विचार / लेख

गठबंधन युग की वापसी!
21-Jul-2023 4:24 PM
गठबंधन युग की वापसी!

डॉ. आर.के. पालीवाल

देश के राजनीतिक शिखर से कांग्रेस की फिसलन और उसकी जगह भारतीय जनता पार्टी के उठाव के समय केंद्रीय सत्ता में गठबंधन सरकारों का लंबा दौर रहा है। यह वह समय था जब किसी चमत्कारी नेता के अभाव में कांग्रेस लोकसभा में निरंतर कम सीट पाते पाते बहुमत से काफ़ी दूर हो गई थी और दूसरी तरफ़ कांग्रेस की खाली जमीन पर कब्जे जमाती हुई भारतीय जनता पार्टी इतनी सक्षम नहीं हुई थी कि अपने दम पर केंद्र में सरकार बना सके। गठबंधन सरकारों के कुछ लाभ भी हैं और कई बड़े दोष भी हैं। उदाहरण के तौर पर इसके चारित्रिक पतन की शुरुआत नरसिंह राव की सरकार में हो गई थी जिसे सत्ता बचाने के लिए झारखण्ड मुक्ति मोर्चा जैसे क्षेत्रीय सांसदों को घूस देनी पड़ी थी।

गठबंधन सरकारों में सबसे यादगार दौर अटल बिहारी बाजपेई की एन डी ए गठबन्धन सरकार का था। अटल बिहारी बाजपेई न केवल तत्कालीन भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेता थे बल्कि उनकी लोकप्रियता विरोधी दलों के बीच भी अच्छी खासी थी। यही कारण था कि उन्होंने अपनी उदारता, सर्व समावेशी व्यवहार और ऊंचे राजनैतिक कद के कारण गठबन्धन को शालीनता से संभाल लिया था। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में गठबंधन सरकार को अच्छे से चलाने के लिए अटल बिहारी बाजपेई जैसा कोई चेहरा नजऱ नहीं आ रहा।

कांग्रेस को फिलहाल बड़े गठबंधन की जरूरत है। उसने करीब छब्बीस दलों को इंडिया नाम के गठबन्धन में शामिल भी किया है।भारतीय जनता पार्टी अपनी जीत की हैट्रिक करने के लिए कोई कोर कसर बाकी नहीं छोडऩा चाहती। इसलिए उसने भी विरोधी खेमे के गठबन्धन से बचे अड़तीस छोटे दलों को इक_ा कर लिया है। ऐसा लगता है कि भारतीय जनता पार्टी ने भी यह स्वीकार कर लिया है कि विरोधी दलों की एकता के सामने अगली सरकार वह भी अपने बूते नहीं बना सकती।

विरोधी दलों ने अपने गठबंधन के लिए इण्डिया नाम चुना है।राष्ट्रीयता का यह प्रतीक तो अच्छा है लेकिन इससे अंग्रेजियत की बू आती है। दूसरे कुछ साल पहले भारतीय जनता ने भाजपा के इंडिया शाइनिंग के अंग्रेजी नारे को अस्वीकार कर दिया था। इसके अलावा भी विरोधी दलों की एकता में अभी और भी कई पेंच हैं।बिहार की पहली बैठक विरोधी दलों की एकता के लिए यू पी एस सी की प्रारंभिक परीक्षा जैसी थी। पटना में नीतीश कुमार और लालू यादव का गृह प्रदेश और साझा सरकार होने के कारण उन्हीं का बोलबाला था लेकिन कर्नाटक आते आते विरोधी दलों की एकता पर कांग्रेस हावी दिखी। बैंगलुरु में नितीश कुमार के विरोध में कुछ पोस्टर लगने से नितीश कुमार नाराज बताए जा रहे हैं, हालांकि गठबन्धन ने इन पोस्टरों के पीछे भारतीय जनता पार्टी का षडयंत्र बताया है। अभी मुंबई में होने वाली तीसरी बैठक से भी ज्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती। संभव है कि मुंबई की तीसरी बैठक में अपनी टूटी फूटी पार्टी के साथ उद्धव ठाकरे और शरद पवार अपने रंग में आएं और गठबंधन के सेहरे को अपने सिर पर रखने की कौशिश करें।

बैठकों के लंबे दौर के अलावा अभी तक विपक्ष ने जमीन पर कोई साझा तैयारी नहीं की है। अधिकांश सक्षम दलों के नेता, यथा शरद पवार, सोनिया गांधी और राहुल गांधी एवम नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव आदि के चार्टर्ड प्लेन से बैंगलुरु पहुंचने के समाचार हैं।इसी तरह भाजपा के नेतृत्व में राजग की बैठक भी पंच सितारा होटल में संपन्न हुई है। चार्टर्ड प्लेन, पंच सितारा होटल और नेताओं की घोषित और अघोषित संपत्तियों के आंकड़े देखकर यह बात तो साफ हो जाती है कि देश के निन्यानवे प्रतिशत नागरिकों का राजनीति में कोई स्थान नहीं रहा। वे सिर्फ मोहरे, एक वोट और एक संख्या बनकर रह गए । ऐसी परिस्थितियों में कभी इधर कभी उधर लुढक़ने वाले नेता और राजनीतिक दल गठबंधन कर आम जनता की भलाई के बजाय अपना ही स्वार्थ सिद्ध करेंगे।


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