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सारंगढ़ के जंगल में जे.जे.बंगला
15-Apr-2023 3:49 PM
सारंगढ़ के जंगल में जे.जे.बंगला

 डॉ. परिवेश मिश्रा

सारंगढ़ नगर से लगे हुए गुमर्डा अभयारण्य में एक रेस्ट हाऊस पास के गांव टमटोरा के नाम पर जाना जाता रहा है। 1999 में मुझे खुशी हुई देखकर कि इस रेस्टहाउस का नाम ‘जे.जे.दत्ता हट’ रख दिया गया है। छत्तीसगढ राज्य बना तो अफसर बदले। 2003 में फिर यहां पहुंचा तो देखा नाम मिटा दिया गया था। बात यहां नहीं रुकी। कुछ सालों के बाद एक अधिकारी ने सामने के पहाड़ के नाम पर रेस्टहाउस का नाम राठन-हट कर दिया। फिर अधिकारी बदले और वर्तमान में इसका नाम जे.जे. बंगला है।

मेरा यह लेख इस उम्मीद को समर्पित है कि वन विभाग का कोई जिम्मेदार अधिकारी इसे पढक़र सुनिश्चित करे कि इस अभयारण्य और श्री जेजे दत्ता के संबंधों तथा उसके महत्व से मैदानी अधिकारियों और पर्यटकों की वाकफिय़त हो और उनके नाम से इस अभयारण्य के जुड़ाव को स्थायित्व मिले। सच तो यह है कि किसी भी सरकारी योजना, स्थान, स्मारक आदि का नामकरण बहुत सोच-विचार के बाद किया जाना चाहिए और आम लोगों को ऐसे नामकरण के आधार, औचित्य, पृष्ठभूमि और तर्क के साथ नाम के महत्व से परिचित कराने की व्यवस्था होना चाहिए।

आजादी के बाद के पच्चीस साल भारत के वनों और वन्य-प्राणियों के लिए बर्बादी का काल था। अधिकतम नुकसान वनों के उन इलाकों में हुआ जो आजादी से पहले तक राजाओं के अपने निजी शिकार-गाह थे और जिन संरक्षित वनों को राज्यों के विलय के बाद राजाओं ने अपनी निजि सम्पत्ति के रूप में अपने पास न रखकर भारतीय संघ के हवाले कर दिया था। राजाओं का जो आदर, सम्मान, प्रेम, डर और खौफ (अलग-अलग अनुपात में) आम जनता को वृक्षों की कटाई और जानवरों के शिकार से रोकता था, उसे आज़ादी ने हटा दिया था।

आज देश मे जो कुल 617 नेशनल पार्क और अभयारण्य अधिसूचित हैं उनमे से आधे से अधिक ऐसे हैं जो आजादी से पहले शिकार के लिए आरक्षित वन थे- 277 राजाओं के इलाकों में और 87 अंग्रेजों द्वारा प्रशासित इलाकों में।

सारंगढ़ के राजाओं का अपना ऐसा ही आरक्षित वन और शिकार-गाह था गुमर्डा। कुछ अन्य प्रसिद्ध नामों में छत्तीसगढ में सरगुजा का सेमरसोत, दंतेवाड़ा का इन्द्रावती, बस्तर का कांगेर-वैली, कोरिया का गुरू घासीदास, गुजरात में सिंह के लिए विख्यात जूनागढ़ का गिर, केरल में ट्रावनकोर महाराजा का पेरियार पार्क, मध्यप्रदेश मे पन्ना, बांधवगढ़, सीधी का संजय-डुबरी, शिवपुरी का माधव राष्ट्रीय उद्यान, पालपुर-कूनो, सैलाना जैसे नाम शामिल हैं। इसी तरह कॉर्बेट (उत्तराखंड), कान्हा (मप्र), ताडोबा (महाराष्ट्र) अंग्रेजों के आरक्षित वन थे।

शिकार और संरक्षण, मानव और वन्य-प्राणियों का सह-अस्तित्व, इन सब के बीच संतुलन बैठाने का कार्य हाथों में लम्बा बांस लेकर हवा में झूलती रस्सी पर चलने जैसा होता है। इस दायित्व का निर्वहन वर्षों और पीढिय़ों के अनुभव और समझ की मांग करता है।

सरगुजा के महाराजा रामानुजशरण सिंह का नाम दुनिया के इतिहास में सबसे अधिक शेर मारने वाले व्यक्ति के रूप मे दर्ज है। हालांकि शेरों की संख्या 1150 पर पहुंचने के बाद उन्होने रिकॉर्ड रखना छोड़ दिया था पर अनुमान के अनुसार यह संख्या 1400 है। जब सन् 1918 में महाराजा रामानुजशरण सिंह ने राजकाज संभाला तब राज्य में आदमखोरों समेत शेरों की संख्या इतनी अधिक हो चुकी थी कि बड़ी तादाद में लोग राज्य छोडक़र भागने लगे थे। एक समय आया जब यह तय करना जरूरी हो गया कि सरगुजा में आदमी रहेंगे या शेर। सरगुजा से लगे हुए हैं कोरिया राज्य के जंगल। और कोरिया से लगे हुए हैं रीवा राज्य के जंगल। एक अनुमान के अनुसार प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति से द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बीच इस क्षेत्र में कोई तीन हजार शेर मारे गये थे। उसी अनुमान के अनुसार 1924 में भारत में सत्तर हजार शेर थे। अधिकांश मध्य क्षेत्र में।

जूनागढ़ राज्य में 1891 में सिंह की अनुमानित आबादी 31 थी। लॉर्ड कर्जन ने नवाब की ओर से आया शिकार का न्योता स्वीकार कर लिया था। लेकिन 1899-1901 के भीषण अकाल के बाद सिंहों की संख्या में भारी कमी हो गई। दोनों ने तय किया गया कि शिकार के स्थान पर वे मिल कर सिंह के संरक्षण की दिशा में काम करेंगे। 

आजादी से पहले शिकार का अधिकार चंद लोगों के पास सुरक्षित था। इस अभिजात्य वर्ग की कैद से निकला अधिकार जब सर्व-सुलभ हुआ तो यह अवसर अघोषित उत्सव में तब्दील होते समय नहीं लगा। दुर्भाग्य से इस उत्सव पर प्रभावी रोक लगने में पच्चीस साल लग गये।

प्रकृति, वन और वन्य-जीवों से अपने अगाध प्रेम के कारण प्रधानमंत्री बनने के बाद श्रीमती इंदिरा गाधी ने इनके संरक्षण को अपनी प्राथमिकता बनाया। किन्तु राह आसान नहीं थी। आजादी के बाद के दशकों में भारत विदेशी मुद्रा की भीषण कमी के दौर से गुजर रहा था। पर्यटन विदेशी मुद्रा की आमदनी का बड़ा स्रोत था और उन दिनों शिकार के साथ इसका अटूट संबंध था। शिकार-टूरिज्म लॉबी बहुत मजबूती से किसी भी प्रतिबंध के खिलाफ थी। यह संयोग नही था अप्रेल 1952 से अस्तित्व में रहे इंडियन बोर्ड फॉर वाईल्डलाईफ (आईबीडव्लूएल) ने कभी भी देश मे शेरों के शिकार पर प्रतिबंध की सिफारिश नहीं की थी। वन्य-प्राणियों, विशेषकर शेर, चीते, सांप, मगरमच्छ आदि की खाल का निर्यात विदेशी मुद्रा कमाने का बड़ा जरिया था। इसके अतिरिक्त रिसर्च के लिए हजारों की संख्या में बन्दर निर्यात किये जाते थे।

तब तक देश में इंडियन फॉरेस्ट एक्ट 1927 के प्रावधान के तहत शेर (बाघ) और अन्य वन्य-प्रणियों के शिकार के लिए परमिट जारी किये जाते थे। प्रधानमंत्री बनने के छह महीने के भीतर एक जुलाई 1966 के दिन श्रीमती इंदिरा गांधी ने देश में ‘इंडियन फॉरेस्ट सर्विस’ लागू कर एक छोटी शुरुआत की। इंदिरा जी ने राजा कर्ण सिंह को आईबीडव्लूएल का नया अध्यक्ष बनाया और एक जुलाई 1970 को परमिट प्रणाली को बंद करते हुए शेरों के शिकार को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया। वन चूंकि राज्यों का विषय था इसलिए सभी मुख्य मंत्रियों को इसके क्रियान्वयन के लिए पत्र लिखे गये। कुछ महीनों के बाद जब उन्हे पता चला कि इस रोक को लागू करने में सबसे अधिक कोताही मध्यप्रदेश में हो रही है तो उन्होंने मुख्यमंत्री श्री श्यामाचरण शुक्ल को एक के बाद एक तीन पत्र लिखे और हर एक की भाषा में उनकी नाराजगी और तल्खी पहले से अधिक थी।

उस वर्ष मध्यप्रदेश ने प्रतिबंध के बावज़ूद शेरों के शिकार के लिए 29 परमिट जारी किये थे। मुख्यमंत्री के भाई श्री विद्याचरण शुक्ल उन दिनों इंदिरा जी के मंत्रीमंडल के सदस्य भी थे और एल्विन-कूपर नामक शिकार-पर्यटन कम्पनी के मालिक भी। इन्दिरा जी की अत्यधिक नाराजगी का एक परिणाम यह हुआ कि कुछ समय में जब वन्य-प्राणी संरक्षण अधिनियम आया तो मध्यप्रदेश उसे लागू करने वाला देश का पहला राज्य बना।

इंदिरा जी को वन्य-प्राणी और पर्यावरण के लिए अपने लक्ष्यों को हासिल करने में भूतपूर्व राजाओं के योगदान की क्षमता पर पूरा विश्वास था। सारंगढ़ के राजा नरेशचन्द्र सिंह, भावनगर के राजा धर्मकुमार सिंहजी, ध्रंगधरा के राजा जैसे अपने मित्रों से समय समय पर वे चर्चा करती रही थीं।

10 सितम्बर 1971 के दिन जब इंदिरा जी ने अपने कुछ विश्वासपात्रों को बुलाकर वन्य-प्राणियों के संरक्षण के लिए कानून बनाने पर विचारमंथन किया तो उसमें अधिकारी कम, राजपरिवारों के सदस्य अधिक थे। कश्मीर के अंतिम राजा के पुत्र डॉ. कर्ण सिंह, कपूरथला राजघराने के च्च्बिलीज्ज् अर्जन सिंह, मशहूर पक्षी-मित्र सालेम अली के परिवार के जफर फतेह अली और दिल्ली ज़ू के मुखिया रह चुके राजस्थान काडर के कैलाश सांखला जैसे अधिकारियों के अलावा आमंत्रित थे महाराज कुमार रणजीत सिंह जी।

(बाकी पेज 8 पर)

श्री एम. के. रणजीत सिंह गुजरात में शिकार की परम्परा वाले वांकानेर राजघराने मे जन्म लेने के बाद भी युवावस्था में ही शिकार हमेशा के तज कर अपने आप को वन्य-प्राणियों के संरक्षण के लिए समर्पित कर चुके थे। 1961 में आई.ए.एस. में चयन के बाद इन्हे मध्यप्रदेश काडर दिया गया। उन दिनों प्रथा थी कि युवा अधिकारियों के अंदर छुपी विशिष्ट योग्यताओं और अभिरुचि को ढूंढक़र, पहचान कर, उसके अनुसार नियुक्तियां और जि़म्मेदारियां देकर उन्हे प्रोत्साहित भी किया जाता था और देश तथा प्रशासन के व्यापक हित में लाभ भी लिया जाता था। मध्यप्रदेश में शिक्षा के क्षेत्र में उन्ही के बैच के श्री शरदचन्द्र बेहार, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में श्री अशोक वाजपेयी, पुरातत्व के क्षेत्र में श्री के.के. चक्रवर्ती, और वन तथा पर्यावरण के क्षेत्र में डूंगरपुर राजघराने के श्री समर सिंह ऐसे ही कुछ उदाहरण रहे हैं।

 

राजा नरेशचन्द्र सिंह जी की बेटियां - मेरी पत्नी मेनका देवी तथा उनकी बहनें - जिन दिनों सागर के सेन्ट जोसेफ कॉन्वेन्ट के होस्टल में रह रहे थे, श्री रणजीत सिंह वहां असिस्टेंट कलेक्टर के रूप में पदस्थ थे और इन बच्चों के लोकल गार्जियन थे। मंडला में कलेक्टर रहने के दौरान कान्हा मे उनके किये कामों ने इंदिरा जी का ध्यानाकर्षण किया और वे दिल्ली बुला लिये गये। तब से प्रकृति और पर्यावरण से जुड़े विषयों के विशेषज्ञ के रूप में वे श्रीमती गांधी के पास उपलब्ध रहे। वन्य-प्राणि (संरक्षण) अधिनियम की पूरी परिकल्पना और कानून की ड्राफ्टिंग से लेकर बाद के क्रियान्वयन तक का कार्य इन्होने किया। 

 

वन्य-प्राणी (संरक्षण) अधिनियम नवम्बर 1972 में अस्तित्व में आया। जनवरी 1973 में यह मध्यप्रदेश में लागू हुआ। राज्य में वन विभाग के ही अन्दर वन्य-प्राणियों के लिये एक नया विभाग खड़ा करना था। विभाग के अधिकारियों की तब तक की समझ और अनुभव वनों के संरक्षण और उनके व्यावसायिक दोहन तक सीमित थी। वन्य-प्राणी एक सर्वथा नया विषय था। मुख्य धारा से हटना अधिकारियों की पदोन्नति की संभावना को प्रभावित करेगा कि नहीं इसे लेकर भी संशय था। ऊपर से तुर्रा यह कि इस विभाग के कामकाज पर प्रधानमंत्री की चौकस नजऱ रहने वाली थी। आम अधिकारी अपनी सेवाएं देने के लिए उत्सुक नहीं थे।

 

यहां कहानी में एन्ट्री होती है वन्य-प्राणी प्रेमी और राज्य के श्रेष्ठतम वरिष्ठ वन अधिकारियों में एक श्री जगत ज्योति (जे.जे.) दत्ता की। जिन दिनों वे राज्य के सर्वश्रेष्ठ साईन्स कॉलेज नागपुर में पढ़ रहे थे, उन दिनों एम.एस.सी. में गोल्ड-मैडिल प्राप्त करने वाले विद्यार्थी को मार्कशीट के साथ ही उसी कॉलेज में लेक्चरर के रूप में नियुक्ति पत्र भी पकड़ा दिया जाता था। 1946 में ज़ूलॉजी विषय में गोल्ड-मैडिलिस्ट रहे श्री दत्ता ने दो वर्ष शिक्षक के रूप में कार्य किया। 1948 में देहरादून के इंडियन फ़ॉरेस्ट कॉलेज में दाखिल हुए और दो वर्ष के बाद ए.सी.एफ. के पद पर काम शुरू किया। वन्य-प्राणियों में शुरू से श्री दत्ता की बहुत रुचि रही। 1967 में इनका चयन नेहरू-फेलोशिप के लिए हुआ और इन्हे कनाडा और अलास्का में वाईल्ड-लाइफ़ प्रबंधन की ट्रेनिंग के लिए भेजा गया था। सरगुजा और जगदलपुर जैसे स्थानों में कंज़र्वेटर फ़ॉरेस्ट रह चुके श्री दत्ता को मध्यप्रदेश का प्रथम चीफ़ वाईल्ड-लाईफ़ वॉर्डन नियुक्त किया गया। उसी दौरान दिल्ली में श्री रणजीत सिंह भारत के प्रथम डायरेक्टर वाईल्ड लाइफ़ नियुक्त किये गये।

 

श्री दत्ता के जिम्मे, अन्य बातों के अलावा, राज्य में नये अभयारण्यों को चिन्हांकित करने का काम था। श्री दत्ता तथा श्री रणजीत सिंह के साझा निर्णय के परिणामस्वरूप शुरुआत सारंगढ़ से हुई। गुमर्डा वन को राजा नरेशचन्द्र सिंह जी उतनी ही अच्छी तरह जानते थे जितना लोग अपनी हथेलियों की लकीरों को जानते हैं।  सारंगढ़ स्टेट के पुराने नक्शे निकाले गये। राजा साहब के साथ श्री दत्ता ने न केवल गुमर्डा का चप्पा-चप्पा घूमा बल्कि अभयारण्य की सीमा का निर्धारण भी दोनों ने साथ मिलकर किया। नतीजा : अधिनियम बनने के बाद गुमर्डा आकार लेने वाला भारत का सबसे पहला अभयारण्य बना। यह महत्व है रेस्टहाउस के नामकरण का जो भारत में वन्य-प्राणि संरक्षण के इतिहास में श्री जेजे दत्ता के साथ साथ सारंगढ़ की भूमिका को रेखांकित करता है।

Post Script: : (श्री दत्त 1979 में मध्यप्रदेश के चीफ़ कन्जऱवेटर नियुक्त हुए। तब यह विभाग का सबसे ऊंचा पद होता था। उनकी सेवानिवृत्ति से पहले इस पद को प्रिंसिपल चीफ़ कन्जऱवेटर का दजऱ्ा दिया गया। जिन श्री जे.जे.दत्ता के मैदानी सेवाकाल को इंदिरा गांधी जी के विचारों ने सबसे अधिक प्रभावित किया, वे उसी दिन सेवानिवृत्त हुए जिस दिन श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या की गयी : 31 अक्टूबर 1985)

गिरिविलास पैलेस

सारंगढ़ 496445

श्री जगत ज्योति दत्ता। पिछले सप्ताह परिवार जनों के बीच इन्होने अपना 97वां जन्मदिन मनाया है।

ज़ूम करने पर नाम दिखेगा ठन हटज

वर्तमान नाम जे जे बंगला


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