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कनक तिवारी लिखते हैं- दिल्ली कथा में संविधान व्यथा
03-Aug-2023 3:50 PM
कनक तिवारी लिखते हैं-  दिल्ली कथा में संविधान व्यथा

 कांग्रेस और भाजपा की सरकारें केन्द्र में एक पार्टी की सरकार होने पर भी मिलीजुली कुश्ती करती रहीं। केजरीवाल के तेवर खामोशी, समझौते, खुशामदखोरी या समर्पण के नहीं हैं। अपने पुराने वाले पृथक फैसले में भी समृद्ध पैतृक परंपरा तथा कुशाग्र बुद्धि के जज डी वाय चंद्रचूड़ ने कुछ अतिरिक्त बातों का समावेश किया था। उन्होंने साफ  किया कि आखिरकार जनता है जिसके सबसे बड़े और अंतिम अधिकार हैं कि उसकी इच्छा से कोई लोकप्रिय सरकार कैसे चले। उनका एक तर्क यह भी था कि संवैधानिक जिम्मेदारियों को लेकर चुने गए प्रतिनिधियों को जवाबदेह होना पड़ता है, संविधान प्रमुख को नहीं।

दिल्ली विधानसभा, मंत्रिपरिषद, उपराज्यपाल और केन्द्र सरकार को लेकर गैरजरूरी, पेचीदा, लोकतंत्र विरोधी और सुप्रीम कोर्ट की अनदेखी करता मामला चखचख में है। दिल्ली विधानसभा को राज्यों की विधानसभाओं के मुकाबले कम अधिकार हैं। दिल्ली में आम आदमी की बार बार सरकार आने से पार्टी और इसके नेता अरविन्द केजरीवाल को कमतर स्थिति नागवार गुजरती लगी। उपराज्यपाल दिल्ली सरकार पर लगातार नकेल डालते रहे। चिढक़र आम आदमी पार्टी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से संविधान के अनुच्छेद 239 क-क की व्याख्या का अनुरोध किया। सुप्रीम कोर्ट ने उपराज्यपाल और केन्द्र सरकार के खिलाफ  फैसला किया। इसके बावजूद मेरी मुर्गी की डेढ़ टांग कहते केन्द्र सरकार और उपराज्यपाल ने दिल्ली सरकार को काम नहीं करने दिया। मामला फिर सुप्रीम कोर्ट गया। ताजा फैसले में कोर्ट ने लगभग पुराना फैसला (2018) दोहराते हुए उपराज्यपाल और केन्द्र सरकार की खिंचाई करते कहा जितने भी अधिकार विधानसभा को दिए गए हैं। उनका उपयोग दिल्ली सरकार करेगी। उसमें रोड़ा अटकाने की जरूरत नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट में पिछले दिनों गर्मी की छुट्टी होने से आनन-फानन में केन्द्र सरकार ने संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि क्रमांक 41 को वृहत्त दिल्ली परिक्षेत्र में सेवारत षासकीय सेवकों को केन्द्र सरकार के पाले में कर लिया। इस तरह सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अनदेखी कर दी। मजबूर होकर आम आदमी सरकार को फिर सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा है। वहां काफी समय लगने की संभावना है। मोदी सरकार ने ढिठाई के साथ संविधान का कचूमर निकालते, लोकतंत्र में फेडरल व्यवस्था का मजाक उड़ाते, सुप्रीम कोर्ट की हेठी करते अपना ढर्रा कायम रखा है। वह लोकतंत्र विरोधी और कॉरपोरेटी सामंतवाद का घिनौना उदाहरण है। अरविन्द केजरीवाल का मुख्य आरोप है कि जितने अधिकार पिछली कांग्रेसी और भाजपाई दिल्ली सरकारों के पास थे। वे भी एक के बाद एक आम आदमी पार्टी की सरकार से केन्द्र द्वारा छीन लिए गए।

दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने की ओर देखता मौजूदा अनुच्छेद 239 क क संविधान के 74 वें संशोधन के जरिए आया। केन्द्रीय गृहमंत्री शंकरराव चव्हाण ने संशोधन प्रस्ताव रखते दो टूक कहा फिलहाल दिल्ली का प्रशासन दिल्ली एडमिनिस्ट्रेशन एक्ट 1966 के तहत चल रहा है। मेट्रोपोलिटन काउंसिल पशासक को केवल सलाह दे सकती थी। केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के जज आर. एस. सरकारिया की अध्यक्षता में 24 दिसम्बर 1987 को कमेटी गठित की। उसे एस बालाकृष्णन ने 14 दिसम्बर 1989 को पूूरा किया। उन्होंने कहा दुनिया के अन्य देशों की राष्ट्रीय राजधानियों के मद्देनजर ही दिल्ली की संवैधानिक स्वायत्ता पर फैसला मुनासिब होगा। विषेषज्ञ समितियों और कमेटियों ने संविधान के संघीय चरित्र को ध्यान में रखते आगाह किया है दिल्ली में सत्ता प्रबंधन और जनआकांक्षाओं के बीच समीकरण में केन्द्र की सक्रिय भूमिका बेदखल नहीं हो सकती।

संविधान में मंत्रिपरिषद और राष्ट्रपति के रिष्तों के लिए अनुच्छेद 74 खुलासा करता है। ‘‘राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रि-परिषद् होगी जिसका प्रधान, प्रधानमंत्री होगा और राष्ट्रपति अपने कृत्यों का प्रयोग करने में ऐसी सलाह के अनुसार राज्यपाल और राज्य मंत्रिपरिषद के रिष्तों का विवरण वाला अनुच्छेद 163 कहता है ‘राज्यपाल को अपने कृत्यों का प्रयोग करने में सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रि-परिषद होगी जिसका प्रधान, मुख्यमंत्री होगा। ‘डॉ. अंबेडकर ने जोर देकर कहा राष्ट्रपति की जगह गर्वनर के ऊपर भी मंत्रिपरिषद की सलाह पर फैसले लेने की बाध्यता होगी। इसी क्रम में अनुच्छेद 239 क क (4) दिल्ली के लिए कहता है-‘उप-राज्यपाल की, अपने कृत्यों का प्रयोग करने में सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रि-परिषद् होगी। परन्तु उप-राज्यपाल और उसके मंत्रियों के बीच किसी विषय पर मतभेद की दशा में, उप राज्यपाल उसे राष्ट्रपति को भेजेगा और राष्ट्रपति द्वारा उस पर किए गए फैसले के अनुसार कार्य करेगा। ऐसा निश्चय होने तक किसी आवश्यक मामले में, ऐसी कार्रवाई करने या निर्देश देने के लिए, जो आवश्यक समझे, सक्षम होगा।‘‘

केजरीवाल भारतीय लोकतंत्र में दिल्ली जैसे राज्य की संभावनाओं को संविधानेतर ढंग से भी बुनना नहीं चाहते। केवल तीन बिन्दुओं पुलिस, विधि तथा व्यवस्था और राजस्व के महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिकार नहीं होने पर भी केन्द्र सरकार के लेफ्टिनेंट गवर्नर के हाथों विधानसभा, मंत्रिपरिषद और दिल्ली के नागरिकों की अश्वगति की ख्वाहिशों पर सईस की नकेल रही है। राजस्व उगाही के अरबों रुपयों का इस्तेमाल विरोधी पार्टी भाजपा के नुमाइंदे पुलिस, राजस्व उगाही और कानून तथा व्यवस्था के नाम पर अधिकारियों को भडक़ा फुसलाकर राज्य सरकार के खिलाफ  काम ही नहीं करने दे रही थी। तो क्या संविधान टुकुर-टुकुर देखता रहता? नौकरशाह उपराज्यपाल को गफलत रहती कि विधानसभा कोई कानून बनाए। वे दखल दे सकते हैं। वे समझते होंगे कि वे फाउल की सीटी बजा देंगे और गेंद को अंपायर राष्ट्रपति के मैदान में ठेल देंगे। इस तरह 70 में से 67 सीटें जीतने वाली केजरीवाल सरकार का मुर्गमुसल्लम बनाया जा सकेगा। उपराज्यपाल चूक गए क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने ठीक पकड़ा। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार संविधान की समझ के लिए लोकतंत्रीय भावना, सामूहिक नागरिक प्रतिनिधित्व, संवैधानिक चरित्र और सत्ता का विकेन्द्रीकरण को लेकर कोई समझौता नहीं किया जा सकता। दिल्ली पर संसद की विधायी मर्यादाओं का दबाव भी है।

महत्वपूर्ण फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ सैद्धान्तिक स्थापनाएं की हैं। संविधान की प्रस्तावना में शुरू में ही लिखा है कि हम भारत के लोग अपना संविधान खुद को दे रहे हैं। यही समीकरण सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया। उपराज्यपाल को असहमत होने के असीमित अधिकार मिल जाएंगे तो लोकतंत्र की मर्यादा ही नहीं रहेगी। सुप्रीम कोर्ट में केन्द्र और राज्य सरकारों को परस्पर सहयोग से काम करने की हिदायत भी दी क्योंकि भारत एक संघीय राज्य है। कई ऐसे विषय हैं जो दिल्ली विधानसभा की शक्ति में रहते हुए भी संसद द्वारा बनाए गए कानूनों से प्रभावित होंगे। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बहुत पहले आ जाता तो दिल्ली प्रशासन पर छाई धुंध नागरिक अधिकारों के लिए साफ की जा सकती थी।

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने दिल्ली विधानसभा, राज्य सरकार और उप राज्यपाल के संवैधानिक रिश्तों को लेकर दूध का दूध और पानी का पानी पहले 2018 में भी कर दिया था। केजरीवाल सरकार ने अपने संवैधानिक अधिकारों की ठीक मीमांसा की है। उपराज्यपाल केन्द्र की कठपुतली हैं। कांग्रेस और भाजपा की सरकारें केन्द्र में एक पार्टी की सरकार होने पर भी मिलीजुली कुश्ती करती रहीं। केजरीवाल के तेवर खामोशी, समझौते, खुशामदखोरी या समर्पण के नहीं हैं। अपने पुराने वाले पृथक फैसले में भी समृद्ध पैतृक परंपरा तथा कुशाग्र बुद्धि के जज डी वाय चंद्रचूड़ ने कुछ अतिरिक्त बातों का समावेश किया था। उन्होंने साफ  किया कि आखिरकार जनता है जिसके सबसे बड़े और अंतिम अधिकार हैं कि उसकी इच्छा से कोई लोकप्रिय सरकार कैसे चले। उनका एक तर्क यह भी था कि संवैधानिक जिम्मेदारियों को लेकर चुने गए प्रतिनिधियों को जवाबदेह होना पड़ता है, संविधान प्रमुख को नहीं। जस्टिस चंद्रचूड़ ने एक महत्वपूर्ण वाक्य यह भी लिखा था कि राज्य मंत्रिपरिषद की षक्ति और दिल्ली विधानसभा की कार्यपालिक शक्ति एक दूसरे में अंतर्निहित हैं। उन्हें एक दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता। ऐसे में विधानसभा और मंत्रिपरिषद की उपादेयता, अस्तित्व और लोकतांत्रिक भूमिका का क्या होगा? फिर भी अल्लाह जाने क्या होगा आगे! यदि राज्यसभा में सरकार का अध्यादेष वाला बिल गिरा देने की केजरीवाल की कोषिष रंग लाएगी तो ही लोकतंत्र की रक्षा हो सकती है। बाकी सुप्रीम कोर्ट जो कर पाए।


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