विचार / लेख
-अपूर्व गर्ग
''यह फैसला एक चींटी को मारने के लिए हथोड़े का इस्तेमाल करने की तरह था
..''-कुलदीप नैयर
राहुल गाँधी का केस सामने है ..कितना गंभीर है ? अब ख़ुद सोचिये ..
क्या ये सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे और सुप्रीम कोर्ट इस पर फैसला दे इतना गंभीर मामला था ?
''फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि वह जानना चाहता है कि इस मामले में अधिकतम सजा क्यों दी गई..।''
''जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस पीवी संजय कुमार की पीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने अपराध के तहत अधिकतम सजा देने के लिए विशेष कारण नहीं बताए हैं.'' जिस तरह आज राहुल गाँधी को अधिकतम सज़ा दी गयी याद आता है इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला.
जज जगमोहन लाल सिन्हा ने 12 जून 1975 को फैसला देते हुए इंदिरा गाँधी के लोकसभा के चुनाव को रद्द किया और उन्हें छह वर्ष के लिए किसी भी संवैधानिक पद के लिए अयोग्य घोषित किया था. ये फैसला जज साहब ने 1971 के चुनाव में राजनारायण की याचिका पर फैसला सुनाया था.
इंदिरा गाँधी पर आरोप ये था कि उनके 'ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी ' यशपाल कपूर ने चुनाव की रैली में माइक और पंडाल इत्यादि लगवाने में भूमिका निभाई थी . यह बात कही गयी थी कि 29 दिसंबर 1970 को इंदिरा गाँधी ने अपने आप को एक उम्मीदवार घोषित कर दिया था जबकि 7 जनवरी 1971 को उनके 'ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी ' यशपाल कपूर कि प्रचार में भूमिका सामने आयी.
क्या ये उस दौर में भी अधिकतम सज़ा नहीं थी ?
इंदिरा गाँधी के कटु आलोचक और देश के सुप्रसिद्ध पत्रकार कुलदीप नैयर जो इमरजेंसी के चपेट में भी आये थे, उन्होंने लिखा था- "चुनाव से जुड़ा कानून कितना ही सख़्त क्यों न हो, मेरा अपना ख़्याल था कि यह फैसला एक चींटी को मारने के लिए हथोड़े का इस्तेमाल करने की तरह था ..''
इस फैसले के बाद इमरजेंसी आयी जो कभी नहीं आनी चाहिए थी. कांग्रेस खुद इसे भूल मानती है.
आज राहुल गाँधी पर जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कह रहा इस मामले में अधिकतम सजा क्यों दी गई...
इसी तरह ये भी याद करिये कि इंदिरा गाँधी के 'ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी ' माइक -पंडाल में भागीदारी के कारण क्या उन्हें भी राहुल की तरह अधिकतम सज़ा नहीं दी गयी थी ?
नयी पीढ़ी को इस फैसले को पढ़ना चाहिए कि इंदिरा गाँधी को किस कारण, क्यों और कैसे अधिकतम सज़ा दी गयी .सिर्फ पोता ही नहीं इतिहास में दादी भी अधिकतम सज़ा से गुज़री हैं.


