विचार / लेख

कनक तिवारी लिखते हैं- आशीष को आशीष देने में पेंच लगा है भाई
22-Apr-2022 4:56 PM
कनक तिवारी लिखते हैं- आशीष को आशीष देने में पेंच लगा है भाई

केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा के आरोपी बेटे आशीष को बहुत गंभीर अपराधों के बावजूद इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा जमानत दिए जाने से सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों में अपेक्षित हलचल हुई। कहीं अधिक महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया कानूनी और न्यायिक इलाकों मेंं हुई। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के जज राजीव कुमार ने कई स्थिर मान्यताओं को दरकिनार करते जमानत दी। वह तो संदेह भी पैदा करता है। सुप्रीम कोर्ट की भलमनसाहत थी कि जमानत के आदेश पर कड़ी और असरकार टिप्पणी नहीं की। मीडिया में इस बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया गया कि सुप्रीम कोर्ट ने मानो कहा कि जमानत देने के पहले पीडि़त पक्ष को तसल्लीयुक्त ढंग से सुनना चाहिए। कुछ वर्षों पहले तक यह अदालत आधारित अवधारणाएं पुष्ट होती रही हैं कि अपराधिक मामलों में मुल्जिम और राज्य के बीच ही वास्तविक विवाद होता है। पीडि़त पक्ष एवं अन्य की तो केवल गवाही होती है। वे एक तरह से तृतीय पक्ष या पाश्र्व या हाशिए में खड़े हुए किरदारों की तरह समझे जाते रहे हैं। दुनिया की फौजदारी अदालतों मेंं लगातार यह नाइंसाफी महसूस की जाती रही कि मुस्टंडे और रसूखदार मुल्जिम पुलिस की सांठगांठ और कई बार चश्मदीद गवाहों सहित पोस्टमॉर्टम आदि करने वाले डॉक्टरों को पटाकर मुकदमे बहुत दिनों तक चलवाने में समर्थ होते हैं और फिर छूट जाते रहे। शिकायतकुनिंदा व्यक्ति चाहे डकैती, बलात्कार या हत्या जैसे अपराधों का भी षिकार हो धीरे-धीरे निराश और हताश होता मुिल्जम से ही मुंह चुराता रहा। मानो पीडि़त ही गुनहगार है। इस मार्मिक सवाल पर पूरी दुनिया का ध्यान गया। तब संयुक्त राष्ट्र संघ में एक मत स्थिर हुआ कि फौजदारी प्रकरणों में पीडि़त व्यक्ति को पूरी तौर पर अपना पक्षसमर्थन करने का अधिकार मिलना चाहिए, वरना न्याय हो ही नहीं सकेगा।

तद्नुसार दंड प्रक्रिया संहिता में भारत में पीडि़त व्यक्ति की परिभाषा शामिल की गई और उसके अधिकारों का आसमान सुप्रीम कोर्ट की नजीरों में बुना गया। आशीष मिश्रा के प्रकरण में भी सुप्रीम कोर्ट ने विस्तार से पीडि़त के अधिकारों की उपेक्षा करने के कारण इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज की खिंचाई की और मामला फिर विचारण के लिए वापस किया कि पीडि़त पक्ष को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देकर नए सिरे से तीन माह के अंदर जमानत पर आदेश पारित किए जाएं। कोर्ट ने यह मत भी दोहराया कि विश्व स्तर पर न्यायिक दर्शनशास्त्र में यह उदारता और नया रुख आया है कि गंभीर से गंभीर अपराधों में भी पूरा प्रकरण सुन लिए जाने तक जमानत नहीं दी जाए-यह भी सोच लेना अभियुक्त के लिए न्यायसंगत नहीं होगा। कई बार मामले के लंबित रहने के दौरान संभावित सजा का एक बड़ा हिस्सा अपने आप ही व्यतीत हो जाता है। लेकिन इसका यह आशय नहीं कि आरोपी को छूट देने का कोई उपक्रम रचा ही जाए। असल में सुप्रीम कोर्ट ने आशीष मिश्रा के प्रकरण के निर्णय के पैरा 30 में संभावित जमानत मिलने की मुश्कें बांध दी हैं। इस ओर ध्यान देना जरूरी है। अपने एक पुराने फैसले प्रशांत कुमार सरकार बनाम आशीष चटर्जी वगैरह पर निर्भर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आठ बिंदु इलाहाबाद हाईकोर्ट के विचारण के लिए तय कर दिए हैं। उन पर तार्किक विचार किए बिना आषीष मिश्रा को जमानत देना यक-ब-यक मुनासिब नहीं होगा:-
1.क्या प्रथम दृष्टि में ऐसा प्रतीत होता है कि मुलजिम ने अपराध किया होगा। (आशीष मिश्रा उसी जीप पर बहैसियत मालिक सवार तो था जिसने किसानों को रौंद दिया।)
2.आरोप की गंभीरता और प्रकृति क्या है? (पैदल चलते किसानों के झुंड को तेज गति से चलती मोटरगाड़ी से कुचल तो दिया गया।)
3.सजा की हालत में दंड का परिमाण क्या हो सकता है? (कत्ल का इल्जाम भी लगने पर अधिकतम सजा तो आजन्म कारावास या फांसी की हो सकती है।)
4.जमानत मिलने पर अभियुक्त का फरार हो सकना। (केन्द्रीय मंत्री का पुत्र होने से आरोपी रसूखदार तो है।)
5.आरोपी का चरित्र, बर्ताव, साधन संपन्नता और समाज में स्तर वगैरह (केन्दीय मंत्री और उनके पुत्र का प्रभाव लखीमपुर खीरी क्षेत्र में इतना है कि वहां से विधानसभा और लोकसभा की सीटें उनके कारण भाजपा लगातार जीत रही है और वे उत्तेजक भाषण और धमकी देने में पुराने माहिर हैं।)
6.अपराध की पुनरापत्ति होने की संभावना? (मंत्री और पुत्र के विरुद्ध लगातार अपराधिक प्रकृति की शिकायतें होती ही रही हैं।)
7.गवाहों को धमकाए जाने की संभावनाएं? (यह संभावना तो बहुत मजबूत है क्योंकि गवाह समाज में साधारण हैसियत के लोग हैं। उन्हें धमकाया, फुसलाया, बहलाया तो जा सकता है और खासकर उत्तरप्रदेश की सरकार ने जिस तरह आरोपी की लगातार मदद की है। उसे देखते तो संभावनाओं का आकाश कभी भी टूट पड़ सकता है।)
8.जमानत देने की स्थिति में न्याय के पथ में अवरोध हो सकता है? (देश का मीडिया राजनीतिक दल किसान समूह और तमाम लोग लगातार केन्द्रीय मंत्री के रसूखदार बेटे के खिलाफ मांग करते रहे लेकिन उत्तरप्रदेश की योगी सरकार ने जांच तक ठीक से नहीं की। तब सुप्रीम कोर्ट को दखल देकर पंजाब और हरियााण हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज की निगरानी में अन्वेषण कराना पड़ा। उस कमेटी ने भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट मे अपील करने की सलाह दी उसे भी योगी सरकार ने खारिज कर दिया।)

उपरोक्त हालत में सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय अपने स्वतंत्र विवेक के अनुसार जमानत के आवेदन पत्र का निपटारा करे। हाईकोर्ट को पूरा हक होता हैं कि वह स्वायत्त रूप से ऐसे आवेदन का निराकरण कर सकता है लेकिन इस प्रकरण में जस्टिस राजीव कुमार द्वारा हड़बड़ी और एकांगी आधारों पर जो फैसला किया गया उसे सुप्रीम कोर्ट ने सही नहीं माना और उपरोक्त न्याय निर्णय पर अविलंब करने का सैद्धांतिक आधार मुहैया कराया है।

 


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