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पीएम मोदी की अगुवाई वाले ‘एनडीए’ पर कितना भारी पड़ेगा ‘इंडिया’
19-Jul-2023 4:46 PM
पीएम मोदी की अगुवाई वाले ‘एनडीए’ पर कितना भारी पड़ेगा ‘इंडिया’

 इमरान कुरैशी

कांग्रेस ने मंगलवार को बेंगलुरु में विपक्षी पार्टियों की बैठक का आयोजन किया और इस दौरान फैसला लिया गया कि उनके ‘महागठबंधन’ का नाम ‘इंडियन नेशनल डिवेलपमेंटल इन्क्लुसिव अलायंस’ यानी ढ्ढहृष्ठढ्ढ्र होगा। बीजेपी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी हृष्ठ्र के खिलाफ इसे ‘विपक्षी एकता’ का एक ठोस कदम माना जा रहा है। बेंगलुरु में 26 विपक्षी दलों के साथ आने के फैसले को राजनीतिक विश्लेषक एक सकारात्मक कदम मानते हैं। हालांकि उनका कहना है कि यह अच्छी शुरुआत है लेकिन अब भी ‘बहुत से जिन्न’ बाहर आने बाकी हैं जो 2024 के लोकसभा चुनाव शुरू होने से कुछ महीनों पहले होगा।

दिल्ली में रहने वाले वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक आनंद सहाय बीबीसी हिंदी से कहते हैं, ‘पटना के बाद बेंगलुरु में दूसरी बैठक के लिए साथ आते ही गठबंधन का नाम और को-ऑर्डिनेशन पैनल तय करना इस बात का संकेत है कि वे इसे लेकर खासे गंभीर है। ये उन्हें कितना एकजुट रखेगा अभी ये तो पता नहीं है। लेकिन एकजुटता की कोशिश साफ दिखती है। इसकी तुलना में बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए में बिखराव दिखता है। यही चीज ढ्ढहृष्ठढ्ढ्र को मकसद वाला गठबंधन बनाती है।’

हालांकि कई राजनीतिक टिप्पणीकार इस बात से सहमत नहीं हैं। राजनीतिक विश्लेषक डॉक्टर संदीप शास्त्री बीबीसी हिंदी से कहते हैं, ‘यह एक अच्छी शुरुआत है लेकिन इस पर कायम रहना काफ़ी महत्वपूर्ण है।’

एक अन्य वरिष्ठ राजनीतिक टिप्पणीकार राधिका रामासेशन ने बीबीसी हिंदी को बताया, ‘अतीत में किसी भी समय लोकसभा चुनाव से पहले कोई नाम सामने नहीं रखा जाता था। राहुल गांधी ने बड़ी चतुराई से इंडिया और भारत को एक दूसरे के सामने रख दिया है और इंडिया और भारत के बीच उस विरोधाभास को दूर कर दिया है, जिस पर आरएसएस/बीजेपी हमेशा अभियान चलाते रहे हैं। लेकिन चर्चा के केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं।’

बेंगलुरु में विपक्षी दलों की दूसरी बैठक में 26 दल उपस्थिति रहे जबकि पिछले महीने पटना में 16 दलों ने हिस्सा लिया था। आम आदमी पार्टी ने पटना में संवाददाता सम्मेलन में शामिल नहीं हुई थी क्योंकि कांग्रेस ने दिल्ली से जुड़े विवादास्पद अध्यादेश का समर्थन नहीं किया था।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े ने दूसरे विपक्षी दलों की मौजदगी में संवाददाता सम्मेलन में कहा कि ‘कुछ मतभेद हैं लेकिन हमने उन्हें किनारे रखा है’ और हम मुंबई में एक समन्वय पैनल और दिल्ली में एक सचिवालय स्थापित करने की योजना पर आगे बढ़ रहे हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने संयुक्त कैंपेन का भी सुझाव दिया।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की ओर से आयोजित डिनर में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के बीच की गर्मजोशी साफ दिखी।

दोनों एक दूसरे के आमने-सामने बैठकर बात कर रहे थे। दोनों के बीच यह बातचीत दो साल में पहली बार हो रही थी। यह गर्मजोशी तब और दिखी जब राहुल गांधी ने ये सुझाव दिया कि गठबंधन के नाम ‘इंडिया’ को ममता बनर्जी पेश करें।

इस बात को लेकर मतभेद भी था कि गठबंधन के नाम में ‘डेमोक्रेटिक’ (लोकतात्रिक) रखा जाए या ‘डेवलेपमेंटल’ (विकासपरस्त) रखा जाए।

वामपंथी दलों के नेताओं ने कुछ अलग सुझाव भी दिए और ये भी कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार ने सवाल उठाया था कि ‘इंडिया’ नाम रखना सही होगा या नहीं। हालांकि बिना किसी शोर-शराबे के इस नाम पर सहमति बन गई। ममता बनर्जी ने ये कहते हुए इसे पेश किया कि क्या ‘एनडीए इंडिया से भिड़ सकता है?’

खडग़े ने स्पष्ट करते हुए बात को आगे बढ़ाया कि कांग्रेस की दिलचस्पी सत्ता हासिल करने में नहीं बल्कि सामाजिक न्याय और संविधान की सुरक्षा करने में है।

खडग़े के भाषण की झलक सम्मेलन के बाद पारित प्रस्ताव में भी दिखी जिसमें कहा गया कि गठबंधन जातीय जनगणना को लागू करेगा।

गठबंधन में सीटों का बँटवारा सबसे बड़ा मुद्दा है और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इसे उठाया। हालांकि इस पर और अधिक चर्चा नहीं हुई। राहुल गांधी ने इस बात पर ज़ोर दिया कि ये वैचारिक लड़ाई है और ये माना जा रहा है कि इससे बैठक सहजता से हो गई।

प्रेस वार्ता को राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खडग़े, ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल ने संबोधित किया। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन इसमें शामिल नहीं हुए। कहा जा रहा है कि फ्लाइट पकडऩे के लिए उन्हें जल्दी निकलना पड़ा।

कई सवालों के जवाब मिलना बाकी

डॉक्टर शास्त्री कहते हैं, ‘मुझे लगता है कि ‘इंडिया’ ने सही राजनीतिक हलचल पैदा की है, लेकिन इससे जुड़े कई सवाल बाक़ी हैं। आप सीटों के बँटवारे को लेकर अलग-अलग राज्यों में होने वाली प्रतिस्पर्धा को कैसे सुलझाएंगे? यह सबसे पहली जटिलता है। संयुक्त कैंपेन का ममता का सुझाव काफ़ी आकर्षक लग रहा है। लेकिन क्या जमीनी स्तर पर वे सभी के अहंकार से निपट सकते हैं।’

डॉ. शास्त्री राधिका रामासेशन से सहमत हैं कि ‘एक सामान्य एजेंडा बीजेपी का विरोध है।’ शास्त्री ने कहा कि प्रतिस्पर्धा नेतृत्व के बजाय प्राथमिकताओं और नीतियों पर होनी चाहिए।

रामासेशन कहती हैं बीजेपी स्पष्ट रूप से कह रही है कि वे चाहते हैं कि बहस नेतृत्व पर हो। लेकिन रामासेशन आश्चर्य जताती हैं कि क्या यह मोदी पर ध्यान केंद्रित करना विपक्षी दलों की ‘सोची-समझी रणनीति’ है।

क्या मोदी की लोकप्रियता

रामासेशन कहती हैं, ‘ये बात सही है कि मोदी की लोकप्रियता 2014 वाली नहीं है। लेकिन इस अभियान में फिर से मोदी को चुनौती नहीं माना जाएगा, अब समय आ गया है कि वे एक वैकल्पिक एजेंडे के बारे में सोचें कि पीने का पानी, शिक्षा आदि जैसी जीवन की बुनियादी सुविधाएं पहुँचाने के बारे में गठबंधन क्या सोचता है।’

लेकिन सहाय का कहना है कि पहले के चुनाव परिणामों ने स्पष्ट रूप से दिखाया है कि कैसे मोदी न तो पश्चिम बंगाल में ममता की तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ सफल हो सके हैं और न ही कर्नाटक में।

वो कहते हैं, ‘इसलिए, स्वाभाविक रूप से वह अलग-अलग राज्यों में अलग प्रमुख खिलाड़ी हैं, जैसे राजस्थान, छत्तीसगढ़ या मध्य प्रदेश में कांग्रेस बीजेपी के खिलाफ है। इसलिए, सीट बँटवारा इस आधार पर तय किया जाएगा कि प्रमुख खिलाड़ी कौन है। लेकिन बीजेपी की बैठकों पर नजर डालें तो अगर चार नेता हैं तो चार गुट भी हैं।’

सहाय के मुताबिक, ‘अमेरिका के जो बाइडन और फ्रांस के मैक्रों के नजरिये को छोड़ दें तो मोदी की लोकप्रियता भी कम हुई है। वे मोदी को नहीं बल्कि भारत को पसंद करते हैं क्योंकि भारत हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार है। ’

मोदी का भ्रष्टाचार पर कैंपेन

रामाशेषन ने यह भी कहा कि विपक्षी दलों को ‘भ्रष्टाचार नामक जानवर से लडऩा होगा। विपक्ष के कई नेता आरोपों का सामना कर रहे हैं और कुछ जमानत पर हैं। विपक्ष को इस बात पर ध्यान देना होगा कि भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा है। एक नाम तय कर लेने से और गठबंधन बनाने का काम खत्म नहीं हो जाएगा।’

सहाय का कहना है कि मंगलवार की शुरुआत मोदी की राजनीतिक दलों की आलोचना से हुई, जिसकी अपेक्षा की जा रही थी।

वह ऐसे लोगों से बात कर रहे थे जो जवाब देने की स्थिति में नहीं थे। उन्होंने कोई नया मुद्दा नहीं उठाया।

‘इससे मुझे वह कहावत याद आ गई कि खिसियाई बिल्ली खंबा नोचती है। ये बौखलाहट की निशानी है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वह हमेशा कहते थे कि विपक्ष एक साथ नहीं आ सकता। अब जब उन्होंने यह कर लिया है, तो इस बात को मान लेनी होगी। बीजेपी बैकफुट पर है।’ (bbc.com/hindi)


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