विचार / लेख
नासिरुद्दीन
अपनी मृत्यु से एक दिन पहले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पहले सरसंघचालक डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने गोलवलकर को कागज़ की एक चिट पकड़ाई.
इस वक्त हम हिंसा से घिरे हैं। भारत के पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में लंबे वक्त से हिंसा हो ही रही है।
इस हिंसा के साथ देश के अलग-अलग हिस्सों में जो हो रहा है, वह भी कम फिक्र करने वाला नहीं है। पिछले चंद दिनों की ही कुछ घटनाओं पर नजर डालते हैं।
दृश्य-एक-एक व्यक्ति ट्रेन के ऊपर वाली सीट पर नमाज़ पढ़ रहा है। नीचे की सीट पर कुछ नौजवान बैठे हैं। वे जोर-जोर से भजन गा रहे हैं। प्रतिक्रिया जानने की बेचैनी में वे बीच-बीच में ऊपर की ओर भी देखते हैं। किसी को भजन याद नहीं है। वे मोबाइल का सहारा ले रहे हैं। बेताल तालियाँ बजा रहे हैं। वे सभी फैलकर बैठे हैं। उनके सामने एक बुजुर्ग महिला ट्रेन के फर्श पर बैठी है।
दृश्य दो: एक व्यक्ति खून से लथपथ पड़ा है। उसके पास एक सिपाही खड़ा है। वह बता रहा है कि यह कौन लोग हैं और इनसे बचने के लिए किन्हें वोट देना चाहिए। सिपाही के ठीक पीछे कुछ लोग बैठे हैं। सामने लोग बैठे हैं।
इस सिपाही पर तीन अलग-अलग बोगियों में चार लोगों की हत्या का आरोप है। इनमें एक उसका वरिष्ठ अफ़सर है। तीन एक ही धर्म के मानने वाले लोग हैं। जैसा अब तक सामने आई ख़बरें बता रही हैं, वह इनकी पहचान उनकी वेशभूषा से करता है। तब मारता है।
दृश्य तीन-एक और वीडियो है। उस वीडियो में जो शख़्स है, उस पर एक ही मजहब के दो लोगों को जलाकर मारने का आरोप है। वह ‘गो-रक्षक’, ‘धर्म रक्षक’ के रूप में मशहूर है। वह पिछले कई महीने से दो राज्यों की पुलिस की पकड़ से दूर है।
वह एक जुलूस में शामिल होने की बात कर रहा है। जिस इलाके से जुलूस निकलना है, वहाँ ज़बर्दस्त तनाव है। जुलूस निकलता है। हिंसा होती है। उसके बाद वीडियो और अफवाहों का दौर शुरू होता है। हिंसा की आग दिल्ली के आसपास के कई इलाकों में फैल जाती है। कई लोग हताहत हैं।
क्या ये ‘छिटपुट’ घटनाएँ हैं?
ऐसी घटनाएँ हर कुछ दिनों पर हमारे सामने आ जा रही हैं। हमें लगता है कि ये ‘छिटपुट’ घटनाएँ हैं। ‘छिटपुट’ लोग शामिल हैं। इनका कोई ठोस वजूद नहीं हैं। या यह हल्ला मचाने वाली घटनाएँ नहीं हैं।
ऊपर गिनाई गई तीनों घटनाएँ भी अलग-अलग क्षेत्र की हैं। इसलिए लग सकता है कि यह अलग-अलग ही हो रही हैं। सच्चाई ऐसी नहीं है। इन तीनों में एक बात है। तीनों की जड़ में नफरत है। एक धर्म और उसके मानने वालों के प्रति नफरत है। एक-दूसरे को बर्दाश्त न करने की चाहत है। बल्कि दूसरे को खत्म करने या दोयम दर्जे का बना देने की हसरत है।
नहीं थोड़ा ढके-छिपे तौर पर हिंसा शामिल है। यह कोई सामान्य हिंसा नहीं है। यह नफरत से उपजी हिंसा है। नफरत का आधार बस एक धर्म का होना है। यह जहरीली मर्दानगी से भरी बेखौफ हिंसा है।
सवाल है, यह नफरत इस मुकाम पर कैसे पहुँच गई कि उसने खुलेआम हिंसा का रूप ले लिया है? इस हिंसा की बात करने में कोई लाज-लिहाज़ नहीं। कोई डर नहीं।
देश-समाज को इस हालत तक पहुंचाने में सबसे बड़ी भूमिका ताकत की जगहों पर बैठे लोगों की है। इनमें लीडर और मीडिया का बड़ा तबका शामिल है। अगर यह बात कुछ अटपटी लग रही हो तो हम कुछ सवालों पर गौर कर सकते हैं।
जो नफरत बो रहे हैं, वे इतना बेखौफ कैसे हो गए कि हत्या का मुलजिम ख़ुलेआम वीडियो बनाकर लोगों को आह्वान करता है? कैसे एक सिपाही हत्याएँ करने के बाद उन लोगों के नाम लेता है, जो सत्ता में हैं?
कैसे एक व्यक्ति हाथ में गँड़ासा लिए हुए यह कहने की हिम्मत कर पा रहा है कि बदला लिया जाएगा? कैसे नौजवानों का एक समूह इबादत में बाधा पहुँचा रहा है? या कैसे सोशल मीडिया के अलग-अलग मंचों पर अलग-अलग लोग मारने और बदला लेने की बात कर रहे हैं?
इसीलिए यह कहना ज़्यादा सटीक होगा कि इस नफरत का सोता नीचे नहीं, ऊपर है। उसने हमारी पूरी सोच को दो खानों में बाँट दिया है। टीवी पर होने वाली बहसों का जोर है कि अब कुछ लोगों का ‘अंतिम उपाय’ किया जाना चाहिए। यह ‘अंतिम उपाय’ का विचार, नफरत का फैलाव नहीं है? हिंसा का उकसावा नहीं है? नफरत और हिंसा को जायज़ ठहराना नहीं है? मगर ऐसा खुलेआम हो रहा है।
क्या वह मानसिक रूप से सेहतमंद नहीं है?
जैसे ही वीडियो आया, ट्रेन में हत्याओं के अभियुक्त सिपाही के बारे में कहा जाने लगा कि वह मानसिक रूप से सेहतमंद नहीं है। ऐसा कहने वालों का मकसद साफ है, वे उसके अपराध को नफरती अपराध या सोचा-समझा अपराध मानने को तैयार नहीं है। वे उसे इस शक के बिना पर उसके पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। मगर क्या वह वाकई सेहतमंद नहीं है?
जी, वह वाकई सेहतमंद नहीं है। मानसिक तौर पर और दिल से वह एक सामान्य इंसान जैसा नहीं बचा। वह नफरत से भरे हिंसक इंसान में बदल गया है।
हिंसक मर्दानगी, उसके गले का हार बन गई है। जहाँ उसे कुछ समुदाय के लोग दुश्मन नजर आने लगे हैं। उसकी जिम्मेदारी सबकी हिफाजत करने की है। मगर उसे लगता है कि कुछ लोगों को मारकर ही बाकियों की हिफाजत की जा सकती है। वह ऐसा कर देता है। बेझिझक।
वह वाकई दिमागी तौर पर सेहतमंद नहीं है। तब ही तो वह एक डिब्बे से दूसरे डिब्बे और दूसरे से तीसरे डिब्बे में एक ही धर्म के लोगों की पहचान कर लेता है। उन पर गोलियाँ चलाता है। उनकी हत्याएँ करता है।
दिमागी रूप से सेहतमंद इंसान किसी की जान नहीं ले सकता है। वह धर्म या जाति या क्षेत्र देखकर नफरत नहीं कर सकता है। मगर ऐसा अस्वस्थ, वह अकेला सिपाही नहीं है। यहीं भूल की गुंजाइश है। वे नौजवान, जिन पर देश का भविष्य है, वे भी दिमागी रूप से सेहतमंद नहीं बचे। वे लोग जो सिपाही को गोली मारते देखते रहे। उसका भाषण सुनते रहे। अपने काम में लगे रहे। वे भी दिमागी तौर पर सेहतमंद कैसे कहे जा सकते हैं?
टीवी की बहसें तो हैं ही, व्हाट्सएप, फेसबुक जैसे ‘सामाजिक मंच’ ने समाज के बड़े तबके को ऐसा ही दिमागी तौर पर बीमार बना दिया है। वे ऐसे ही होते जा रहे हैं। नफरत के वाहक। नफरत के तमाशबीन। नफरत की घटनाओं में उनकी रजामंदी शामिल है।
चूँकि वे सीधे-सीधे किसी पर हमलावर नहीं हो पाते तो वे अपनी चुप्पी से ऐसे लोगों और उनके ख्य़ाल के साथ एकजुटता दिखाते हैं। वरना ट्रेन के एक डब्बे से दूसरे डब्बे और दूसरे से तीसरे डब्बे तक जाने की हिम्मत वह सिपाही नहीं जुटा पाता। या कोई उन नौजवानों को कह ही देता कि दो-तीन मिनट रुक जाइए, फिर पूरे रास्ते भजन गाइए।
सबसे खतरनाक है, वजूद पर खतरा महसूस करना
एक बात सबसे खतरनाक हो रही है।
समाज के एक तबके को लगने लगा है कि दूसरे का वजूद, उनके अस्तित्व के लिए ख़तरा है। अगर एक रहेगा तो दूसरा नहीं बचेगा। दिलचस्प है, अपने वजूद पर जिन्हें ख़तरा लग रहा है, वे संख्या में बहुत ज़्यादा हैं। लेकिन नफरत ने उन्हें यह मानने पर बेबस कर दिया है कि उनका सब कुछ ख़तरे में है। वे खतरे में हैं। उनका धर्म खतरे में है। उनका कारोबार खतरे में है। उनके घर की स्त्रियाँ खतरे में हैं। ऐसा नहीं है कि यह सब इकतरफा ही हो रहा है। दूसरी तरफ भी ऐसी प्रक्रिया है। मगर क्या दोनों प्रक्रिया और दोनों का वजन तराजू के पलड़े पर एक जैसा ही है? इसका जवाब हमें ख़ुद ईमानदारी से देना होगा।
नफरत क्या करती है?
नफरत हमें उन बातों पर यकीन करना सिखा देती है, जो सच नहीं हैं। या जो आधा सच हैं। नफरत हमें दोस्त नहीं, दुश्मन तलाशने पर मजबूर करती है।
नफरत हमें लोगों को अपना नहीं, पराया बनाना सीखाती है। नफरत हमें जोड़ती नहीं, तोड़ती है। बाँटती है। वह हमें सभ्य नहीं, बर्बर बनाती है। नफरत हमारी तर्कबुद्धि छीन लेती है। सोचने-समझने की हमारी ताकत हर लेती है। हमें पता भी नहीं चलता, और हम इंसान से नफरती कठपुतली में बदल जाते हैं।
इस कठपुतली की डोर कहीं और होती है। और ये कठपुतली किसी और के इशारे पर नाचती है। यही नहीं, नफरत हमें इंसानी गुणों, जैसे- प्रेम, सद्भाव, सौहार्द्र, अहिंसा और बंधुता से बहुत दूर कर देती है। तो क्या नफरत सिर्फ नुकसान करती है? नहीं। जाहिर है, नफरत कुछ लोगों और समूहों के लिए फायदेमंद है तब ही वह सीना तानकर जहरीली मर्दानगी के साथ बेखौफ यहां-वहां नजर आ रही है। फायदा चाहे जितना हो, नुकसान उससे बहुत बड़ा है। वह जैसा घाव दे रहा है या देने जा रहा है’ उसका दर्द दशकों तक हमें झेलना है।
तय है कि अगर यह चलता रहा तो यह नफरत हमें कहीं का नहीं छोड़ेगी। पहले कुछ खास तरह के लोग मारे जाएँगे। फिर वह सबको मारेगी। इसलिए तय हम सबको करना है, हम सह-अस्तित्व या साझा जीवन चाहते हैं या खत्म हो जाना। (bbc.com/hindi/)


