विचार / लेख

खाट पर बैठे ‘अच्छे दिन’ गुजार रहे...
20-Jul-2023 4:56 PM
खाट पर बैठे ‘अच्छे दिन’ गुजार रहे...

विष्णु नागर

अनेक मित्रों -रिश्तेदारों के फोन आए कि हम लोग सुरक्षित हैं न। बाढ़ का प्रभाव आप पर तो नहीं पड़ा है? पत्नी और मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि हम पूरी तरह सुरक्षित हैं।

आज मैं घूमते-घामते नोएडा की ओर जाने वाली रोड पर निकल आया। वहां सडक़ किनारे पटरी पर बहुत से परिवार देखे, जो निचले इलाकों में रहते हैं, खेती और मजदूरी करते हैं। वे अपने पशुओं को लेकर इधर आ गए हैं। खाट पर बैठे ये ‘अच्छे दिन’ गुजार रहे हैं। कुछ को अच्छे टेंटों में जगह मिली है मगर ऐसे टैंट जरूरत की अपेक्षा बहुत कम हैं।

कहीं कपड़े सूख रहे हैं,कहीं बच्चों की किताबें। बच्चे अमूमन उसी तरह मस्त हैं,जैसे अपने झोपड़ों में भी होते। बड़ों ने भी दुख ओढ़ नहीं रखा है। यमुना पूर हो जाती है तो लाजमी तौर पर यह स्थिति आती है।

पहली बार देख कर यह अच्छा लगा कि यहां इंतजाम ठीक हैं। पहले कभी ऐसा नहीं देखा था। डीटीसी की बीस या अधिक बसें तैनात हैं कि अगर स्थिति विकट होती है तो इन्हें बसों में कहीं और सुरक्षित जगह पर ले जाया जाए। वालंटियर्स मौजूद हैं। पुलिस तैनात है। एनडीआरएफ के लोग अनेक लोगों को सुरक्षित यहां ले आए हैं।

इधर मध्यवर्गीय मयूर विहार में जीवन यथावत है। बाढ़ की चर्चा करनेवाले भी केवल दो लोग ही दिखे।दो स्पष्ट दुनियाएं हैं। मैं तो कल रात से ही आश्वस्त था कि हमें कुछ नहीं होगा। हम मध्यवर्गीय हैं। नियोजित कालोनियों में रहते हैं। हमारे नाखून को भी गलती से चोट लग गई तो कल हमारे दुखों से अखबारों के पृष्ठ पर पृष्ठ रंग जाएंगे। टीवी वाले मेरे पास आएंगे कि सर आप तो लेखक हैं,आपको कैसा लग रहा है?मजा तो आ रहा होगा, इंजॉय तो कर रहे होंगे। लिखने के लिए आपको नई सामग्री मिली होगी। सर, इस बीच आपने कोई कविता जरूर लिखी होगी, सुनाइए न, एक बाढ़ पीडि़त कवि की कविताएं।


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