विचार / लेख

प्यादे से फर्जी भयो, टेढ़ो टेढ़ो जाय
21-Jun-2022 6:21 PM
प्यादे से फर्जी भयो, टेढ़ो टेढ़ो जाय

-प्रकाश दुबे    

ताजिंदगी साला मैं तो फौजी अफसर बन गया, गाने वाले लाल बत्ती की चकाचौंध में बौराकर कलमीजीवी को अपमानित करने अंगरेजी झाड़ते हैं। प्रेस को प्रेस्टीट्यूट कहते वक्त तनिक नहीं सोचा कि वर्दी से लेकर नीयत तक किस किस चीज की बोली लगाकर संसद की देहरी चढ़ पाए? भूत हो चुके प्रेस परिषद के एक अध्यक्ष कुर्सी के नशे में धुत्त होकर पत्रकारों को अनपढ़ कहकर मुदित होते थे। अपने-पराए के भेद से न्याय व्यवस्था अछ़ूती नहीं है। ऐसे दौर में न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई ने सबकी सहमति से भारतीय प्रेस परिषद की कप्तानी स्वीकारी। पूर्व अध्यक्ष न्यायमूर्ति चंद्रमौलि कुमार प्रसाद ने न्यायमूर्ति रंजना के चयन को बहुत अच्छा निर्णय बताया। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश आफताब आलम ने न्या देसाई को सदा धैर्य बंधाया। बरसों पहले क्षुद्र गुटबाजी के कारण रंजना सहायक महाधिवक्ता के पद से त्यागपत्र देने लगीं। महाराष्ट्र के तत्कालीन महाधिवक्ता एडवोकेट वी आर मनोहर के समझाने बुझाने पर मानी। उसके बाद पीछे मुडक़र नहीं देखा।

 दे दाता के नाम

कहते हैं, उन्हें महाराज। ज्ञानी और विनयशील। दादा गुलाब सिंह की दो सौं वीं जयंती पर पोता अकिंचन की तरह याचना कर रहा था-दे दाता के नाम, तुझको-आगे वाला शब्द आप समझें। इन दिनों शब्द भी आतंकवादी होने लगे हैं। हम असली कहानी की ओर मुड़ें। जम्मू के हरि निवास में डोगरा राजा की जयंती मनाई गई। संविधान के अनुुच्छेद-370 को हटाने के बाद के फायदे गिनाने की केन्द्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा में होड़ लगी थी। डा कर्णसिंह से महाराजा और सदरे रियासत का ओहदा छिन गया। डाक्टर का पद शिक्षा अर्जित है। भावनाओं पर नियंत्रण रखते हुए कहा-कश्मीर को भारतमाता के भाल का मुकुट कहते थे। देश के सबसे बड़े सूबों में शामिल था। केन्द्रशासित इकाई बनने के बाद अब जम्मू कश्मीर की हरियाणा और हिमाचल से कम औकात रह गई। विवश पूर्व सदरे रियासत ने रक्षा मंत्री या उपराज्यपाल से यह मांग नहीं की। जम्मू विश्वविद्यालय में महाराजा गुलाब सिंह की विरासत पर आयोजित संगोष्ठी में बोल रहे थे। डा सिंह की नाखुशी और याचना विद्यार्थियों ने सुनी।

कैफे काफी डे

यूं तो कन्नड़, उडुपी, मंगलोरियन काफी हाउसों की दिल्ली में कमी नहीं है। तीन तीन कर्नाटक भवन और कन्नड़ नागरिकों के संगठन हैं। सांसद, मंत्री और दर्जनों नौकरशाह हैं। कैफे काफी डे के वी जी सिद्धार्थ का कर्नाटक मुख्यमंत्री एस एम कृष्णा से संबंध था। दोनों इस दुनिया में नहीं हैं। मुख्यमंत्री बसवराज पाटील को दिल्ली में काफी पीने के लिए अनोखी जगह तलाश करनी पड़ी। बसवराज उन बदकिस्मत मुख्यमंत्रियों में से हैं जिन्हें दिल्ली परिक्रमा के दौरान नेताओं से मुलाकात का समय नहीं मिलता। मंत्रिमंडल विस्तार की अर्जी पलटकर देखना और बात करना बहुत दूर की बात है। अपनी और औरों की पार्टी के नेता एक ही सवाल पूछ कर डराते हैं-मुख्यमंत्री बदलने की चर्चा तेजी पकड़ रही है। मुख्यमंत्री बोम्मई ने दिल्ली के भवनों या अन्य सार्वजनिक काफी हाउसों में जाना बंद कर दिया। प्रदेश के नेताओं से मुलाकात से बचते हैं। अधिकांश समय जोशी कैफे में बिताते हैं। वहां काफी और सलाह दोनों मुफ्त मिलते हैं। कन्नड़ पत्रकार के अनुसार केन्द्रीय संसदीय कार्य और कोयला मंत्री प्रहलाद जोशी पर बोम्मई का भरोसा कायम है।

बड़ो बड़ो प्रधान  

दिल्ली का जाना पहचाना ठिकाना है-तीन मूर्ति। पढऩे लिखने वाले ग्रंथालय और दस्तावेज पलटते। चटपटे चटखारे लेने वाले मथाई नुमा लेखकों की किताबों के सही गलत किस्से सुनाया करते थे। पहले प्रधानमंत्री ने किस पेड़ के नीचे सिगरेट फूंकी? किस विदेशी महिलाओं के अधरों पर अधर रखे, किस प्रधानमंत्री की कितने बजे किससे अंतरंग मुलाकात होती थी? कहानियों और परियों के पंख घटते बढ़ते रहते हैं। उसी हिसाब से किस्से अदृश्य आत्माओं की तरह घूमते रहते हैं। जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी लंबे समय तक रहे। पिछले छह साल में उनके किस्सों को देशभक्ति के खास रंग में रंगा  गया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आदेश पर तहत मूर्ति भवन का नया रूप प्रधानमंत्री संग्रहालय तैयार है। दिल्ली में राहुल गांधी ईडी की देहरी पर हाजिरी दे रहे थे, कांग्रेसजन धरना और नारेबाजी में व्यस्त रहकर राज्यसभा चुनाव की पराजय पर मरहम लग रहे थे, उस दिन उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू सपत्नीक प्रधानमंत्री संग्रहालय पहुंचे। देर तक मुआयना करते रहे। प्रसन्न हुए। चटखारे लेने वाले भक्त प्रसन्न हैं या दुखी? वर्तमान प्रधानमंत्री निवास में मात्र चार बड़ी कोठियां समा चुकी हैं।

(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)


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