विचार / लेख

दोस्ती हो तो इन लेखकों सी जिनके किस्से गुदगुदाते रहते हैं : फ्रेंडशिप डे
06-Aug-2023 4:47 PM
दोस्ती हो तो इन लेखकों सी जिनके किस्से गुदगुदाते रहते हैं : फ्रेंडशिप डे

-अपूर्व गर्ग 

दोस्ती में प्यार, पवत्रिता, सत्यता तो ठीक दोस्ती में उमंग, जोश और मजे भी ज़रूरी हैं. जिस दोस्ती में ज़िंदा दिली हो, कटाक्ष हों, दोस्तों के बीच व्यंग्य हो वो दोस्ती दोस्तों के जाने के बाद भी यादगार बन जाती है, गुदगुदाती है और दोस्तों ही नहीं सबके जीवन में रंग -तरंग पैदा करती है.

इस लिहाज़ से मुझे साहित्यकारों की दोस्ती ने सबसे ज़्यादा रोमांचित किया और आकर्षित किया. आज फ्रेंडशिप डे पर रटे-रटाये मुहावरे, उद्धरण, कविताओं की जगह मुझे याद आते हैं साहित्यकार दोस्तों के आपसी संवाद जो हर बार गुदगुदा जाते हैं मुस्कान छोड़ जाते हैं.

आज मित्रता दिवस पर इन साहित्यकार दोस्तों से सीखिए सेंस ऑफ़ ह्यूमर क्या है ? दोस्ती में तीखे कटाक्ष-व्यंग्य से कैसे दोस्तों के गाल गुलाबी होते रहे.

दोस्तों अति गंभीरता, रूखापन ,अवसादी और बीमार चेहरे के साथ क्या दोस्ती करेंगे. दोस्ती में हंसी मज़ाक, खींचतान होनी चाहिए ये अच्छे विटामिन साबित होंगे ... दोस्ती में बुरा मानना छोड़िये ..

ज़रा इधर नज़रें तो इनायत करिये ..

रवींद्र कालिया लिखते हैं, काशीनाथ जी के मन में देशी वस्तुओं के प्रति इतना लगाव है कि वे आज तक दातौन का त्याग नहीं कर पाए .आज जब समधी समेत उनकी पीढ़ी के तमाम रचनाकार टूथ ब्रुश का इस्तेमाल करने लगे हैं, काशीजी की चाल है, वे मंद -मंद दातौन करते रहते हैं, जब वो चिंतन करते हैं तो दातौन थाम लेते हैं. रात जब तक सो नहीं जाते दातौन करते रहते हैं ....जिस तरह लोग बगल में चश्मा उतारकर सो जाते हैं, काशीनाथजी दातौन रख कर सो जाते हैं ...काशीनाथजी जब परेशान होते हैं दातौन करते हैं, खुश होते हैं तो दातौन करते हैं ...

काशीनाथ जी ने लिखा है ' किस्सा-कहानी में नामी- गिरामी ! शराफत की लत के मारे बेचारे, इसके बावजूद परम हरामी !इन हरामियों में सिरमौर रवींद्र कालिया. मेरा ख़्याल है वह यदि हरामीपन में उतर आये तो राजेंद्र यादव तो मान लीजिये वह शरीफ आदमी हो चले हैं, लेकिन कमलेश्वर जैसे 'चूड़ामणि ' भी उसके आगे पानी भरें ...'

कमलेश्वर राजेंद्र यादव के लिए लिखते हैं : " जब भी साथ बैठते तो राजेंद्र ही हमारी मज़ाकों का निशाना बन जाता. ये मात्र स्थिति जन्य घटनाएं होतीं. इनके पीछे कोई इतिहास नहीं होता था ..मात्र आदतों या सहज कुंठाओं के कोण होते. अब जैसे यही कि मन्नू से ही, मज़ाक मज़ाक में हमें ये मालूम हुआ था कि राजेंद्र अपनी हर चीज़ ताले में बंद रखने की आदत से ग्रस्त था .........पूस रोड वाले उस घर में राजेंद्र उसी तालाबंदी वाले दौर में आया था. सुबह उठा तो उसने अपने कुछ एक ताले खोलकर ब्रुश और पेस्ट निकाला. मैंने गायत्री को आवाज़ लगाई और एक छोटा ताला मंगवाकर राजेंद्र के ब्रुश वाले छेद में लगा दिया. राजेंद्र पहले तो किलकारी मारकर हंसा, फिर बोला - स्साला ....

राकेश भी खड़ा हंस रहा था. तू हर छेद में ताला डालने के लिए उतावला रहता है, तो यह छेद ही क्यों खाली रह जाए.. ''

राजेंद्र यादव 'मेरा हमदम, मेरा दोस्त कमलेश्वर' यानी अपने इस मिस्चीवियस यार के लिए लिखते हैं : "लेकिन कमलेश्वर शक्ल से बदमाश नहीं शैतान और इंटेलीजेंट लगता है. हो सकता है दुष्यंत ने कमलेश्वर को 'कैदियों' वाली उस पोशाक में देखकर ऐसा कहा हो जिसे वह गर्व से 'नाईट ड्रेस' कहता है या इलाहाबाद में अश्कजी के यहाँ उमेश की शादी पर उसे बाक़ायदा साबुन और ब्रश लेकर मेरी और राकेश की हज़ामत बनाते देख लिया हो. लेकिन मूलतः कमलेश्वर बदमाश नहीं, दुष्ट -यानी मिस्चीवियस अधिक है.

शीन काफ़ से दुरुस्त तलफ़्फ़ुज़, साफ़ और तराशी हुई संतुलित आवाज़, बात को निहायत प्रभावकारी तरीके से कहने की कला, पतले-पतले होंठ, तीखे और फोटोजनिक नक्श, सांवला रंग और शातिर आँखें ...लगता है जैसे आप सचमुच किसी समझदार आदमी से बात कर रहे हैं. एक हाथ की उँगलियाँ खोल -खोल कर मेज़ पर हाथ पटक-पटककर वह आपको घंटों किसी ऐसी किताब, फ़िल्म, घटना , कहानी या चीज़ के बारे में सविस्तार, पूर्ण-आत्मविश्वास से बताता रहेगा, जिसे न उसने पढ़ा है, न देखा है ....और न उसके बारे में उसे जानकारी है ....मुँह से जब झूठ बोलता है तो एक अच्छी कंपनी होता है और क़लम से बोलता है तो एक सफल कहानीकार.''
मोहन राकेश लिखते हैं : " एक एक्सक्लेमेशन मार्क उर्फ़ ...
राजेंद्र यादव !

न जाने क्यों जब भी ये नाम मेरे ज़हन में उभरता है , तो इसके आगे एक एक्सक्लेमेशन मार्क लगा होता है - जैसे कि बिना इस मार्क के इस नाम के हिज्जे ही पूरे न होते हों ........

मगर आदमी निहायत अन्प्रिडिक्टबल है . कब क्या कहेगा ,क्या कर बैठेगा , इसका कोई ठिकाना नहीं घर की सुख सुविधा हो ,तो आज आपको लिखने के लिए अज्ञातवास चाहिए ....और अज्ञातवास में आपको आपको कनॉटप्लेस ,चौरंगी सब कुछ चाहिए. आदमी इससे कुछ कहे उसके लिए ज़रूरी है उसके पुट्ठे काफ़ी मज़बूत हों. क्योंकि बातों से बस नहीं चलेगा, तो यह कमर में एक घूँसा जमा देगा. उसे आप झेल जाएँ, तो गर्दन पर सवार हो लेगा .आप इसे नीचे पटक दें, तो हाथ पर हाथ मारकर हँसेगा और पाजामे से धूल झाड़ता हुआ उठकर कहेगा, ''मार दिया ''! मार दिया साले को ! साहित्य में भी तेरी यही दुर्गति करने वाला हूँ. अभी से अपना और अपने साहित्य का बीमा करवा ले. नहीं तो साले दोनों को कोई रोने वाला नहीं मिलेगा ..''

मोहन राकेश ने लिखा है :-- " साहित्यिक जीवन में दोस्ती अक्सर दो -चार साल से ज़्यादा नहीं चलती .इस बीच एक दूसरे के काफ़ी ..... 'घटियापन ' के सबूत जमा हो जाते हैं .....हमारी दोस्ती -दुश्मनी जो भी है , लड़ते -झगड़ते हुई थी , उसी तरह चल रही है, और चलती रहेगी ....''

कृष्ण बलदेव वैद अपने सपने पर लिखते हैं 'निर्मल किसी की पीठ पीछे छिपा बैठा है. चंपा मुझे और दूसरे लोगों को कुछ दे रही है खाने के लिए . मैं उससे कहता हूँ , निर्मल को भी एक बिस्कुट दे दो , एक डॉग बिस्कुट . निर्मल लोटपोट होने लगता है तो मेरी नींद खुल जाती है .''

कथाकार बलवंत सिंह लिखते हैं वो अपने मित्र सुप्रसिद्ध लेखक राजेंद्र सिंह बेदी के घर रुके हुए हैं. बेदी का छोटा भाई अखबार पढ़ रहा है .श्रीमती बेदी रसोई में हैं .-''ठीक इसी अवसर पर बेदी कच्छा पहने दूसरे कमरे से निकलता है और ........हमारी नज़रें मिलती हैं तो दिल के तार बज उठते हैं .वो भेड़ की नक़ल करते हुए बड़ी लय के साथ 'बे ' की आवाज़ निकालता है और मैं तुरंत उत्तर में ' दे ' की ध्वनि उच्चारित करता हूँ. दोनों ओर से ये आंदोलन ज़ोर पकड़ने लगता है ...... इसके बाद बेदी ढेंचू - ढेंचू की ध्वनि निकलने लगता हैं ओर प्रत्युत्तर में मैं मुँह से बिल्लियां लड़ाने लगता हूँ ...इस पर एक कोलाहल मच जाता है ओर बच्चे, गृहणी हँसी से लोट -पोट ..

मंटो -इस्मत के संवाद भी सुनिए ;

“मुझे अपने पैरों से घिन आती है.” मंटो ने कहा.

“क्यों? इतने खूबसूरत हैं.” इस्मत चुगताई ने बहस की.

“मंटो-मेरे पैर बिल्कुल जनाने हैं.”

“इस्मत चुगताई -मगर जनानियों से तो इतनी दिलचस्पी है आपकी.”

“मंटो--आप तो उल्टी बहस करती हैं, मैं औरत को मर्द की हैसियत से प्यार करता हूँ. 
इसका मतलब ये तो नहीं कि खुद औरत बन जाऊँ.”

यादों की बारात का ही एक रोचक प्रसंग याद आया ...
एक बार ऐसा हुआ जोश मलीहाबादी शिमला गए हुए थे .जोश मलीहाबादी को पता चला नेहरूजी भी शिमला में हैं. उन्होंने फ़ोन किया सेक्रेटरी मुलाकात न करवा सकी। जोश मलीहाबादी ने अपने जोश के मुताबिक नेहरूजी को कड़ा पत्र लिखा. दूसरे दिन इंदिरा गाँधी का फ़ोन आया आप आइये मेरे साथ चाय पीजिये . जोश ने कहा ,-''बेटी वहां तुम्हारे बाप मौजूद होंगे, मैं उनसे मिलना नहीं चाहता .'' इंदिरा ने कहा -''मैं पिताजी को अपने कमरे में बुलाऊंगी ही नहीं''

जोश जब पहुंचे तो पंडित नेहरू पीछे से जोश पकड़कर सीधे अपने कमरे में ले गए और इसके बाद पंडित नेहरू जोश से जिस दोस्ती से मिले जोश नेहरूजी के गले लग कर रोने लगे.


अन्य पोस्ट