विचार / लेख
-ध्रुव गुप्त
भारतीय साहित्य के हज़ारों साल के इतिहास में कुछ ही लोग हैं जो अपने विद्रोही स्वर, अनुभूतियों की गहराईयों और सोच की ऊंचाईयों के साथ भीड़ से सर्वथा अलग दिखते हैं। मिर्जा गालिब उनमें से एक हैं। मनुष्यता की तलाश, शाश्वत तृष्णा, मासूम गुस्ताखियों और विलक्षण अनुभूतियों के इस अनोखे शायर के अनुभव और सौंदर्यबोध से गुजरना दुर्लभ अनुभव है। लफ्ज़़ों में अनुभूतियों की परतें इतनी कि जितनी बार पढ़ो, उनके नए-नए अर्थ खुलते चले जाते हैं। वैसे तो हर शायर की कृतियां अपने समय का दस्तावेज होती हैं, लेकिन अपने दौर की पीड़ाओं की नक्काशी का गालिब का अंदाज भी अलग था और तेवर भी जुदा। वहां रूढिय़ों का अतिक्रमण जीवन-मूल्य है,आवारगी जीवन-शैली और अंतर्विरोध जीवन-दर्शन। मनुष्य के मन की जटिलताओं, अपने वकत के साथ अंतसंघर्ष और स्थापित मान्यताओं के विरुद्ध जैसा विद्रोह गालिब की शायरी में मिलता है, वह उर्दू ही नहीं विश्व की किसी भी भाषा के लिए गर्व का विषय हो सकता है।
‘दीवान-ए-गालिब’ हमेशा से मेरी सबसे पसंदीदा किताब रही है। साल में एक बार दिल्ली के निजामुद्दीन में गालिब की मजार पर जाकर उनका दीवान मैं जरूर पढ़ता हूं। यह एक अतीन्द्रिय अनुभव होता है मेरे लिए। वहां देर तक बैठने के बाद गालिब से जो कुछ हासिल होता है वह है एक अजीब किस्म की बेचैनी। रवायतों को तोडक़र आगे निकल जाने की बेचैनी। जीवन और मृत्यु के उलझे रिश्ते को सुलझाने की बेचैनी। दुनियादारी और आवारगी के बीच तालमेल बिठाने की बेचैनी। अपनी तनहाई को लफ्जों से भर डालने की बेचैनी। इश्क के उलझे धागों को खोलने और उसके सुलझे सिरों को एक बार फिर उलझाने की बेचैनी। गालिब अपने मजार में बिल्कुल अकेले नजर आते हैं। जिंदगी में भी गालिब को अकेलापन ही पसंद रहा था। जीते जी उनकी ख्वाहिश यही तो थी-पडि़ए गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार / और अगर मर जाईए तो नौहा-ख्वां कोई न हो’!
उनके इस अकेलेपन में गालिब से मेरा घंटों-घंटों संवाद चलता है। उनसे कुछ सवाल करता हूं तो प्राय: जवाब भी मिल जाता है। पिछली सर्दियों में एक दिन देर तक उनके मज़ार पर उन्हें पढऩे-समझने के बाद मैं मजार के सामने की एक बेंच पर लेट गया था। मुझे लगा कि अपनी कब्र से गालिब मुझे एकटक देखे जा रहे हैं। उनसे कुछ कहने की तलब हुई तो बेसाख़्ता मुंह से यह शेर निकल गया-‘कुछ तो पढि़ए कि लोग कहते हैं/ कब से ‘गालिब’ गजल-सरा न हुआ’! पता नहीं क्या था कि हवा के एक बड़े तेज झोंके ने मेरे बगल में पड़े उनके दीवान के पन्ने पलट दिए। सामने जो गजल थी, उसके जिस एक शेर पर मेरी पहली निगाह पड़ी, वह यह था- ‘क्यूं न फिरदौस में दोजख को मिला लें यारब/सैर के वास्ते थोड़ी सी जगह और सही।’
आज अपने सबसे प्रिय शायर मिर्जा गालिब की जयंती पर उन्हें खिराज़!


