विचार / लेख
रमेश अनुपम
मणिपुर, नूंह, गुरुग्राम और मुंबई जयपुर सुपर फ़ास्ट ट्रेन तक में भी नफरत की हवा बह रही हो, लाशें बिछ रही हों, तब भी क्या हमारे होंठ सिले रहेंगे और हमारे होंठों पर खामोशी की एक पट्टी बंधी रहेगी?
जैसे हमें अपने इस देश से कोई मतलब ही नहीं?
क्या हम ऐसा ही भारत बनाना चाहते हैं जहां केवल नफरत और हिंसा के लिए जगह हो?
क्या हम ऐसे कठिन और भयावह दौर में भी फेसबुक जैसे सोशल मीडिया पर अपने बासी गाने, कविता और बासी विचार ही परोसते रहेंगे और अपनी ही पीठ थपथपा कर गदगदायमान होते रहेंगे?
क्या देश के युवाओं के लिए किसी बजरंग दल के मोनू मनेसर को या किसी आर.पी.एफ. के कांस्टेबल चेतन सिंह को जो सिर से पांव तक सांप्रदायिकता और नफरत से भरा हुआ हो को कब तक नायक बनाते रहेंगे ? जैसे विनायक दामोदर सावरकर और नाथूराम गोडसे को हम बनाने में लगे हैं?
हरियाणा के नूंह में बीते सोमवार 31 जुलाई को ब्रज मंडल यात्रा के नाम पर बजरंग दल के लोगों ने जो यात्रा निकाली और इससे पहले मोनू मनेसर ने अपना एक वीडियो वायरल कर यह घोषणा की कि वे इस यात्रा में दल बल सहित शामिल हो रहे हैं।
ये मेवात बजरंग दल के वही मोनू मनेसर हैं जिन पर फरवरी 2023 में भरतपुर के दो मुस्लिम नवयुवकों नासिर और जुनैद को जिंदा जला दिए जाने का दोषी माना गया था और पुलिस को जिसकी तब से तलाश थी।
ऐसे अपराधी द्वारा वीडियो वायरल किए जाने के बाद भी प्रशासन नूंह में निकलने वाली ब्रज मंडल यात्रा को लेकर कतई गंभीर नहीं था, अगर ऐसा होता तो दो पुलिस कर्मियों सहित चार और लोगों की जाने नहीं जाती। पर मामला यहीं खत्म नहीं हुआ इस आग की लपटें 1 अगस्त को गुरुग्राम तक पहुंच गई। दंगाइयों ने रात में गुरुग्राम के मस्जिद पर धावा बोल दिया और 22 वर्षीय युवा मौलाना हाफिज साद की हत्या कर दी।
मौलाना हाफिज साद का एक वीडियो मैंने देखा है जिसमें वे हिंदू मुस्लिम एकता का स्वप्न देखते हुए बेहद सुरीली आवाज में एक गीत गा रहे हैं-
‘हिंदू मुस्लिम बैठ के खाए थाली में
ऐसा हिंदुस्तान बना दे या अल्लाह’
मौलाना हाफिज साद के इस हिंदुस्तान के स्थान पर जो हिंदुस्तान हम बनाने में लगे हैं वह हिंदुस्तान खून, चीखों और आंसुओं से भरा हुआ हिंदुस्तान होगा।
इस देश के सर्वोच्च न्यायालय और माननीय सीजेआई. डी.वाई.चंद्रचूडज़ी का आभारी होना चाहिए जिसके चलते इस देश की 140 करोड़ जनता के मन में न्याय की आस जगी है। मणिपुर, नूंह और अब कश्मीर में हटाए गए 370 मुद्दे को भी सर्वोच्च न्यायालय ने गंभीरता से लिया है, जिसके चलते 2 अगस्त से इसकी सुनवाई भी शुरू हो गई है।
आजादी के 75 वर्षों की यात्रा करने वाले इस महादेश में जहां अभी हाल ही में धूमधाम से अमृत महोत्सव मनाया गया है। उस देश में हिंसा और नफरत की रोटी सेंकने वालों की राजनीति पर चुप्पी साध लेना क्या रेत में शुतुरमुर्ग की तरह अपना मुंह छुपा लेना नहीं है
लेकिन यह सब लिखकर मैं किसी भी कीमत में देश के गैर भाजपाई दलों को बख्शना नहीं चाहता।
छत्तीसगढ़, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, झारखंड और पश्चिम बंगाल में गैर भाजपाई सरकारों के पास क्या सांप्रदायिकता से लडऩे का कोई दीर्घकालीन एजेंडा है?
क्या स्कूल, कॉलेज के किशोरों और नौजवानों के लिए कि वे सांप्रदायिक शक्तियों के मंसूबों को समझ सकें, अपने देश की महान विरासत को जान सकें, 1857 की क्रांति को, झांसी की रानी लक्ष्मी बाई, नाना साहब पेशवा के बलिदान और देश के स्वाधीनता आंदोलन के बारे में भी उन्हें ज्ञान हो, भगत सिंह, महात्मा गांधी, पं.जवाहर लाल नेहरू के अवदान को वे जान सकें, इसके लिए उनके पास क्या कोई ठोस कार्यक्रम भी है? या बेरोजगारों के खाते में पैसा डालना ही उनका एकमात्र अभीष्ट है ?
हम लोगों ने स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी सबको साम्प्रदायिक ताकतों के हवाले कर दिया है, जबकि गैर भाजपाई राजनैतिक दलों को जहां-जहां उनकी सरकार है, इन शिक्षा संस्थानों को गंभीरता से लेना चाहिए था। एक सांस्कृतिक मुहिम को बढ़ावा देना चाहिए था।
रामधारी सिंह दिनकर की इन पंक्तियों को बार-बार याद रखे जाने की भी जरूरत है-
‘जो तटस्थ है समय लिखेगा उनके भी अपराध’
जो चुप हैं, जो इस कठिन दौर में भी अपने घोंसलों में दुबके हुए हैं उनके लिए क्या कहा जाए पर अब समय आ गया है देश के सचेत बुद्धिजीवियों को, गैर भाजपाई राजनैतिक दलों को अब नए सिरे से सोचने और देश हित में नए कार्यक्रमों की योजना पर ध्यान देने की जरूरत है, खासकर नौजवानों के विषय में विचार किए जाने की जिन्हें न देश और दुनिया के इतिहास का ज्ञान है और न ही अपने स्वाधीनता आंदोलन का।
क्या छत्तीसगढ़ में आसीन कांग्रेस सरकार इस दिशा में भी कोई सार्थक कदम उठाएगी ?


