विचार / लेख
प्राण चड्ढा
इस प्रसिद्ध कहावत के समान छतीसगढ़ में टाइगर सम्वर्धन अब शुरू है।अचानकमार टाइगर रिजर्व यह टाइगर के लिए चीतलों की संख्या नाकाफी है इसलिए राजधानी रायपुर की टाइगर सफारी से 150 चीतलों को लाया जा रहा है। इससे यहां के टाइगर किसी दूसरे पार्क को खुराक की कमी से शिफ्ट नहीं हो जाएं। वहीं अचानकमार टाइगर रिजर्व के लिए महाराष्ट्र और मप्र से एक टाइगर और दो टाइग्रेस को लाने की अनुमति मिल गयी है। वो भी निकट भविष्य में पहुंच सकते हैं। यहां पहले चीतल कम है और टाइगर ला रहे हैं। यह पता किये बिना की चीतल कम क्यों हुए और उनके कारणों के निराकरण किये बगैर,यह फैसला अदूरदर्शिता पूर्ण है।
‘अब तक करोड़ो की राशि हर बरस व्यय और तमाम कोशिशों के बावजूद छतीसगढ़ में टाइगर संरक्षण और संवर्धन का काम पटरी पर नहीं आ सका है। छतीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिजर्व में सबसे प्रबल सम्भावनाये हैं। पर इसके लिए दूरगामी सोच का अभाव छलक रहा है। यहां बाइसन की संख्या काफी बढ़ गयी हैं। टाइगर 6 से 8 होने की सम्भावना है,लेकिन उनके लिए प्री-बेस को बढ़ाने कोई प्रयास नहीं किया गया है। पहले यहां बिलासपुर के कानन पेंडारी से चीतल ले जाकर छोड़े जाते थे। टाइगर खुराक की कमी के कारण पार्क से विमुख न हो जाये इसलिए रायपुर की टाइगर सफारी से 150 चीतल लाने की योजना पर काम चल रहा है।
एटीआई में प्रवासी टाइगर और टाइग्रेस भी हैं। बांधवगढ़ की एक टाइग्रेस और कान्हा नेशनल पार्क के एक टाइगर की पहचान कुछ समय पूर्व हुई है। यहां टाइग्रेस की संख्या टाइगर से अधिक है जिससे अधिक शावक होने की आशा है। अर्थात जल्दी यहां टाइगर बढ़ सकते हैं।एक टाइगर के एरिया में दो या तीन टाइग्रेस रह सकती हैं लेकिन दूसरा प्रतिद्वंदी टाइगर नहीं।
अचानकमार टाइगर रिजर्व (एटीआर) में सैलानियों को जिप्सी सफारी के दौरान टाइगर दिखाई जिस दिन दिखता है तो वह उनके लिए जश्न का दिन हो जाता है। मगर टाइगर दर्शन का संयोग का माह में एक बार का भी औसत नहीं है। लेकिन विभिन्न जगह में लगाए गए कैमरों में टाइगर कैप्चर होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
एटीआर का टाइगर यहां चीतल का शिकार कम ही करता है। गाँव वालों के मवेशी जो जंगल में घूमते हैं वह टाइगर की खुराक बन जाते हैं क्योकि वो चीतल से टाइगर के लिए आसान शिकार जो होते हैं। चीतल भी यहां जंगल में कम हैं जो कोर ज़ोन की बसाहट के आसपास छोटे झुंड में दिखते हैं। कुल मिलाकर अब जितने टाइगर बताते जा रहे हैं उनके अनुपात में कान्हा या बांधवगढ़ से बहुत कम हैं।
अचानकमार अभ्यारण्य की स्थापना 1975 में हुई बाद यह टाइगर रिजर्व बन गया परन्तु आज तक इसमें कोर एरिया में बसे 19 गांव की आबादी और उनके मवेशियों के दबाव बना है। इन गांव वाले में कई के पास तीर कमान है, और कुत्ते भी हैं जिनसे चीतलों पर शिकार का खतरा मंडराते रहता है। एक जोड़ा कुत्ता भी चीतल का शिकार कर सकता है।अब वह समय है पार्क एरिया से आबादी को हटाया जाए जिसके पहले चरण के उनके कुत्ते और तीर कमान पर जंगल मे प्रवेश पर रोक लगनी होगी। इसके लिए दमदार निर्णय लेने की जरूरत है।
पार्क में गर्मी के दिनों पानी के कमी नहीं होय और चीतल की कमी दूर लिए हरे चारा के बड़े मैदान विकसित करने होंगे जिसके लिए जलदा,सिहावल और बाहुड़ के मैदान, चारागाह बन सकते हैं। जिस पर कोई काम नहीं किया जाता। जिस वजह ही रायपुर के टाइगर सफारी और पहले बिलासपुर के चिडिय़ा घर से चीतल छोड़े जाते रहे है। निश्चित ही अगर चीतल बढ़ा गए तब प्रवासी टाइगर यहां के रहवासी टाइगर का स्थायी बसेरा एटीआर बन जायेगा।


