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कंविंसिंग तथ्य मिला तो मैं अपनी धारणा बदलने तैयार
03-Aug-2023 3:57 PM
कंविंसिंग तथ्य मिला तो मैं अपनी धारणा बदलने तैयार

पुष्य मित्र

यह सरल व्याख्या है। सच यह है कि पशुपालक आर्य पश्चिम से आए, वे बहुत मुश्किल से बनारस तक ही फैल पाए। मनु कहते थे नारायणी यानी गंडक के पार व्रात्य प्रदेश है, यानी वर्जित इलाका। यानी बिहार, बंगाल, उड़ीसा, असम वगैरह। जहां बौद्ध, जैन, आजीवक, लोकायत जैसे लौकिक धर्म विकसित हुए। दक्षिण में विंध्याचल बाधा थी। उधर शिव थे, जिन्हें लेकर शंकराचार्य उत्तर आए।

गंडक के पूरब बाढ़ का इलाका था, तो मछलियां खानी ही पड़ती थी। दक्षिण में पठार थे, सिर्फ खेती से गुजारा मुश्किल था। यही सब व्यवहार बना। पश्चिम वाले वैष्णव, पूरब वाले शक्ति के उपासक, वो देवियां जो बलि मांगती थीं। और दक्षिण में शिव।

आज भी हिंदू धर्म इन्हीं तीन हिस्सों में बंटा है। दिलचस्प है सनातन की राजनीति करने वालों का असर सिर्फ पश्चिमी इलाकों में है। न पूरब में वे जड़ जमा पाए न दक्षिण में। क्योंकि उन्होंने न शक्ति को समझा, न शिव को। शाकाहार और वैष्णव संप्रदाय के आधार पर कोई कभी सभी हिन्दुओं का नेता नहीं बन सकता। मुश्किल है।

खासकर पूरब का इलाका जिसने हमेशा मनु को चुनौती दी। जहां बुद्ध, महावीर, पाश्र्वनाथ हुए। यहां तो बगावत की ढाई हजार साल की परंपरा है।

यह कहा जा सकता है कि बुद्ध, महावीर जैसे अहिंसक विचारकों के इलाके में मांसाहार क्यों? तो उसका जवाब यह है कि बाद के दिनों में बौद्ध ही वामाचारी हो गए। वामाचार में मांस, मदिरा सब स्वीकृत था। जैन विस्थापित हो गए।

1. मैं  इस बात को लेकर बहुत कंविंस नहीं हूं कि दलितों और पिछड़ों पर जानबूझकर या किसी तरह का दबाव देकर उन्हें चूहा, घोघा, बीफ, पोर्क या चींटी खाने के लिए विवश किया।

2. मेरा अपना आग्रह यह है कि मुशहरों का चूहा खाना, मल्लाहों का घोघा और केकड़ा खाना, डोम जाति के लोगों का सूअर खाना काफी हद तक उनकी सामाजिक पसंद का मसला है और जब से हमारे इलाके में रामनामी परंपरा के लोगों ने कंठी का प्रचार किया और वे वैष्णव हुए, वे कमजोर हुए और उनकी पीढिय़ां कुपोषित हुईं। (बाकी पेज 8 पर)

मैंने अपने बचपन में किसी मल्लाह, मुशहर या डोम कमजोर या कुपोषित नहीं देखा था।

3. संसाधनों का तर्क भी मेरे गले नहीं उतर रहा। क्योंकि महज सौ साल पहले तक मेरे ही पूर्णिया जिले में जमींदार खेती के लिए किसानों को ढूंढ-ढूंढकर लाते थे और बसाते थे। जब ट्रैक्टर जैसे उपकरण नहीं होंगे तब हजार बीघा जमीन पर खेती करके अकेले खा लेना इतना आसान भी नहीं रहा होगा। मैंने अपने बचपन में देखा है कि खेतिहार मजदूरों को मजदूरी भी अनाज में मिलती थी. तब पैसों का इतना प्रचलन नहीं था।

4. हां जिन जातियों का पेशा बहुत सख्ती से तय कर दिया गया कि वे खेती नहीं करेंगे. चाहे वे निषाद हों, डोम हो, मुशहर हों, उनके साथ जरूर दिक्कतें हुई होंगी। और उन्होंने अपने पेशे के इर्द गिर्द पाये जाने वाले पशुओं को आहार बनाया होगा. मगर पशुपालक यादव, खेतिहार कुर्मी, कोइरी, धानुख आदि के लिए शाकाहार हमेशा उपलब्ध रहा।

मेरी व्याख्या सवर्णवादी हो सकती है। मगर अभी तक मुझे कोई ऐसा कंविंसिंग आलेख नहीं मिला या कोई ऐसा सूत्र जिससे मैं यह मान लूं कि ब्राह्मणों या सवर्णों ने खेती के संसाधनों पर कब्जा कर लिया, जिसके कारण मजबूरन दलितों-पिछड़ों को मांसाहार के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके इतर मैं यह मानता हूं कि ब्राह्मणों ने अन्य जाति के लोगों के दिमाग पर कब्जा किया और उन्हें अपनी मान्यताओं के आधार पर जीने के लिए मजबूर किया। उनके लिए तय किया कि वे इसी तरह का काम कर सकते हैं, यही भोजन उनके लिए उचित है, ग्राह्य है। ब्राह्मणों की अपनी ज्ञान परंपरा में भी वैसे पोषण से अधिक पवित्रता पर जोर है। इसलिए अभी तक यह मामला संसाधनों पर कब्जा वाला नहीं लगता। आगे कोई कंविंसिंग तथ्य मिला तो मैं अपनी धारणा बदलने के लिए तैयार हूं।


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