विचार / लेख
डॉ. आर.के. पालीवाल
मणिपुर में हिंसा और उसमें भी निरीह महिलाओं पर क्रूरतम अत्याचार करते शैतानी झुंड साबित करते हैं कि जिस समाज से यह लोग आते हैं वह मनुष्य तो क्या पशुओं से भी कहीं बदतर आदिम और बर्बर समाज है। कहने के लिए इन लोगों ने ईसाई या हिंदू धर्म की रंगीन चादरें ओढ़ ली हैं और पश्चिमी सभ्य समाज के कपड़े पहन लिए हैं, लेकिन इनके अंतश में मनुष्यता का लेशमात्र भी मौजूद नहीं है। व्यक्ति के रुप में ऐसे लोग बड़े कायर होते हैं लेकिन भीड़ बनते ही इनकी पशुता शिखर पर पहुंच जाती है। मणिपुर में कभी महिलाओं ने सैनिक बलों की ज्यादती के खिलाफ सामूहिक नग्न प्रदर्शन किया था। उनका मानना था कि मणिपुर से सैन्य बलों को हटा लिया जाना चाहिए। ताजा घटनाओं को देखकर मणिपुर की महिलाएं इतनी डरी हैं कि जिन्हें वे अपना समझती थी उनके खिलाफ खड़े होने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही। कल्पना कीजिए कि मणिपुर में इतने ज्यादा सैन्य बलों के बावजूद वहां इस तरह की जघन्य घटना घट रही हैं तो सैन्य बलों के अभाव में वहां क्या स्थिति होती।
आदिम और बर्बर युग में जिस राजा की शक्तिशाली फौज होती थी उसकी सेना जीतने के बाद सबसे ज्यादा अत्याचार विजित देश की महिलाओं और उनमें भी युवतियों पर करती थी। द्वितीय विश्व युद्ध तक ऐसा हुआ है और हमारे देश के बंटवारे के समय भी ऐसा हुआ था। लगता था कि आजादी के दंगों के गहरे जख्मों से हम कुछ सीखेंगे लेकिन गोधरा और गोधरा काण्ड के बाद बिल्किस बानो के साथ जो हुआ उसने हमे संकेत दिया था कि वहशी जानवर अभी भी हमारे समाज में छिपे हैं। मणिपुर की घटना ने इसे और ज्यादा पुख्ता कर दिया कि नफरत के बीज केवल हिंदू मुस्लिम में ही नहीं आदिवासी समाज में भी फल फूल रहे हैं। एक तरफ मणिपुर के मुख्य मंत्री दोषियों को फांसी की सजा देने की बात करते हैं और दूसरी तरफ गुजरात के मुख्यमंत्री और उनके साथी बिल्किस बानो के गुनाहगारों के प्रति नरमी बरतते हैं। संभव है कल नई सरकार मणिपुर के गुनाहगारों के साथ भी इसी तरह की नरमी बरतेगी। राजनीतिक दलों और उनके शीर्ष नेताओं पर इसीलिए जनता कतई विश्वास नहीं करती। महिला पहलवानों का मामला हमारे सामने है। कड़वी सच्चाई यही है कि जहां जितने ज्यादा वोट दिखाई देते हैं या आरोपी जितने ज्यादा शक्तिशाली होते हैं वहां राजनीतिक दल उतना ही गलीजपन प्रदर्शित करते हैं। यही कारण है कि अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी, बृजभूषण शरण सिंह, राजा भैया, आनन्द मोहन और शहाबुद्दीन जैसे जघन्य अपराधों में लिप्त लोग न केवल सालों साल कानून को ठेंगा दिखाते रहते हैं बल्कि जिताऊ होने के कारण राजनीतिक दलों की कृपा से माननीय सासंद और विधायक भी बन जाते हैं।
कुछ लोग महिलाओं के साथ घृणित कृत्य की आलोचना तो कर रहे हैं लेकिन किंतु परंतु के साथ। बर्बरता सभ्य समाज को शर्मसार करती है और जब यह महिलाओं, बच्चों और वृद्धों के साथ होती है तब तो यह क्रिया की प्रतिक्रिया के अक्सर याद किए जाने वाले सिद्धांत को भी शर्मसार करती है। क्रिया की प्रतिक्रिया बराबरी वालों के साथ थोडी बहुत सहानुभूति पा सकती है लेकिन कुकी दंगाईयों की सजा निर्दोष महिलाओं को दिए जाने का किसी भी दृष्टि से लेशमात्र भी समर्थन कोई हद दर्जे का राक्षस ही कर सकता है। जो लोग दबी जुबान ऐसा कर रहे हैं वे यह भूल जाते हैं कि कल कोई उद्दंड समूह उनके परिवार के निरीह लोगों के साथ भी ऐसा कर सकता है। पूरे घटनाक्रम में यही अच्छा है कि मणिपुर मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को चेताया है कि वह तुरंत कार्यवाही करे अन्यथा न्यायालय इस मामले को देखेगा। सर्वोच्च न्यायालय की अपनी सीमाएं हैं फिर भी उसका यह कदम आम नागरिक के मन में थोडी आशा बरकरार रखने में सक्षम है।


