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छत्तीसगढ़ एक खोज : बासठवीं कड़ी : प्रवीर चंद्र भंजदेव : एक अभिशप्त नायक या आदिवासियों के देव पुरुष
02-Apr-2022 4:21 PM
छत्तीसगढ़ एक खोज : बासठवीं कड़ी : प्रवीर चंद्र भंजदेव : एक अभिशप्त नायक या आदिवासियों के देव पुरुष

-रमेश अनुपम

बस्तर महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव की यह अंतिम कड़ी है। छत्तीसगढ़ एक खोज सीरीज की यह सबसे लंबी कड़ी सिद्ध हुई है। इस कड़ी को मिलाकर  अब तक इसकी  21 कड़ियां लिखी जा चुकी हैं।
 
बस्तर महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव से संबंधित  कुछ और भी  पुष्ट जानकारियां और सामग्रियां मुझे मिलती जा रही हैं , जिसका उपयोग मैं बाद में एक किताब के रूप में करूंगा।
 
फिलहाल बस्तर महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव पर केंद्रित कड़ियों को मैं यहीं विराम देना चाहूंगा।

बस्तर महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव  पर लिखने और कहने के लिए बहुत कुछ है। बहुत कुछ ऐसा भी है जो इस कड़ी में आने से रह गया है।

बस्तर महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव पर लिखते हुए मैने हर संभव यह प्रयास किया है कि अतिशय भावुकता से बचते हुए मैं उपलब्ध लिखित और प्रामाणिक तथ्यों के साथ इसे आप सभी के सामने ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर सकूं। इसमें कितना सफल या असफल हुआ इसे इसके पाठक ही तय करेंगे।

इसी संदर्भ में मैने दो बार बस्तर की यात्रा भी की। जिसमे कुछ नए तथ्य मेरे हाथ भी लगे जिनका मैने अपनी इस कड़ी में इस्तेमाल भी किया। इस यात्रा में कुछ ऐसे दुर्लभ व्यक्तियों से भी मिलने का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ जिन्होंने बस्तर महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव को निकट से देखा और जाना था।

इस बीच के.एल. पांडेय कमीशन की जांच रिपोर्ट भी मुझे देखने को मिली  जो कि किसी भी  सरकारी जांच रिपोर्ट की तरह केवल एक खाना पूर्ति भर है।

बस्तर महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव की अंतिम पोस्ट मार्टम रिपोर्ट भी मुझे देखने को मिली। जिसमें उनके शरीर में 17 गोलियों के निशान तथा चाकू के अनगिनत घाव पाए जाने का स्पष्ट रूप से उल्लेख है।

इतनी क्रूरतापूर्वक हत्या के विषय में क्या कहा जाए ?  यह मेरी समझ से परे है । मेरी कलम इसे लिख पाने में असमर्थ है।

इतनी जघन्य हत्या तो किसी क्रूरतम अपराधी की भी नहीं की जाती है । जबकि प्रवीर चंद्र भंजदेव एक संवेदनशील और विद्वान व्यक्ति थे।
 
मैने अपनी बस्तर यात्रा के दरम्यान उनके संपर्क में रहे जिन कुछ लोगों से मुलाकात की थी उन्होंने मुझे बताया था कि वे अत्यंत आकर्षक और सुंदर व्यक्तित्व के धनी थे। आदिवासियों के प्रति बेहद संवेदनशील और अध्ययनशील प्रवृति के थे। राजमहल में उनकी एक विशाल लाइब्रेरी हुआ करती थी। जिसमें अंग्रेजी, हिंदी की किताबों का अद्भुत संग्रह था।

ऐसे महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव किसी का क्या बिगाड़ सकते थे ? केवल तीर धनुषधारी आदिवासियों के साथ सत्ता के खिलाफ कैसे विद्रोह कर सकते थे ?  केवल आदिवासियों के शोषण के खिलाफ आवाज उठाना किसी राजद्रोह की श्रेणी में भला कैसे आ सकता है ?

महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव की जिस समय हत्या हुई उस समय उनकी आयु मात्र 37 वर्ष की थी। एक तरह से अभी उनका पूरा जीवन शेष था।

वे देश के अन्य राजाओं  की तरह अगर सत्ता पर आसीन राजनीतिज्ञों के आगे पीछे होते रहते , उनकी हर साजिश और षड्यंत्र में हिस्सेदार बने होते, बस्तर के आदिवासियों के दुख दर्द और शोषण को अनदेखा कर देते, राज सुख को ही सर्वोपरि मान लेते  तो संभवतः वे भी सत्ता पर आसीन राजनीतिज्ञों के हमराज़ और हमराह होते।

कम से कम तब  उनकी इस क्रूरता के साथ हत्या  तो नहीं की जाती  और वे भी  अन्य राजा महाराजाओं की तरह विधायक ,सांसद या केंद्र में मंत्री पद को सुशोभित कर रहे होते।

पर इसी धरा पर कुछ लोग अपने जीवन में कुछ असाधारण कार्य  करने के लिए भी  जन्म लेते हैं और मनुष्यता की एक नई मिसाल पेश करते हैं।

सच कहूं तो वे सम्पूर्ण अर्थ में एक मसीहा होते हैं, एक देव पुरुष। बस्तर महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव भी इसी तरह की एक अनमोल शख्सियत थे।
वे सही अर्थों में एक मसीहा थे। एक देव पुरुष थे। जिन्हें हम ठीक से नहीं समझ पाए थे। जिनका सटीक मूल्यांकन हम समय रहते नहीं कर पाए थे।

यह अकारण नहीं है कि बस्तर के आदिवासी आज भी अपने इस देव पुरुष की तस्वीर अपनी देवगुड़ी में अपने आराध्य देवों के साथ रख कर उनकी पूजा करते हैं । उन्हें दंतेश्वरी देवी का प्रथम या प्रमुख पुजारी भी कहा जाता है।

काकतीय राजा प्रवीर चंद्र भंजदेव के बिना बस्तर का इतिहास लिखा जाना कभी संभव नहीं होगा।
 
शायद आने वाले समय में उनका और बेहतर मूल्यांकन संभव हो सके। इसी प्रत्याशा के साथ बस्तर महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव की श्रृंखला यहीं समाप्त होती है।

इसी के साथ ही छत्तीसगढ़ एक खोज से भी कुछ दिनों के लिए मैं विश्राम लेना चाहता हूं। 62 वीं कड़ी लिखने के बाद आगे की तैयारी के लिए मुझे भी कुछ वक्त चाहिए।

छत्तीसगढ़ एक खोज एक तरह से मेरे लिए एक शोध कार्य की तरह है, जिसका ध्येय कुछ नए तथ्यों का अनुसंधान करना है। अब तक लिखे गए तथ्यों की प्रामाणिक जांच तथा के साथ ही नए नए तथ्यों का उद्घाटन करना है।

महात्मा गांधी के छत्तीसगढ़ प्रवास , सुंदर लाल शर्मा, नारायण सिंह, गुंडाधुर, हबीब तनवीर, पंडित सत्य दुबे  तथा  छत्तीसगढ़ की कुछ  अन्य विभूतियों पर कुछ ठोस सामग्रियों और तथ्यों के साथ लिखने के लिए मुझे वक्त की जरूरत तो होगी ही।

तो फिलहाल कुछ दिनों के लिए अलविदा


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