विचार / लेख
भारत का विभाजन, गांधी की हत्या, नेहरू की मौत, इंदिरा और राजीव की हत्याएं, बच्ची निर्भया का दुर्भाग्य कांड, बांग्लादेश का निर्माण, वल्र्ड क्रिकेट में 1983 में भारत का विश्वकप, 1975 में इमरजेंसी, बाबरी विध्वंस, 1984 के सिक्ख नरसंहार, मंडल कमीशन की रपट, जेपी की अगुआई में 1974 का छात्र आंदोलन, 1962 में चीनी आक्रमण और कारगिल युद्ध जैसी घटनाएं भारतीय इतिहास में आसानी से भूलने लायक नहीं हैं। इनके समानांतर कई घटनाओं को इतिहास भूलने सा लगा है।
1971-80 के दशक की पांच घटनाएं चुनकर पत्रकार सुदीप ठाकुर ने करीब 200 पृष्ठों में एक वृत्तांत समेकित किया है। उनमें से उभरकर वस्तुपरक सच किसी तटस्थ लेकिन सक्रिय व्यक्ति को झिंझोड़ सकता है।
किताब को पिछले पृष्ठों से पढ़ेे ंतो खुद सुदीप के अनुसार 1971-80 के दशक में हुई कुछ घटनाएं मसलन गर्भपात को वैधता (1971), बांग्लादेश मुक्ति युद्ध (1971), चिपको आंदोलन (1973), पहला परमाणु परीक्षण (1974), सिक्किम का विलय (1965), आर्यभट्ट का प्रक्षेपण (1975), दूरदर्षन की स्थापना और असम आंदोलन (1979) पर विस्तार से नहीं लिखा गया है। यह लेखक की समझ है कि उसने गरीबी, प्रिवीपर्स समाप्ति, कोयला-कथा, परिवार-नियोजन और आपातकाल जैसे पांच विषयों को चुनकर उन्हें विस्तारित, व्याख्यायित और सिलसिलेवार तार्किक किया है। पांचों मुद्दे लोकतंत्र की बुनियाद में पैठ गए हैं।
इंदिरा गांधी ने 1971 में ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया था। सुदीप ने लिखा कि शायद जयराम रमेश जैसे कांग्रेस नेता या अन्य तरह से जानकारी मिली कि यह सूत्र कांग्रेस के कद्दावर नेता सी. सुब्रमण्यम के सुझाव पर इंदिरा ने राजनीति-सुलभ किया था। इस पार्टी में रहने के कारण मुझे अच्छी तरह याद है कि महासचिव श्रीकांत वर्मा ने अपने दफ्तर में बैठकर रिहर्सल भी किया था कि इंदिरा गांधी को यह कहने ‘मैं कहती हूं गरीबी हटाओ, और वे कहते हैं इंदिरा हटाओ’ के ध्वनि संयोजन की बारीकियों को भी वे शिद्दत के साथ तलाश रहे थे। भारत की गरीबी को लेकर सुदीप-कथा कांग्रेस पार्टी के पितामह कहे जाते दादा भाई नौरोजी की 1876 में लिखी किताब के हवाले से है।
सुदीप ने यह सब विस्तार में विष्लेषित नहीं किया। लेकिन जानकारियां, सूचनाएं, सांख्यिकी और कई विचार सूत्र बेहद तरतीब के साथ पेष कर दिए हैं। जो कह सकना चाहिए था, वह बिना कहे भी कह भी दिया है। आज ‘गरीबी हटाओ’ का नारा कितना विकृत होकर 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राषन की सरकारी भीख के रूप में तब्दील हो गया है।
कोयला भारतीय राजनीति और आर्थिक जीवन में एक तरह की भूमध्य रेखा की तरह संतुलन की तुला पर डंडी भी मारता है। वही कोयला इंदिरा गांधी के कार्यकाल मे कई गफलतें कर रहा था। कोयला उत्पादक बिहार के क्षेत्र में राजनीतिक गुंडागर्दी, अपराध और हेकड़बाजी को लेकर उजले कपड़ों वाले सियासतदां अपनी नीयत और दिल में लगातार कोयला मल रहे थे। कोयले का राष्ट्रीयकरण इंदिरा गांधी के कारण एक बड़ी राष्ट्रीय घटना हुई। मनमोहन सरकार के समय कोयले की बंदरबांट और हेराफेरी या अन्य आरोप लगाकार महालेखाकार विनोद राय सरकारी पार्टी पर 1 लाख 76 हजार करोड़ रुपयों के भ्रटाचार की रिपोर्ट उजागर करें, जो बाद में विवादित हो जाए। सुदीप ने माक्र्स को उद्धरित किया है ‘रेलवे भारत में औद्योगिक क्रांति ला देगा और पूरे देश को बदलकर रख देगा।’ तब कोयले से पैदा भाप ही रेलगाडिय़ों को चलाती थी। सुदीप ने यह भी इषारा किया है कि कोयले का निजीकरण हो जाने से इंदिरा सरकार को लगा कि कोयले का उत्खनन और दोहन बहुत अवैज्ञानिक तरीके से पूंजीवाद को प्रश्रय देने के लिए किया जा रहा है। मैं खुद भिलाई स्टील प्लांट का वकील रह चुका हूं। तब निमाई कुमार मित्रा प्लांट के डायरेक्टर थे। उन्होंने मेरी रुचि देखकर एक गवेषणात्मक किताब तीन खंडों की पढऩे के लिए दी थी। उसमें किसी विद्वान प्रो. लहरी ने कोयले के क्रूर उत्खनन को लेकर भारत सरकार को चेतावनी दी थी। बाद में तिस्कृत महसूस करने पर वे संभवत: अर्जेंटीना सरकार के कोयला सलाहकार बनकर चले भी गए थे।
सुदीप ने अपनी किताब में एक एक बारीक बात को अपने तर्कों के सूत्र में पिरोकर पूरा सार संक्षेप सिलसिलेवार लिखा है। उसे और संक्षेप नहीं किया जा सकता था। पूरी किताब सरसरी तौर पर पढऩे से भी एक तात्कालिक प्रतिक्रिया मांगती है। यादों की गुमशुदगी भी होती है। यह पुस्तक एक तरह से यादध्यानी या रिफ्रेंस की भी है। इसे गजेटियर की तरह भी पढ़ा जा सकता है। सुदीप ठाकुर ने इतनी ज्यादा किताबों, फाइलों और पत्रिकाओं को खंगाला है, जो परिशिष्ट में संदर्भित है। यह भी दिलचस्प है कि उन्होंंने नई तकनॉलॉजी का फायदा उठाते हुए कई नामचीन लोगों तक की खोज-खबर जज्ब की। ई मेल भेजे। टेलीफोन किया। रूबरू भी मिले और इस तरह अपनी किताब की प्रामाणिकता और विश्वसनीयता को लेकर लोगों से केवल विषेषणों की गिफ्ट नहीं मांगी।


