विचार / लेख

वे शाकाहारी बने रह सकते थे, अन्य जातियाँ नहीं...
03-Aug-2023 3:53 PM
वे शाकाहारी बने रह सकते थे,  अन्य जातियाँ नहीं...

 अणु शक्ति सिंह

मेरे विचार से मांसाहार और शाकाहार का विवाद केवल और केवल धर्म-राजनीति का षडय़ंत्र है।

कई वैज्ञानिक शोधों से साबित हो चुका है कि खान-पान की अभिरुचियों का सीधा संबंध व्यक्ति की स्थानीयता और उसके भौगोलिक-सामाजिक परिदृश्य/मूल से जुड़ा हुआ है।

समुद्री स्थानों पर जहाँ शाक-सब्जी की कमी है, जलीय भोजन मुख्य स्रोत है खाने का।

ठंडे प्रदेशों में वसा की आवश्यकता शरीर को गर्म रखने के लिए होती है, अत: रेड मीट उन इलाकों के खाने में स्वत: ही उतर आया। यूरोपीय या ठंडे भारतीय इलाकों के भोजन पर नजर डालिए।

अब एक उदाहरण बिहार से। उत्तर बिहार अमूमन बाढ़ प्रभावित इलाका रहा है। सावन यानी जुलाई-अगस्त में चढ़ता पानी आश्विन माने सितंबर-अक्तूबर तक ही उतरता है।

बाढ़ में सब्जियाँ तो नहीं मिलती, हाँ मछली की बहुतायत होती रही है। पानी में कटने वाला मोटा गरमा धान भी। जाहिर है उत्तर बिहार में लगभग हर वर्ग के लोग बिना किसी भेद के मछली-भात खाते हैं (ब्राह्मण भी)। यहाँ मछली ‘शगुन’ का भी हिस्सा है।

बचपन में किसी कहानी में पढ़ा था कि ध्रुवों पर सील फैट का ख़ूब इस्तेमाल होता है, रौशनी के साथ-साथ औषधि के लिए भी।

बहुत अच्छा है, आप शाकाहार करते हैं पर दूसरे की प्लेट देखकर नाक-भौं सिकोडऩे से आप अच्छे नहीं लगते हैं। सच कहूँ तो आप इस तरह काफी हिंसक नजऱ आते हैं।

धर्म का ही जिक्र करेंगे तो आपका सनातन ऐसे कई उदाहरण प्रस्तुत करता है जब मांसाहार को चुना गया। एक कथा के अनुसार कृष्ण ने स्वयं मांस का भोग स्वीकार किया है।

अंग्रेजी में एक कहावत है, डोंट लेट योर फूड गेट कोल्ड वरीइंग अबाउट व्हाट इज ऑन माय प्लेट।

अर्थात, मेरी थाली के भोज्य की चिंता में अपना खाना मत ठंडा कीजिए।

खाइए न आपको जो खाना है। लोगों की चिंता सरकार पर छोडि़ए। कुछेक पशु-पक्षियों के अतिरिक्त बाकी सभी शिकार पर क़ानूनन रोक है। इस देश में मांसाहार और शाकाहार का सारा वितंडा उत्तर भारत के मैदानी सवर्णों और दक्षिण भारत के ब्राह्मणों का फैलाया हुआ है।

उत्तर भारत में उनके पास सबसे अधिक उपजाऊ ज़मीनें थीं। तमाम फसल और शाक-सब्जी उनके हवाले हुआ।

क्यों इस इलाके के दलित मांसाहारी हुए, यह बड़ा सवाल है। जातिवाद का असर क्या होता है, कैसे यह आहार श्रृंखला पर प्रभाव डालता है, आराम से नजर आ जाएगा।

इसी तरह दक्षिण भारत के ब्राह्मण के हवाले अधिकतम संसाधन आए। वे शाकाहारी बने रह सकते थे। अन्य जातियाँ नहीं।

शाकाहार की परम्परा को ठीक से परखा जाए तो जानवरों की जान बख़्शने की कीमत पर लगातार मनुष्यों को दबाये जाने की बात भी साफ नजर आ जाएगी।

कुछ लोग तमाम प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कर पूरे समाज के हिस्से का खाते रहे। अन्य वर्ग सूअर, चूहे, घोंघे से लेकर चीटियों तक में पोषक तत्व खोजते रहे।

जातिवाद इस देश में तब भी तगड़ा था। अब भी तगड़ा है। आहार तब भी प्रभावित था। अब भी प्रभावित है।

(उत्तर भारत से यहाँ सीधा अर्थ उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, पंजाब सरीखे गंगा के इलाक़े से है जिन्हें गंगेज़ प्लेट्यू भी कहा जाता है। बिहार बंगाल अपवाद हैं।)

(जरूरी है कि थोड़ा पढ़ा-समझा जाए मनुष्य और उसकी भौगोलिकता-सामाजिकता के बारे में)


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