विचार / लेख
-कृष्ण कल्पित
कोलकाता और फुटबॉल का एक खास रिश्ता है । आनंद बाजार पत्रिका ने आज फीफा-फाइनल पर मेस्सी के संदर्भ से शीर्षक दिया है - अन्तिम कविता! यह टैगोर के प्रसिद्ध उपन्यास शेषेर कोविता का अनुवाद है।
जाहिर है कि यह शीर्षक मेस्सी की उस घोषणा से जुड़ा हुआ है कि यह विश्वकप उनका आखऱिी विश्वकप है। हालांकि जीतने के बाद मेस्सी ने कहा है कि वे अर्जेंटीना की राष्ट्रीय टीम से खेलते रहेंगे ।
आनंद बाजार पत्रिका ने इस कवरेज में माराडोना की विश्वकप चूमने की तस्वीर लगाकर खबर को इतिहास से जोडक़र अपनी कल्पनाशीलता का परिचय दिया है।
दुनिया का हर बेहतर और महान कर्म कविता हो जाना चाहता है जैसे कविता दुनिया की सर्वाधिक मानवीय, आनंददायक और कलात्मक शय हो !
क्या कोई कविता आखिरी हो सकती ? शायद नहीं । और विश्वकप फुटबॉल तो एक महाकाव्य है जिसे लगभग एक शताब्दी से पेले, माराडोना, बेजियो, जिदान, मेस्सी, एम्बापे इत्यादि द्वारा लगातार लिखा जा रहा है । फुटबॉल मनुष्यता का महाकाव्य है, जिसका एक उज्ज्वल और स्मरणीय अध्याय कल कतर में सार्वजनिक रूप से लिखा गया।
अर्जेंटीना, फ्रांस सहित सभी देशों/टीमों को, कोच और खिलाडिय़ों को और फुटबॉल के दीवानों को मुबारकबाद, जिन्होंने इस विश्वकप को यादगार बनाया।
खासतौर पर फुटबॉल के दो नए महाकवियों, मेस्सी और एम्बाप्पे को (एक ने जीतकर और एक ने हारकर) इस विश्वकप को अविस्मरणीय बना दिया।
यह एक ऐसा महाकाव्य/खेल है, जिसको लिखने वाला और पढऩे वाला/ जीतने वाला और हारने वाला- दोनों की आंखों से अश्रुधारा बहती है । ये पवित्र आंसू ही किसी महाकवि/महान खिलाड़ी का प्रतिदान होते हैं। ट्रॉफियां, पैसा, मशहूरी इस पारदर्शी पानी के सामने कुछ नहीं है ।
इन पवित्र आंसुओं को एक कवि का सलाम!


