विचार / लेख

साँस लेने को भी जब जगह नहीं छोड़ोगे...
21-Jul-2023 4:22 PM
साँस लेने को भी जब जगह नहीं छोड़ोगे...

अजीत साही

एक बाल्टी लीजिए। उसमें चौथाई लेवल तक मिट्टी डालिए। फिर उस पर कुछ इंच बालू डालिए। फिर ऊपर से एक जग पानी डालिए। कहाँ गया पानी? बालू से होते हुए मिट्टी के अंदर।

एक दूसरी बाल्टी लीजिए। उसमें चौथाई लेवल तक मिट्टी डालिए। फिर उस पर कुछ इंच गिट्टी डाल कर सीमेंट और बालू का मिक्स ऐसे लगाइए कि मिट्टी न दिखे। जब सीमेंट सूख जाए तो ऊपर से एक जग पानी डालिए। कहाँ गया पानी? कहीं नहीं। सीमेंट के ऊपर पानी ही पानी रहेगा।

जब आप हर ओर ज़मीन पर सीमेंट लगाकरconcrete  का जंगल खड़ा कर देंगे तो बाढ़ तो आएगी ही। जितने मकान और बिल्डिंग बनाएँगे उतना बाढ़ का प्रकोप बढ़ेगा। क्योंकि पानी जमीन के अंदर जा ही नहीं पा रहा है तो आपके आँगन और आपकी सडक़ पर ही रहेगा। इसमें कोई भी सरकार क्या करेगी?

प्रकृति का नियम ये है कि बारिश का पानी जमीन में जाता है। इससे groundwater का स्तर उपर रहता है और जंगल हरा-भरा रहता है। साथ ही groundwater नदियों तक भी पहुंचता है तो नदियां भी जीवंत रहती हैं।

लेकिन concrete का जंगल खड़ा होने से ज़मीन में पानी जाना बंद हो गया। जंगल हम वैसे ही काटते जा रहे हैं। क्योंकि हमें मकान बनाने हैं। फैक्ट्रियां बनानी हैं। जब सालों-साल पानी जमीन के अंदर नहीं जाएगा तो groundwater भी खत्म होगा और नदियों तक भी नहीं पहुंचेगा। पिछले तीस-चालीस सालों में भारत भर में groundwater कई फीट नीचे जा चुका है। लोग जमीन खोदते जाते हैं और पानी दिखता तक नहीं है।

1960 के दशक मेंGreen Revolution शुरू हुआ। भारत भर में मशीनों के इस्तेमाल सेgroundwater जमीन से खींच कर खेत सींचे जाने लगे। बड़ी-बड़ी नहरें बनाई गईं। फसलें लहलहाने लगीं। देश में अनाज का संकट खत्म हुआ। लेकिन उस क्रांति का भुगतान आज की पीढ़ी कर रही है। क्योंकि सत्तर सालों में जिस मात्रा में जमीन के नीचे से मशीन से पानी खींच लिया गया है उस मात्रा में पानी वापस जमीन में पहुंचा ही नहीं है। यही वजह है कि भारत में हर ओर अब हर साल सूखा पडऩे लगा है।

बारिश हो तो बाढ़। बाकी वक्त सूखा।

और बारिश भी अब कम होने लगा है। हमारे बचपन में बरसात के मौसम में महीनों झमाझम बारिश होती थी। पानी जमीन के अंदर जाता था। जमीन से पेड़ों में जाता था। अगले साल जब गर्मी पड़ती थी तो जंगल के पेड़ों से पानी उड़ कर आसमान की ओर जाकर बादल बनता था और फिर बारिश होती थी। यही सिलसिला था। लेकिन अब जमीन में पानी है ही नहीं तो गर्मी में उड़ कर कहाँ से आसमान में जाएगा? बादल कैसे बनेंगे?

आज से पचास साल पहले भारत की आबादी पैंसठ करोड़ थी। आज एक सौ चालीस करोड़ से भी ज़्यादा है। लेकिन पानी की प्रति व्यक्ति खपत पचास साल पहले से कई गुना बढ़ गई है। पचास साल पहले मेरे भाई का और मेरा परिवार एक घर में रहते क्योंकि वो joint family का दौर था। आज I, me, myself का दौर है।  Nuclear family  का दौर है। मुझे भी 3xBHK चाहिए और मेरे भाई को भी। जितने घर बनेंगे पानी की उतनी खपत बढ़ेगी।

और घर बनाने में ही नहीं घर के अंदर भी पानी के बगैर कुछ नहीं हासिल होगा। आज gadgets  का दौर है। गैस स्टोव। स्मार्टफोन। कार। कंप्यूटर। प्रिंटर। माइक्रोवेव। फ्रिज। वाशिंग मशीन, टीवी, एसी, ऐसा कोई सामान नहीं है जिसके निर्माण फैक्ट्रियों में न होता हो। फैक्टरी बिजली और पानी से चलती है। पूरे भारत में फैक्ट्रियां ताबड़तोड़ पानी बहा रही हैं। आप भारतीय उद्योग को लगातार बढ़ते देखते रहना चाहते हैं। आपकी इस लालसा की कीमत आपका पानी है।

यही वजह है कि पिछले चालीस सालों में भारत में कंस्ट्रक्शन बिजनेस चरम पर पहुँच गया है। इसकी कीमत हम पानी बरबाद करके चुका रहे हैं। बालू मिलाकर ही सीमेंट से इमारत बनती है। इसलिए दशकों से पूरे भारत में नदी किनारे से बालू कांच कांच कर बालू माफिया कंस्ट्रक्शन बिजऩेस को बेच रहा है। इस बालू माफिया को जिसने चुनौती दी वो मौत के घाट उतारा गया, क्या पत्रकार और क्या अधिकारी। छह महीने पहले ओडि़शा में बालू से लदी एक ट्रक को चेक करने वाले ढ्ढ्रस् अधिकारी पर ऐसा हमला हुआ कि उनको अस्पताल का रुख करना पड़ा। कर्नाटक में बालू माफिय़ा के खिलाफ एक्शन लेने वाले ढ्ढ्रस् अधिकारी डी के रवि 2015 में अपने घर में छत से लटके पाए गए। दस साल पहले यूपी में ढ्ढ्रस् अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल को बालू माफिया के खिलाफ एक्शन लेने की वजह से सस्पेंड कर दिया गया था। पूरे देश में बालू माफिया के मालिक राजनीति में शहंशाह हैं। बालू के गैर-कानूनी व्यापार का अरबों रुपया राजनैतिक पार्टियों को जाता है।

कांच कांच कर बालू खत्म कर देने की वजह से क्या यूपी और क्या तमिलनाडु, हर जगह नदियाँ बरबाद हो गई हैं। पहले बालू पानी सोखता था। अब बालू ही नहीं बच रहा है। नदियों के किनारे किनारे concrete ·के riverfront   खड़े हो गए हैं। लोग ताली पीटते हैं वाह मोदी जी वाह। लेकिन नदी को जिंदा रहने के लिए दोनों ओर concrete नहीं खुली जमीन और बालू चाहिए। नदियाँ साँस नहीं ले पा रही हैं इसलिए सूख रही हैं।


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