विचार / लेख

सरकार के विरोध की अभिव्यक्ति की आजादी
19-Jul-2023 4:56 PM
सरकार के विरोध की अभिव्यक्ति की आजादी

डॉ. आर.के. पालीवाल

लोकतंत्र और में अभिव्यक्ति की आज़ादी और सरकार की नीतियों और निर्णयों का शांतिप्रिय विरोध सभी नागरिकों को प्राप्त दो ऐसे अधिकार हैं जो लोकतंत्र के जीवित रहने और फलने फूलने के लिए बहुत जरूरी हैं। हमारा संविधान भी अभिव्यक्ति की आज़ादी को महत्त्वपूर्ण नागारिक अधिकार मानता है और समय समय पर सर्वोच्च न्यायालय भी अभिव्यक्ति की आजादी के समर्थन में निर्णय देता रहा है।

इस सबके बावजूद अक्सर यह अहसास होता है कि सरकार का विरोध करने वालों को सत्ता पर काबिज लोग अभिव्यक्ति की आज़ादी से वंचित करने के हर संभव प्रयास करते हैं।सरकारी मशीनरी सरकार का विरोध करने वालों को तरह तरह से प्रताडि़त करती है। आम आदमी के लिए तो यह संभव ही नहीं है क्योंकि सरकार का विरोध करने वाले खास लोगों के साथ भी सरकारी मशीनरी का रवैया दुश्मन सरीखा होता है। इसके उदाहरण जगह जगह आए दिन देखने को मिलते हैं।

हाल ही में प्रधानमन्त्री की अमेरिका यात्रा के दौरान भी कुछ लोगों ने यह मुद्दा उठाकर प्रधानमंत्री की यात्रा का विरोध किया था जिससे हमारे देश की छवि को नुक्सान हुआ था। कुछ दिन पहले हम सबने देखा था कि नए संसद भवन के उदघाटन वाले दिन अंतर्राष्ट्रीय पदक जीतने वाले खिलाडिय़ों को संसद की तरफ बढऩे पर दिल्ली पुलिस ने किस तरह से घसीट कर रोका था जिसकी आलोचना उन्नीस सो तिरासी में क्रिकेट विश्व कप विजेता टीम के वरिष्ठ खिलाडिय़ों ने भी की थी। जब देश की राजधानी में केन्द्र सरकार द्वारा नियंत्रित दिल्ली पुलिस का आचरण इस तरह का होगा तब प्रदेशों की पुलिस से कैसे बेहतर आचरण की उम्मीद की जा सकती है। विगत कुछ दशकों में पुलिस प्रशासन का इतना राजनीतिकरण हुआ है कि वह बेहद संवेदनहीन बन गया है। पुलिस का रवैया सत्ताधारी दल के छुटभैए नेताओं तक के प्रति जरूरत से अधिक विनम्र रहता है और विरोधी पक्ष के नेताओं,कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों के प्रति बेहद क्रूर। इसका ताजा उदाहरण बिहार की राजधानी पटना में देखने को मिला है जहां प्रदेश सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले भारतीय जनता पार्टी के सांसदों तक पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया है जिसमें एक कार्यकर्ता की मृत्यु के समाचार प्रकाशित हुए हैं।

पुलिस का काम देश के अंदर अपराध नियंत्रण और कानून व्यवस्था सुनिश्चित करना है। जहां तक अपराध नियंत्रण का प्रश्न है उसमें कुछ सकारात्मक अपवादों को छोडक़र सामान्यत: पूरे देश की पुलिस का रवैया अच्छा नहीं है। शिकायत कर्ता की शिकायत पर एफ आई आर दर्ज करने के मामले में पुलिस अक्सर आलोचना का शिकार होती है। दूसरी तरफ बड़े नेताओं के कुत्ते,बिल्ली और गाय भैंस की चोरी और गुमसुदगी की खबर मिलने पर बुलेट ट्रेन की स्पीड से कार्यवाही करती है।

अभिव्यक्ति की आजादी रोकने में भी सरकारों की सबसे बड़ी मददगार पुलिस ही बनती है। जिस पुलिस का प्रमुख कार्य नागरिकों और उनके मूल अधिकारों की सुरक्षा का है उसी पुलिस का राजनीतिक दलों के शासकों की कठपुतली बन जाना अभिव्यक्ति की आज़ादी की सबसे बड़ी बाधा है। पुलिस के इसी रवैए के कारण एक तरफ सत्ताधारी दल के नेता और कार्यकर्ताओं को अभिव्यक्ति की पूरी आज़ादी मिलती है, यहां तक कि उनके उन भडक़ाऊ भाषणों पर भी कार्यवाही नहीं होती जिनसे सांप्रदायिक तनाव पैदा होता है । दूसरी तरफ़ विरोधी दलों को जरूरी मुद्दों पर शांतिपूर्ण तरीके से सभा करने और धरना प्रदर्शन करने पर भी तरह तरह से प्रताडि़त किया जाता है। इसी वजह से हाल में महाराष्ट्र की घटनाओं पर चिंता जताते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस को बिना भेदभाव किए सभी भडक़ाऊ भाषणों के खिलाफ कार्यवाही के निर्देश दिए थे।सर्वोच्च न्यायालय को अपने इन निर्देशों के अनुपालन की सतत मॉनिटरिंग भी करनी चाहिए तभी अभिव्यक्ति की आज़ादी के दोहरे मापदंड पर अंकुश लगेगा।


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