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कभी उस पर ऊँगली उठाते हो जो महिला के अंदर खून की कमी के लिए दोषी है ?
02-Apr-2022 4:14 PM
कभी उस पर ऊँगली उठाते हो जो महिला के अंदर खून की कमी के लिए दोषी है ?

-अपूर्व गर्ग
हर दूसरा आदमी किसी न किसी बीमारी से जूझ रहा। हर तीसरा-चौथा व्यक्ति की जीवनशैली रोगों की चपेट में है। आपातकालीन संकट तो पूछिए ही नहीं!

पांच करोड़ से ज्यादा लोग कोरोना के शिकार हुए और इन्हें बचाते हजारों डॉक्टर शहीद हुए। और सुनिए, प्रतिदिन 67,385  बच्चे पैदा होते हैं। इनके पैदा होने से पहले और इनके पैदा होने के बाद तक प्रतिदिन डॉ. अर्चना शर्मा की तरह महिला रोग विशेषज्ञ इनकी जिंदगियाँ बचाती हैं, जो कभी खबर नहीं बनती।

जान बचाना तो डॉक्टर का पेशा है न! क्यों ख़बर बने?

हाँ जान जाये तो लाइव ही लाइव। अच्छे पत्रकार तो सबका पक्ष रखते हैं पर उत्तेजना के घोड़े पर सवार लोगों को कहाँ होश रहता है या समझ होती है कि आखिर केस का मेडिकल पक्ष क्या है?

ईमानदारी से सोचिये आज कितने मीडिया संस्थान अपने उन पत्रकारों को जो मेडिकल बीट कवर करते हैं, मेडिकल ज्ञान प्रदान करवाने ट्रेनिंग देते हैं?

आज दवाइयों के दाम में कमरतोड़ वृद्धि हुई है, जरा पूछिए दवा नीति के बारे में इनसे?

पूछिए स्वास्थ्य नीति के बारे में इन मीडिया संस्थानों से?

पूछिए कि आईडीपीएल, एचएएल, बीआई जैसे सार्वजनिक क्षेत्रों के बाद दवाई की दुनिया का क्या हश्र हुआ?

अब उस जनता की बात करें जो हर अवैज्ञानिक काम में सबसे आगे रहती है पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना ही नहीं चाहती।

इन्हे कैसे बताएँगे कि 66.4 प्रतिशत महिलाएं एनेमिक हैं और जब ये गर्भधारण करती हैं तब डॉक्टर के पास जाती हैं।

एनीमिया को यथासंभव ठीक कर उपचार और अच्छी डाइट की सलाह देकर डॉक्टर इनका उपचार करती हैं। डिलीवरी सफल तो कोई बात नहीं असफल तो उँगलियाँ उठाओ!

क्या कभी उस व्यवस्था पर ऊँगली उठाते हो भाई जो महिला के अंदर खून की कमी और प्रोटीन-विटामिन की कमी के लिए दोषी है?

उनसे सवाल करते हो जो कानूनी मातृत्व अवकाश 26 सप्ताह तो दूर दस दिन देने से कतराते हैं?

बड़ा तबका निजी क्षेत्र में कार्यरत है। इस देश में कितने निजी क्षेत्र ‘मैटरनिटी लीव’ कानून का पालन कर रहे?

सोचिये निजी क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाएं जब गर्भ धारण करती हैं तो कितने खतरे उठती हैं?

इन्हें ‘मैटरनिटी लीव’ तो दूर मिनिमम वेज भी नहीं मिलता...पर इस समाज को गुस्सा नहीं आता!

सारे अवैज्ञानिक ढकोसले ये करेंगे पर बच्चे के जन्म से जुड़े ज्ञान-विज्ञान को ये समझना ही नहीं चाहते।

गर्भवती महिला का ब्लड प्रेशर जिसे पीआईएच या प्रीक्लैंप्सिया कहा जाता है बढ़ता है। जब बच्चे के आसपास के अमीनोटिक तरल बहुत कम होता है तो  आलिगोहाइड्राम्निओस स्थिति  बनती है।

ऐसी कई जटिलताएं हैं जिसे आज के डॉक्टरों ने लगातार शोध कर काफी नियंत्रित किया है और हमें एक सुंदर सी दुनिया उपहार में दी है।

क्या कभी हमने समझने की कोशिश की, कि बड़ी-बड़ी जटिलताओं के बावजूद सफल डिलीवरी हो रही, सफल सर्जरी हो रही।

चलिए, आप कहेंगे कि काफी बड़ी आबादी की समझ उतनी नहीं है...मान लिया!

जब समझ नहीं तो व्हाटस ऐप विश्विद्यालय की खबरों के आधार पर बवाल क्यों?

अच्छा, ये तो समझते हैं कि कम उम्र में विवाह न किया जाए?
ये तो समझते हैं कि महिला के स्वस्थ होने पर ही बच्चा पैदा करने का निर्णय लें?

ये तो समझते हैं कि ‘खुशहाल जच्चा, सुरक्षित बच्चा’?

तो ये बताइये कि जच्चा को  खुशहाल रखने के लिए जो जरूरतें हैं उसके लिए कभी मुँह खोला?

बढ़ती भयानक महंगाई आपके लिए चौतरफा संकट बढ़ाएगी, ऐसे में जच्चा खुशहाल तो दूर सुरक्षित ही नहीं रह सकती। ऐसे में संतुलित पौष्टिक आहार की क्या चर्चा करूँ?

और  इस पर भी आप अपनी अज्ञानता, अवैज्ञानिकता से अंधे होकर जो समाज बना रहे, ऐसे भविष्य पर कुछ भी लिखते मेरे हाथ कांपते हैं।

मेरा दिल काँप रहा है, रो रहा है उस डॉक्टर के लिए जिसने इस समाज के साथ जीना मंजूर नहीं किया।

सुनिए, डॉ. अर्चना शर्मा की घटना से इस देश के चिकित्सा जगत को गहरा सदमा पहुंचा है।

महसूस करिये, समझिये और इससे पहले देर हो, जागिये।


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