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महाराष्ट्र का फैसला : 2024 का चुनाव परिवारवाद के खिलाफ
01-Jul-2022 4:47 PM
महाराष्ट्र का फैसला : 2024 का चुनाव परिवारवाद के खिलाफ

-सुदीप श्रीवास्तव
कल दोपहर बाद महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में जो कुछ घटा उसने सारे राजनीतिक पंडितों और खबरनवीसों को हतप्रभ कर दिया। 2019 में शिवसेना एवं भाजपा का चुनाव पूर्व गठबंधन महाराष्ट्र विधानसभा में बहुमत लेकर विजयी हुआ था परन्तु सरकार बनाने के समय यह गठबंधन केवल इसी बात पर टूट गया था कि शिवसेना ने पहले ढाई साल अपना मुख्यमंत्री बनाने के जिद की थी। भारतीय जनता पार्टी का नेतृत्व इस बात के लिए बिल्कुल तैयार नहीं था और इस लड़ाई में यह गठबंधन उस वक्त पूरी तरह टूट गया जब देवेन्द्र फडणवीस ने एनसीपी के अजित पवार को साथ लेकर मुख्यमंत्री की शपथ ले ली थी।

बहुत कम लोगों को इस बात का ध्यान है कि 2014 का लोकसभा चुनाव साथ लड़ने के बावजूद 2014 का महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव शिव सेना और भाजपा ने अलग-अलग लड़ा था। उस वक्त अगर एनसीपी और कांग्रेस गठबंधन में चुनाव लड़ते तो शायद उन्हीं का बहुमत आता परन्तु एनसीपी और कांग्रेस के भी अलग-अलग चुनाव लडऩे से बहुकोणीय संघर्ष हुआ और भाजपा 110 से अधिक सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। शिवसेना ने भी 70 सीटें जीतने में सफलता पाई जबकि राज ठाकरे के द्वारा अपनी पार्टी को चुनाव में उतार कर  शिवसेना और उद्धव ठाकरे को कमजोर करने की कोशिश की थी। इस सफलता ने बाला साहब ठाकरे की विरासत  पूरी तरह उद्धव ठाकरे के पक्ष में साबित कर दी थी।

2014 में सरकार बनाने के लिये लम्बा विचार विमर्श और समय लगा तब भी शिवसेना महाराष्ट्र में गठबंधन का नेतृत्व और मुख्यमंत्री पद  मांग रही थी परन्तु अंतत: देवेन्द्र फडणवीस के  नेतृत्व में भाजपा-सेना की गठबंधन की सरकार बनी। यह बात उद्धव ठाकरे को लगातार सालती रही और ढाई साल होने के बाद भाजपा नेतृत्व से बात कर सेना का मुख्यमंत्री बनाने की बात भी की गई। जाहिर है कोई नतीजा न निकलने पर उद्धव ठाकरे ने उस वक्त चुप रहना बेहतर समझा। धीरे-धीरे 2019 का लोकसभा चुनाव जब नजदीक आया उस वक्त उद्धव ठाकरे ने गठबंधन बनाये रखने के लिए यह शर्त रख दी कि 2019 विधानसभा चुनाव के बाद ढाई-ढाई साल का मुख्यमंत्री होगा और पहला  मौका शिवसेना को दिया जायेगा।

गठबंधन में तनाव की खबरों के बीच गृहमंत्री अमित शाह ने मुंबई का दौरा किया था उद्धव ठाकरे से एक मुलाकात की जिसमें काफी समय दोनों के सिवा कोई नहीं था। कहा जाता है कि इस मुलाकात में उद्धव ठाकरे के द्वारा शिवसेना को मुख्यमंत्री पद का मौका दिया जाने की शर्त रखी थी और उस पर अमित शाह के सहमति के बाद भी गठबंधन में चुनाव लड़ना स्वीकार किया था। यह वो समय था जब भाजपा का शीर्ष नेतृत्व 5 साल के कार्यकाल के दौरान उठाये गए मुद्दों के मद्देनजर लोकसभा चुनाव में बहुमत खोने का कोई मौका नहीं देना चाहता था अत: उसके लिये लोकसभा में शिवसेना से गठबंधन जरूरी था। खासकर यह देखते हुए की एनसीपी और कांग्रेस गठबंधन में ही चुनाव लडऩे वाली थी। जाहिर है उद्धव ठाकरे के द्वारा की गई दबाव की राजनीति को भाजपा शीर्ष नेतृत्व ने अच्छे से नहीं लिया था। यही कारण है कि 2019 विधानसभा साथ में लडक़र जीतने के बाद भी नरेन्द्र मोदी और अमित शाह इस बात पर अड़ गये थे कि मुख्यमंत्री भाजपा का ही होगा और शिव सेना को दर किनार कर अजीत पवार को साथ लेकर भाजपा एनसीपी सरकार भी बना ली गई।

शिवसेना और उद्धव ठाकरे को इस बात ने और अधिक उग्र कर दिया तथा कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर देवेन्द्र फडणवीस की यह सरकार 3 दिन भी नहीं चलने दी। एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने भी अपने भतीजे समेत सभी विधायकों को एकजुट रखा। इस घटना के कुछ दिन बाद भी उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में कांग्रेस और एनसीपी के साथ शिवसेना ने महाराष्ट्र में सरकार बना ली। यह पूरा घटनाक्रम भाजपा, केन्द्र सरकार और नरेन्द्र मोदी और अमित शाह को गहरे तक आहत कर गया। पिछले ढाई सालो में कई मामलों में केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग के आरोप लगे और कहा गया कि केन्द्र सरकार महाराष्ट्र सरकार को गिराने का षडय़ंत्र रच रही है। एनसीपी को कमजोर कड़ी मानकर सबसे अधिक कार्यवाही इसी के नेताओं के विरूद्ध देखने में आई फिर भी किसी भी तरह यह सरकार चलती रही।

2022 के राज्य सभा चुनावों और विधान परिषद चुनाव में मामूली संख्या को छोडक़र शिव सेना के बहुसंख्य विधायकों ने उद्धव ठाकरे द्वारा नामित किए गए प्रत्याशियों को ही वोट किया। परन्तु इसके तुरंत बाद 11 विधायकों का एकनाथ शिंदे के साथ सूरत पहुंचना और वहां से गोहाटी चले जाना सभी के लिये एक आश्चर्यजनक खबर थी। उद्धव ठाकरे के कार्य करने के तरीके से शिव सेना विधायक खुश नहीं है यह तो अंदाजा था पर इतने बड़े विद्रोह की कल्पना किसी ने नहीं की थी। गुवाहाटी पहुंचने के बाद एक ही दिन में बागी विधायकों की संख्या 30 के आसपास पहुंच गई और उन पर उद्धव ठाकरे के द्वारा एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बना देने के प्रस्ताव का भी कोई असर नहीं हुआ। बल्कि दिन प्रतिदिन बागी विधायकों की संख्या बढ़ती गई।

आखिर क्या ऐसी बात थी जिसके कारण एकनाथ शिंदे पीछे हटने तैयार नहीं हो रहे थे यह बात भाजपा के द्वारा उनके नेतृत्व में महाराष्ट्र की सरकार बनाने के बाद समझ में आती है। जून के महीने में ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मुंबई के यात्रा पर गये थे और एक कार्यक्रम  में उनकी मुलाकात  मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से हुई थी। बहुत सम्भव है कि उस मुलाकात में भी नरेन्द्र मोदी ने उद्धव ठाकरे को एनडीए में वापस आने का कोई न कोई इशारा दिया होगा, जिसे उद्धव ठाकरे ने नहीं माना होगा। इस मुलाकात के बाद भी घटना बहुत तेजी से चला है, 2019 में जो भाजपा शिवसेना को मुख्यमंत्री पद न देने पर अड़ी थी उसी भाजपा ने एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाया वह भी तब जब उसके 106 विधायकों का बहुमत देवेन्द्र फडणवीस को ही मुख्यमंत्री देखना चाहता था। उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री से हटाने की चाहत इतनी बड़ी थी कि उसके लिये भाजपा ने विशेषकर मोदी-शाह ने एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाना स्वीकार कर लिया। 2014 में जब फडणवीस को मुख्यमंत्री बनाया गया था तब यह कहा गया था कि एक ब्राह्मण को मुख्यमंत्री बनाना राजनीतिक भूल है परन्तु 2019 में फिर से 100 से अधिक सीटें जीतकर फडणवीस ने अपनी स्थिति मजबूत कर ली और वो एक बड़े नेता के रूप में स्थापित हो गये। इसके बावजूद इस बार उनको दरकिनार कर शिंदे को मुख्यमंत्री बनाने के पीछे मोदी-शाह की रणनीति साफ  दिखाई देती है। पहली बात तो यह है कि वे शिवसेना को एक परिवार की पार्टी नहीं रहने देना चाहती और उसका नेतृत्व किसी और के हाथ देना उनका मकसद है। इस एक काम से ठाकरे परिवार और उसके राजनीतिक वजूद को नुकसान पहुंचाना भी बड़ा उद्देश्य है। एकनाथ शिंदे मराठा हैं जो एनसीपी के प्रभाव को भी कम करने में भी उपयोगी हो सकते हंै। यही कारण है कि उनको नेतृत्व देकर एक सोची समझी राजनीतिक चाल भाजपा ने चली है।

2024 का चुनाव भारतीय जनता पार्टी परिवारवाद को केन्द्र में रखकर लड़ना चाह रही है। उसके सभी प्रमुख प्रतिद्वंदी राजनीतिक पार्टियों पर परिवारवाद की छाप है। यही कारण है कि भाजपा इन सबसे अपने को दूर कर रही है। तेलंगाना में टीआरएस के साथ उसके संबंध बेहतर थे परन्तु भाजपा ने स्वयं उसे निशाने पर ले लिया है। तमिलनाडु में एआईएडीएमके को जयललिता परिवार से दूर करना इसी रणनीति का हिस्सा है। महाराष्ट्र में भाजपा को शिवसेना का साथ तो चाहिए परन्तु वह ठाकरे परिवार को अलग करना चाहती थी। इस हिसाब से देखा जाये तो महाराष्ट्र में पिछले 15 दिन में जो हुआ है उसकी पटकथा पहले ही तैयार कर ली गयी थी। यह अलग बात है कि इसकी भनक कम से कम 2 दिन पहले तक खुद देवेन्द्र फडणवीस समेत महाराष्ट्र के नेताओं को नहीं थी। जबकि एकनाथ शिंदे सूरत से ही इस बात पर आश्वस्त थे कि उनकी स्थिति इतनी मजबूत होने वाली है कि वे शिवसेना से ठाकरे परिवार को बेदखल कर काबिज हो सकते है। यदि शिंदे को मुख्यमंत्री नहीं बनाया जाता तो उनके सांसद पुत्र पराग शिंदे को केन्द्र में मंत्री बनाने का दबाव रहता, ऐसी स्थिति में परिवारवाद की राजनीति से दूरी बनाने का मोदी और शाह का उद्देश्य पूरा नहीं होता। देवेन्द्र फडणवीस को उनकी इच्छा के विरूद्ध उपमुख्यमंत्री बनाकर नरेन्द्र मोदी ने यह भी संदेश दिया है कि वे पार्टी में एकमात्र निर्णय करने का अधिकार रखते हंै। यही कारण है कि पुष्कर सिंह धामी को चुनाव हारने के बावजूद मुख्यमंत्री बना दिया जाता है और महाराष्ट्र में भाजपा को 100 से अधिक सीटें जिताने के बाद भी फडणवीस पिछड़ जाते हैं।


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