विचार / लेख

पुरस्कार वापसी पर शिकंजा
30-Jul-2023 10:58 PM
पुरस्कार वापसी पर शिकंजा

-डॉ. आर.के. पालीवाल
समाज सेवा, लेखन, पत्रकारिता, खेल, कला, विज्ञान और शिक्षा आदि क्षेत्रों में विशिष्ट सेवा के लिए सरकारों द्वारा पुरस्कार देना और सरकारों की जन विरोधी नीतियों से घोर असहमति के कारण विरोध स्वरूप पुरस्कार वापिस करना लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में बहुत पुरानी और स्वस्थ परंपरा है। यह सही है कि पुरस्कार लौटाने पर सरकार की किरकिरी जरूर होती है। लेकिन संवेदनशील सरकार वही है जो पुरस्कार लौटाने वाले विशिष्ट नागरिकों द्वारा पुरस्कार वापिस करने के कारणो पर गंभीरता से विचार कर उनके निवारण की कोशिश करे। वरिष्ठ गांधीवादी लेखक विष्णु प्रभाकर ने राष्ट्रपति भवन के समारोह में आमंत्रण के बावजूद उचित प्रोटोकॉल नहीं मिलने से पदम पुरस्कार वापस भेजा था। तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने विष्णु प्रभाकर से व्यक्तिगत रूप से संपर्क साधकर उन्हें ससम्मान राष्ट्रपति भवन आमंत्रित कर इस मुद्दे को हमेशा के लिए सुलझा लिया था। यह विष्णु प्रभाकर जी की विनम्रता और अब्दुल कलाम साहब का बड़प्पन था जिसने अप्रिय स्थिति को पूरी संवेदनशीलता के साथ सहजता से संभाल लिया था।

इस तरह की स्थितियों सेे बचने के लिए पर्यटन और संस्कृति मंत्रालय की संसदीय समिती ने यह सिफारिश की है कि पुरस्कार ग्रहण करने से पहले पुरस्कृत लोगों से यह लिखित में लेना चाहिए कि भविष्य में वे पुरस्कार नहीं लोटाएंगे। इसे और स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो पुरस्कार पाने वाले लोग भविष्य में सरकार की किसी नीति आदि के विरोध में पुरस्कार लौटाने का अधिकार खो देंगे। यदि यह प्रस्ताव स्वीकार हो जाता है तो बहुत से आत्म सम्मानी विभूतियों के लिए पुरस्कार लेना सहज संभव नहीं होगा क्योंकि पुरस्कार के साथ इस तरह की शर्त बहुत से खुद्दार लेखकों और कलाकारों के लिए आहत करने वाली होगी।

ब्रिटिश सरकार द्वारा आजादी के आंदोलन में सरकारी दमन चक्र द्वारा सत्याग्रह को कुचलने पर भी कई प्रबुद्धजनों ने ब्रिटिश शासन द्वारा दिए गए पुरस्कार लौटाकर शासन की क्रूर नीतियों का विरोध किया था। इसी तरह आज़ादी के बाद भी ऐसे कई उदाहरण हैं जब सरकार की दमनकारी नीतियों के विरोध मे पुरस्कार वापसी हुई है। प्रतिष्ठित लेखकों और पत्रकारों की नृशंस हत्या के बाद सरकार द्वारा अपराधियों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही नहीं होने पर कई लेखकों ने पुरस्कार वापिस किए थे। हाल ही में महिला पहलवानों के खिलाफ कथित यौन दुराचरण के आरोपी सासंद बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं होने पर खिलाडिय़ों द्वारा पुरस्कार वापिस किए जाने और उन्हें गंगा में प्रवाहित करने के प्रयास किए  थे।

जब कोई पुरस्कृत व्यक्ति पुरस्कार वापिस करता है तब उसका यह कदम राष्ट्रीय मीडिया में व्यापक चर्चा का विषय बनता है। ऐसे समय सरकार के खिलाफ जन आक्रोश भी उमड़ता है। इसीलिए संभवत: सरकार चाहेगी कि प्रतिष्ठित लेखकों, कलाकारों और खिलाडिय़ों आदि से यह अवसर छीन लिया जाए जो निश्चित रूप से उनकी व्यक्तिगत आजादी का हनन है। इसी परिप्रेक्ष्य में संसदीय समिती के इस प्रस्ताव का सबसे कड़ा विरोध वाम विचार धारा के लेखकों के संगठन जनवादी लेखक संघ की तरफ से आया है। यह सही भी है कि कोई आत्म सम्मानी व्यक्ति सशर्त पुरस्कार प्राप्त करने में अपनी प्रतिष्ठा दांव पर नहीं लगाना चाहेगा। दूसरी तरफ यह भी उतना ही सच है कि पुरस्कार पाने के लिए लालायित काफ़ी लोग इस शर्त को स्वीकार भी कर लेंगे। ऐसी स्थिति में बेहतर लोगों की जगह हल्के लोगों को पुरस्कार मिलने से पुरस्कारों की गरिमा का ह्रास होगा। पहले ही सरकारी पुरस्कारों की चयन प्रक्रिया पर काफी प्रश्नचिन्ह खड़े किए जाते रहे हैं। यदि यह प्रस्ताव स्वीकार हो जाएगा तब सरकारी पुरस्कार बहुत हल्के हो जाएंगे।


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