विचार / लेख
डॉ. आर.के. पालीवाल
पिछ्ले कुछ समय से जघन्य घटनाओं में इतनी तेजी आई है कि पिछली घटना के जख्म सूखने के पहले नया जघन्य कृत्य दिलोदिमाग के साथ आत्मा को लहूलुहान कर देता है। जघन्य घटनाओं की सीरीज सभी नागरिकों के साथ साथ देश की अंतरराष्ट्रीय छवि के लिए भी बेहद चिंता का विषय है।अभी मणिपुर की हिंसा का मामला ठंडा नहीं पड़ा था जहां पुलिस पर हिंसक भीड़ से निरीह महिलाओं को बचाने के बजाय उन्हें भीड़ के हवाले करने के हृदय विदारक समाचारों ने न केवल पुलिस बल की संरक्षक छवि के लिए शर्मिंदगी का काम किया था बल्कि देश को भी शर्मसार किया था।
इस जघन्यतम घटना के बाद भी एफ आई आर करने में बहुत देरी और घटना को अंजाम देने की भीड की अगुवाई करने वालों को पकडऩे में हुए अत्यधिक विलंब से सर्वोच्च न्यायालय सहित देश के तमाम संवेदनशील नागरिकों का दिल छलनी हुआ है। पुलिस और अन्य सुरक्षा बलों से किसी समुदाय, शांति प्रिय आम नागरिकों और अदालतों का विश्वास कम होना किसी भी समाज और देश के लिए बदनामी और बदहाली का सबब है चाहे वह भ्रष्टाचार के कारण हो या राजनीतिक दबाव के कारण अथवा नफरत की विचारधारा के सैन्य बलों के मन में प्रवेश के कारण हो।
इधर जयपुर एक्सप्रेस ट्रेन में यात्रियों की सुरक्षा के लिए तैनात रेलवे प्रोटेक्सन फोर्स के जवान चेतन सिंह द्वारा अपने वरिष्ठ ए एस आई और धर्म विशेष के तीन निर्दोष यात्रियों की निर्मम हत्या ने रेलवे में यात्रा करने वाले करोड़ों यात्रियों को गहरा सदमा पहुंचाया है। शुरूआती समाचारों के अनुसार इस जवान में भी समुदाय विशेष के प्रति नफरत की भावना थी जिसका भयंकर दुष्परिणाम चार लोगों की निर्मम हत्या के रुप में फलित हुआ है। कुछ दिन पहले ही सर्वोच्च न्यायालय ने नफरती भाषणों पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए देश भर के पुलिस प्रशासन के अधिकारियों को दिशा निर्देश जारी किए थे कि नफरती भाषण देने वालों पर वे स्वत: संज्ञान लेकर कार्यवाही करेंगे। भले ही सर्वोच्च न्यायालय ने इस तरह के दिशा निर्देश जारी कर दिए हैं लेकिन उसके बावजूद इस तरह के मामलों में पुलिस प्रशासन के लिए सत्ताधारी दल के नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करना तब तक संभव नहीं है जब तक पुलिस प्रशासन पर सत्ताधारी नेताओं का सीधा नियंत्रण है। यही कारण है कि दिल्ली में केंद्र और राज्य सरकार प्रशासन के अधिकारियों को अपने नियंत्रण में रखने के लिए आठ साल से लगातार हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में मुकदमेबाजी कर रहे हैं। जब तक पुलिस सहित सैन्य बलों को संविधान के अनुसार जन सेवा का अवसर नहीं दिया जाएगा तब तक वर्तमान स्थितियों में सुधार दूर की कौड़ी है।
चेतन सिंह नाम के जिस सिपाही ने अपनी सरकारी राइफल से चार लोगों की निर्मम हत्या की है उसके अंदर नफऱत का कितना जहर भरा था इसका हल्का सा अनुमान उन वीडियो से होता है जिसमें वह अपने अंदर भरे जहर को वैसे ही उगल रहा है जैसे थोड़े झीने परदे में लपेटकर बहुत से नेता सार्वजनिक भाषणों और कई पत्रकार और तथाकथित समाजशास्त्र के विशेषज्ञ आए दिन चैनलों और सोशल मीडिया पर परोसते हैं। चेतन सिंह का अवचेतन रातों रात परिवर्तित नहीं हुआ होगा और न वह अपने आप में अपवाद है। ऐसी नफऱत का जहर देश की बडी आबादी में फैल चुका है जिसकी परिणति मणिपुर और मेवात में बड़े पैमाने पर हुई है। चेतन सिंह को मानसिक रोगी बताकर अपवाद साबित करने की कोशिश भी शुरु हो गई है। यदि वह मानसिक रोगी था तो उसे खतरनाक हथियार के साथ रेल यात्रियों की सुरक्षा में क्यों तैनात किया गया था! यह यक्ष प्रश्न है। बहरहाल इस घटना के बाद रेल और हवाई यात्रा में सशस्त्र जवान देखकर यात्रियों के आश्वस्त होने के बजाय आशंकित होना स्वाभाविक है। यह बहुत खतरनाक स्थिति है।


