक उड़ाती दिखी। उसमें कहा गया कि किसी भी अदालती निर्णय या चुनाव आयोग के निर्देष के रहते हुए भी उम्मीदवार उपरोक्त सूचनाएं चुनाव आयोग को तब तक नहीं देंगे, जब तक ऐसा संबंधित अधिनियमों अथवा नियमों में प्रावधानित नहीं किया गया हो। ज़ाहिर है यह उपधारा सुप्रीम कोर्ट तक को ठेंगा या आंखें दिखाने की वर्जिश थी। 

लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8 (1) तथा (2) में कई नामजद अपराध हैं जिनमें दो वर्ष से भी कम सजा होने पर तत्काल प्रभाव से सदन की अयोग्यता प्रभावशीलहो जाती है। इनमें भारतीय दंड संहिता से अलग हटकर समुदायों के बीच सामाजिक विद्वेष, चुनाव संबंधी अपराध, बलात्कार, स्त्री के प्रति क्रूरता आदि सहित नागरिक अधिकार अधिनियम, कस्टम अधिनियम, गैर कानूनी गतिविधि प्रतिरोध अधिनियम, फेरा, मादक द्रव्य संबंधी अपराध, आतंककारी गतिविधियां, पूजा स्थल संबंधित अधिनियम के अपराध, राष्ट्र ध्वज और राष्ट्रीय प्रतीक चिन्हों का अपमान, सती प्रतिषेध अधिनियम, भ्रष्टाचार अधिनियम, मुनाफाखोरी तथा जमाखोरी तथा मिलावटखोरी के अपराध और दहेज संबंधी अपराध षामिल हैं। 

संसद ने लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 8 (4) के अनुसार 1989 से दो वर्ष या अधिक के लिए दोषसिद्ध होकर सजा प्राप्त सांसदों और विधायकों को तब तक के लिए अपनी कुर्सी पर बैठे रहने का अभयदान दे दिया कि जब तक उनके अपराधिक प्रकरणों से संबंधित अपीलों का अंतत: निपटारा नहीं हो जाता। इस संषोधित प्रावधान को सोलह वर्ष बाद ‘लोक प्रहरी’ नामक संस्था की ओर से एस. एन. शुक्ला तथा अधिवक्ता लिली थॉमस ने जनहित याचिकाओं के रूप में चुनौती दी। आठ वर्षों तक सुप्रीम कोर्ट में लंबित इन याचिकाओं को 10 जुलाई 2013 को न्यायमूर्तिद्वय ए. के. पटनायक और एस. जे. मुखोपाध्याय की बेंच ने निराकृत करते हुए सांसदों, विधायकों को कन्सेषन देती धारा 8 (4) को असंवैधानिक करार दिया। सांसद और विधायक संविधान को अजीबोगरीब बीजक, रहस्य-पुस्तिका या बौद्धिक तंत्रशास्त्र भी बनाते रहे हैं। यह पोथी ईमानदार, देशभक्त लेकिन ज्यादातर पारंपरिक ब्रिटिश-बुद्धि का समर्थन करने वाले हस्ताक्षरों ने लिखी थी। उन्हें अन्दाज नहीं था कि अंगरेजी सल्तनत से लोहा लेने वाली पीढ़ी के वंशज लोकतंत्र और आईन के सामने इतनी पेचीदगियां पेष करेंगे कि संविधान को ही पसीना आ जाएगा। 
बुद्धिजीवी वर्ग उम्मीद कर रहा था कि अब मनमोहन सरकार के पास दो ही विकल्प हैं। एक तो यह कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ही पुनर्विचार याचिका दायर करे कि उसके फैसले से लोकतंत्र के संचालन में अनपेक्षित दिक्कतें आएंगी। स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने वाली सरकारों के दौर में संसद या विधानमंडलों को चलाना वैसे ही मुश्किल होता है। दूसरा विकल्प था संसद उपरोक्त धारा 8 (4) को ही संशोधित कर दे। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के प्रभाव का सांप मर जाए और जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा की लाठी भी नहीं टूटे। भाजपा सरकार ने एक के बाद एक दोनों काम किए। सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार की पुनर्विचार याचिका यह कहते ठुकरा दी कि उसके फैसले में कानून के नज़रिए से कोई तात्विक गलती नहीं है। अलबत्ता सुप्रीम कोर्ट ने मान लिया कि वह उस हिस्से पर पुनर्विचार करेगा जिसमें कहा गया है कि जनप्रतिनिधि जेल में रहते हुए चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। पुनर्विचार याचिका खारिज होने के बाद मनमोहन सिंह की सरकार ने संसद को फिर विश्वास में लेकर उपरोक्त धारा 8 (4) को बदलकर अध्यादेष के अनुसार संशोधित कर दिया। सरकार ने तमाम राजनैतिक दलों को विष्वास में लेकर प्रस्तावित किया कि दो वर्ष या अधिक की सजा पाने के तत्काल बाद अपील या रिवीजऩ दायर करने भर की स्थिति में अपील न्यायालय से स्थगन पाने के बाद सजा का फैसला प्रभावशील नहीं होगा। जब तक अपील या रिवीजन का अंतिम फैसला नहीं आता। तब तक संबंधित सांसद या विधायक वेतन तथा भत्ते नहीं ले सकेंगे। तथा विधायिका की कार्यवाही में वोट भी नहीं दे सकेंगे।

उपरोक्त कानूनी और संवैधानिक स्थिति में राहुल गांधी ने अपनी ही मनमोहन सरकार के द्वारा प्रस्तावित वह अध्यादेश फाडक़र फेंक दिया था जिसमें सांसदों, विधायकों को वह सुरक्षा मिलनी थी कि वे पुन: सजायाफ्ता होने पर भी अपील और रिवीजन के न्यायालय में लंबित रहने तक अपने पद का पूरा फायदा उठा सकते हैं। राहुल सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले से हम राय थे जिसमें कहा गया था कि लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8 (3) जो जनता के लिए लागू होती है उसके मुकाबले धारा 8 (4) जो सांसदों, विधायकों को अपराध सिद्ध होने के फैसले के बावजूद पद पर बने रहने की बल्कि अगला चुनाव लडऩे की भी रियायत देती है। वह बिल्कुल मंजूर करने लायक नहीं है। जब राहुल को सजा मिली तो कई लोगों ने मज़ाक उड़ाया कि अगर राहुल ने भरी प्रेस कांफ्रेंस में अपनी ही सरकार का प्रस्तावित अध्यादेष फाडक़र फूहड़ ढंग से नहीं फेंका होता। तो गुजरात के मजिस्ट्रेट द्वारा 2 वर्ष की सजा दिए जाने के बाद भी राहुल सांसद भले बने रह सकते थे लेकिन अगला चुनाव भी लड़ सकते थे। जब तक कि अपील या रिवीजन न्यायालय का अंतिम फैसला नहीं आ जाए। लोगों ने राहुल के नैतिक चरित्र को उनके राजनीतिक चरित्र के अंगूठे के नीचे दबा देखना चाहा। पूरी संसद में केवल राहुल हैं जिन्होंने ऐलानिया कहा कि वे सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का अपने आचरण के जरिए इस्तकबाल करते हैं। जो कहता है देश के किसी भी नागरिक को चुनाव लडऩे संबंधी जितनेअधिकार और प्रतिबंध हैं। उनसे कहीं आगे बढक़र सांसदों, विधायकों को अधिकार नहीं मिलने चाहिए। 

वर्ष 2024 खतरे की घंटी बजाता आ रहा है। मौजूदा केन्द्र सरकार के रहमोकरम पर देश की पूरी राजनीति और विपक्षी पार्टियों का नेतृत्व है। प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई, इन्कम टैक्स तथा कई और पुलिसिया एजेंसियों पर केन्द्र सरकार का दबदबा है, यहां तक कि चुनाव आयोग तक पर। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में ऐसे कई विशिष्ट अधिनियमों के अपराध हैं उनमें दो वर्ष की सजा तो क्या केवल जुर्माना लग जाए या छह महीने से कम की भी सजा हो जाए। तो भी उनका सजा की तारीख से अगले छह वर्ष तक चुनाव लडऩा मूमानियत पैदा करता है। सुप्रीम कोर्ट के जज खानविलकर की बेंच की कृपा से ई.डी. को अतिरिक्त और अकूत अधिकार मिल गए हैं। इसलिए वह हर नेता की प्रतिष्ठा और राजनीति में घुसे रहना चाहती। कितने मामलों में कोई सुप्रीम कोर्ट जाएगा और कब और कैसे? देश के हाई कोर्ट के जज जान-पहचान, रिश्तेदारी, मद और तिकड़म के आधार पर भी बनते हैं। आधे से ज्यादा मजिस्ट्रेट को तो अपना कानूनी ज्ञान फिर से चुस्तदुरुस्त करना हो सकता है। राहुल गांधी का प्रकरण तो चावल के पतीले मेंं एक पका हुआ दाना है। जिनके हाथ में सत्ता है, उन्हें आगे की कोई चिंता नहीं है। क्या मजिस्ट्रेट और बाकी एजेेसियां विधायकों और सांसदों के भविष्य को अपनी कलम से तय करेंगी कि कितना लोकतंत्र बचेगा? चुनावी भ्रष्टाचार के आधार पर याचिका कोई लगाता है तो सीधे हाई कोर्ट में ट्रायल होता है। वहां मामले को सिद्ध करना टेढ़ी खीर होती है। मजिस्ट्रेट की अदालत से तो देश में जाने कितने फैसले हो सकते हैं। इस ओर राजनेताओं का ध्यान क्यों नहीं जाता? जब सबसे लचर और कमजोर निजी परिवाद पत्र पर जबरिया सजा दे दी जाती है और सुप्रीम कोर्ट अगर आड़े नहीं आए तो राहुल गांधी जैसे कद्दावर नेता का राजनीतिक भविष्य संदिग्ध हो ही सकता था। अब देश में कितने तिकड़मी होंगे जो शासन विरोधियों को मजिस्ट्रेट के इजलास में फांसकर सजा दिला दें। आजाद भारत में कई परिवार हैं जहां एक सदस्य मजिस्ट्रेट, दूसरा राजनीतिक नेता, तीसरा व्यापारी और चौथा समाजसेवक या अन्य अधिकारी हो सकता है। मजिस्ट्रेट से कोई सजा दिलाए और किसी का राजनीतिक कैरियर चौपट कर दे। यह तो कई राजनीतिक किरदारों की कहानी बन सकती है। लोकतंत्र में मूल अधिकारों का इतना भयावह शोषण समझ से परे है। 


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