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कनक तिवारी लिखते हैं-इंडिया दैट इज़ भारत!
20-Jul-2023 4:36 PM
कनक तिवारी लिखते हैं-इंडिया दैट इज़ भारत!

  कनक तिवारी

(1) भारत की 26 विपक्षी राजनीतिक पार्टियों ने अपने जमावड़ेे के लिए एक नया शब्द ईजाद किया है इंडिया। उसे अंगरेजी में पढ़ते इंडियन नेशनल डेवलपमेंट इन्क्लूजिव एलाइंस अर्थात इंडिया रखा गया है। भाजपानीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की ओर से इंडिया षब्द के इस्तेमाल पर कड़ी टिप्पणी की गई है। उसे अंगरेजों की मानसिक गुलामी का प्रतीक कहा गया है। तुर्रा यह कि भारत की अधिकांश राजनीतिक पार्टियों के नाम में अंगरेज़ी पुछिल्ला तो है। इंडियन नेशनल कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी, जनता दल, यूनाइटेड नेषनलिस्ट कम्युनिस्ट पार्टी, तृणमूल कांग्रेस पार्टी, आम आदमी पार्टी आदि के नाम में अंगरेजी शब्द तो है।

हालांकि राष्ट्रीय जनता दल, लोकदल, बीजू जनता दल, अन्नाद्र्रविड़ मुनेत्र कषगम जैसे कई दलों में अंगरेज़ी षब्द नहीं दिखता। सवाल अंगरेज़ी षब्द के अस्तित्व में घुसे रहने या घुसते जाने भर का नहीं है। सवाल है कि हिन्दुस्तान की राजनीति में अंगरेजिय़त इंजेक्ट होकर इतना विनाष कर चुकी है। और उससे बचा कैसे जाए। भारत के नाम पर इंडिया षब्द को अंगरेजी शासन काल में पहचान और मान्यता मिली थी। यही इतिहास का सच है। अंगरेज़ों से आजादी की लड़ाई का महत्वपूर्ण हिस्सा अंगरेजी भाषा से लकदक तो रहा है। आजादी के दौर मेंं सभी बड़े नेता ज्यादातर यूरोप और खासकर इंग्लैंड में ऊंची पढ़ाई करने गए तो थे। भारत का संविधान पूरी तौर पर अंगरेजी भाषा में ही बना। अंदरेजी दां लोगों की इसमें मुख्य भूमिका रही।

(2) अहिन्दी और अन्य भाषाओं तक के जो संविधान पढऩे मिलते हैं, उसमें यह अनुवाद है। आजादी के युद्ध के दौर में भारतीय जनता की ओर से खासतौर पर कांग्रेस के ज़रिए जो याचिकाएं और प्रतिवेदन पेश किए जाने थे। उसमें जो औपचारिक प्रस्ताव पारित होते थे। वे ज़्यादतर अंगेरेज़ी में ही होते थे। इंडिया शब्द के इस्तेमाल पर वर्षों तक कोई आपत्ति नहीं की गई। भारत का संविधान देश को इंडिया दैट इज़ भारत के नाम से मंजू कर चुका है। इस पृष्ठभूमि की तटस्थ होकर जांच करने की जरूरत है क्योंकि अब इंडिया नाम के शब्द का इस्तेमाल राजनीतिक पार्टियों के द्वारा कई मकसदों के लिए किया जाने की संभावनाएं बुन दी गई हैं। अंगरेज़ों ने आधी से ज़्यादा दुनिया पर हुकूमत तो की है। उन्होंने हर देश के प्रचलित नामों को अपनी जुबान के उच्चारण के कारण बिगाड़ा या बदला भी है। भारत के लोग भी दुनिया के कई शहरों के नाम अंगरेजी जुबान में ही तो लेते हैं। भले ही उन देषों में इन शब्दों को अलग तरह से प्रचारित किया जाता होगा। वर्षों तक चीन में पीकिंग, रूस में मास्को जैसे शब्दों से लोगों का इत्तफाक रहा है। हालांकि स्थानीय स्तर पर उनका उच्चारण पूरी तौर पर अलग है। भारत में भी डेलही, बांबे, कैलकटा जैसे शब्दों का अब केवल पुरानी किताबों में उल्लेख है। सब नाम बदल दिए गए हैं।

(3)सुप्रीम कोर्ट में एक सांस्कृतिक राष्ट्रवादी याचिका दाखिल की गई थी कि संविधान के मुखड़े में ‘इंडिया’ लिखा गया है। उसे हटा दिया जाए क्योंकि यह शब्द अंग्रेजों की गुलामी का प्रतीक है। याचिकाकार दिल्ली का नागरिक मासूम व्यक्ति भर नहीं था। उसके साथ एक विचारधारा के आग्रहों का इतिहास भी है। संविधान अंगरेजी भाषा में लिखा गया। उसका शुरू में ही हिन्दी अनुवाद किया गया लेकिन अधिकारिक मान्यता नहीं मिली। 1987 में संविधान संशोधन के जरिए अनुच्छेद 394-क शामिल करते तय हुआ कि संविधान और प्रत्येक संशोधन का हिन्दी अनुवाद अधिकारिक पाठ समझा जाएगा। कई संविधान निर्माता बड़े बौद्धिक तथा स्वतंत्रता आंदोलन के लोकप्रिय और संघर्षशील नेता भी थे। भारत पाक विभाजन के भयानक हिंसक दौर में संविधान का पाठ तय किया जा रहा था।

जवाहरलाल नेहरू और डॉ. अम्बेडकर संविधान की आत्मा तराशकर उसे भारतीय जीवन में इंजेक्ट करने के सबसे बड़े आग्रही विचारक थे। गांधी भी चाहते थे भारत का सबसे गरीब तक संविधान को अपनी जिंदगी की अहम पोथी समझे। हिन्दू-मुस्लिम खूंरेजी, जिन्ना की अगुवाई में अलगाव तथा हिन्दू महासभा द्वारा विभाजनकारी मांग से सहयोग के ऐतिहासिक कारणों से संविधान सभा में भी तनाव पैदा हो गया था। नतीजतन प्रदेशों के बनिस्बत बहुत मजबूत केन्द्र बनाने की अवधारणा आ गई। अन्यथा देश के टूटने का खतरा था। देसी रियासतें सिर उठा रही थीं। नए भारतीय राज्य में उन्हें मिलाने सरदार पटेल ने ऐतिहासिक भूमिका अदा की।

(4) ‘इंडिया’ शब्द को हटाकर केवल भारत रखने की याचिका को क्षेत्राधिकार के अभाव में सुप्रीम कोर्ट खारिज कर सकता था। कोर्ट ने उसे प्रतिवेदन की षक्ल में केन्द्र सरकार को देने इशारे कर दिए। ऐसा मांग पत्र सुप्रीम कोर्ट के संकेत ने सरकार तक पहुंचा ही दिया। सूत और कपास तो नहीं भी हो तो सांप्रदायिक ल_ तैयार रहता है कि मुद्दे मिलते ही अनुकूल धुनाई करें। एक भाजपाई नेता ने मांग भी की है कि संस्कृति और षिक्षा वगैरह के मामले में अल्पसंख्यकों को संविधान की रियायतों पर दोबारा विचार हो। वोट बैंक की राजनीति के लिए ऐसे आह्वान जरूरी हो जाते हैं। हिन्दू धर्म से ऊबकर छिटके बौद्ध, जैन और सिक्ख धर्म अल्पसंख्यकों की परिभाषा में हैं। लेकिन निजी कानूनों, राममंदिर आंदोलन, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, हिन्दू हित, एक निशान एक प्रधान जैसे

जुमलों के फेविकोल से उन्हें एक साथ चिपकाकर हिन्दू राष्ट्र का सपना देखने के लिए गरीबी, बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दों से अलग कर नींद में गाफिल सुलाया जाता है। जुमले तो हैं, भले ही इंसानियत की इमला लोग भूल रहे हैं। हिन्दू मुस्लिम इत्तहाद की जान धर्मनिरपेक्षता के तोते की गर्दन में है। पता नहीं कब उसकी गर्दन कब टेंं बोलेगी।

(5) सुप्रीम कोर्ट में दिलचस्प हालात पैदा होते ही रहते हैं। अदालतें ठीक से अदावतें भी सुलझा नहीं पातीं। मूल कर्तव्य है ‘हर नागरिक राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करेगा और संविधान का पालन भी।’ संघ परिवार के हमदम कथित अखिल भारतीय संत समिति की पुस्तिका में राष्ट्रीयध्वज, अशोक चक्र और राष्ट्रगीत का खुलेआम अपमान किया गया है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के सरकारी सिपहसालारों ने उसका ख्ंाडन नहीं किया। संविधान को उसमें लोकद्रोही तक कहा गया है। ‘इंडियन’ शब्द को व्यंग्य के साथ लिखा गया है। आजादी की लड़ाई के वक्त उनके अनुसार वंदेमातरम् ही राष्ट्रीय गीत था। यहां तक लिखा है जिस राष्ट्रध्वज पर साम्राज्यवादी अशोक चक्र अंकित है तथा जॉर्ज पंचम की स्तुति में गाए गए ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान बनाया जाए, वहां नागरिकों के कर्तव्यों की बात करना बेमानी होगा। वर्षों पहले लिखी इस किताब में उठाए गए मुद्दे ही सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई याचिका के प्रेरक हैं और आते रहते कुछ मांग पत्रों के भी। ऐसे लोग अशोक से इसलिए परहेज करते हैं क्योंकि भगवान बुद्ध की शिक्षाओं के कारण ‘हिन्दू अशोक’ ‘बौद्ध’ हो गया था। यही तो बाद में बाबा साहब अम्बेडकर के साथ हुआ।


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