विचार / लेख

वह एक शिक्षक
10-Mar-2022 4:10 PM
वह एक शिक्षक

-ध्रुव गुप्त

(मेरे पुलिस जीवन के कुछ बेहतरीन अनुभवों में से एक जिसने मुझे सिखाया कि पुलिस के हाथों न्याय तबतक संभव नहीं जब तक उसके पास संवेदनशील ह्रदय, आमजन से सीधा संवाद और संचिकाओं तथा गवाहों के पार देखने की आंतरिक शक्ति न हो!)

शिक्षक सिर्फ वे नहीं होते जो शिक्षा और अनुशासन के माध्यम से हमें जीवन-संघर्षों के लिए तैयार करते हैं। शिक्षक वे लोग भी हैं जो जीवन-यात्रा के विभिन्न पड़ावों पर जाने-अनजाने ही हमें जीने के सबक और सलीके सिखा जाते हैं। हर शिक्षक दिवस पर मुझे अपने जीवन में मिला एक युवक बहुत याद आता है। था तो वह अनपढ़, लेकिन मेरे प्रोफेशनल जीवन का सबसे बड़ा सबक मुझे उसी से सीखने को मिला था। वे पुलिस में मेरे कैरियर के शुरुआती दिन थे। मैं मिनी चंबल के नाम से कुख्यात बिहार के एक अपराधग्रस्त जिले पश्चिमी चंपारण में पदस्थापित था। एक बरसाती रात में मैं गंडक नदी के दियारे में अपराधियों के एक बड़े गिरोह के विरुद्ध छापेमारी के बाद पुलिस के कुछ जवानों के साथ लौट रहा था। रास्ते में गंडक नदी की रेत में फँसकर एक छोटे-से गांव के पास गाड़ी बिगड़ गई जिसके बनने की कोई संभावना अगली सुबह तक नहीं थी। गाँव से कई घरों से कुछ खाट मंगाकर हम एक किसान के बड़े-से बरामदे में आराम करने लगे। बरसाती मौसम में हमारे लिए लिट्टी-चोखा का इंतजाम गांववालों ने कर दिया।

मैं बेतरह थका हुआ था। सोने की तैयारी ही कर रहा था कि एक ग्रामीण ने आकर बताया कि गांव का एक लडक़ा आपके हाथ-पैर दबाने की अनुमति मांग रहा है। मेरे हां कहते ही बीस-बाईस साल का एक युवक आकर मेरे हाथ-पैर दबाने लगा। दीये की रौशनी में उसका चेहरा मुझे साफ नहीं दिख रहा था। पूछने पर अपना नाम उसने उद्धव यादव बताया। थोड़ा आराम आने के बाद मैंने उससे पूछा-‘उद्धव, तुम यही काम करते हो?’ उसने कहा-‘नहीं, सर। मुझे आपसे कुछ कहना था।’ मेरी सहमति पाकर उसने कहा-मैं एक लोकगायक हूं और बहुत अच्छा बिरहा गाता लेता हूं। आप सुनेंगे?’ मेरे पैर दबाते हुए ही उसने कुछ देर तक मुझे बिरहा गाकर सुनाया। आवाज में बुलंदी के साथ कशिश और दर्द ऐसी कि मेरी आंखें नम हो गईं। मुझे ऐसे गुनी कलाकार से पांव बवाते हुए शर्मिंदगी महसूस हुई और मैं उठ बैठा। पूछा-‘तुमने बहुत दिनों बाद मुझे भावुक किया है। बोलो तुम्हें क्या इनाम दूं उद्धव?’

कुछ देर सोचने के बाद उद्धव ने कहा-‘बगल के गांव के एक बाबू साहेब हैं, सर। मेरे बाबूजी ने उनसे कुछ कर्ज लिया था। बदले में वे दस सालों तक उनके यहां बेगारी खटते रहे। कर्ज फिर भी खत्म नहीं हुआ। दो साल पहले बाबूजी मरे तो वे चाहते थे कि अपने पिता की जगह मैं उनके यहां मुफ्त काम करूं। मैं गांवों में घूम-घूमकर बिरहा गाता हूं जिससे थोड़ी सी आमदनी हो जाती है। मैंने बाबू साहेब को साफ इंकार कर दिया। अगले दो-तीन महीनों में थाने में मेरे खिलाफ लूट और डकैती के तीन केस दर्ज हो गए। मैं तबसे बाबू साहेब के लठैतों और थाने की पुलिस से भागा-भागा फिर रहा हूं। एक मास्टर साहेब ने आपके बारे में बताया तो मैं हिम्मत जुटाकर आपके पास चला आया। मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए। आप बस मेरा इन्साफ कर दीजिये, सर!’

सुबह थाने पर पहुंचकर मैंने उद्धव के तीनों केसों के रिकॉर्ड देखे। सरसरी तौर पर पढऩे भर से लग गया कि तीनों ही मामले बनावटी हैं। तीनों के घटना-स्थल एक दूसरे से बहुत दूर-दूर थे, लेकिन तीनों के गवाह लगभग एक। गवाह भी उसी बाबू साहेब के परिवार के लोग, दूर के रिश्तेदार और नौकर-चाकर। उद्धव का कोई आपराधिक इतिहास नहीं था और न उससे लूट का कोई सामान ही बरामद हुआ था। मैंने तत्काल तीनों केस खत्म करने के आदेश दिए। उद्धव की आंखों में खुशी के आंसू थे। कुछ देर तक वह रोता ही रहा। उसके संभलते ही मैंने पूछा-‘अब इसके बाद क्या करोगे, उद्धव?’ उसने कहा-‘इस इलाके में रहूंगा तो जिन्दा नहीं बचूंगा। मैं कमाई करने पंजाब चला जाना चाहता हूं।’ मेरी जेब में हजार रूपये थे जो मैंने उसे दे दिए। मेरी गाड़ी खड़ी देख वहां पर आसपास के गांवों के कुछ लोग भी जमा हो गए थे। उन्होंने आपस में चंदा कर उसे दो हजार रुपए और दिए।

थाने से खबर मिली कि अगले ही दिन वह पंजाब चला गया। फिर कभी दुबारा उससे भेंट नहीं हुई और न उसके बारे में कुछ सुनने को मिला। मैं उस घटना को भूल भी चुका था। करीब बीस साल बाद एक दिन उसका फोन आया तो मैं उसकी आवाज पहचान नहीं सका। अपना परिचय देते हुए उसने बताया कि उसकी आपबीती सुनकर अमृतसर के एक लेखक ने उसे मेरा नंबर दिया है। अरसे बाद मेरी आवाज सुनकर वह खुशी के मारे रो रहा था। मेरे बहुत समझाने के बाद वह शांत हुआ। उसने कहा कि दस साल तक पंजाब के खेतों में मजदूरी करने के बाद किसी हाईवे पर उसने चाय-नाश्ते का एक छोटा-सा स्टॉल खोल लिया है। स्टॉल अच्छा चल रहा है और वह एक व्यवस्थित जीवन जी रहा है। घर में बीवी है और दो प्यारी-प्यारी बेटियां भी। उसने बताया कि वह और उसका परिवार मुझे बहुत याद करता है।

उद्धव की आवाज ने मुझे भावुक कर दिया। वह मेरे सेवाकाल का पहला महत्वपूर्ण शिक्षक था। उसके साथ बीते कुछ घंटों ने मुझे सिखाया कि पुलिस के हाथों न्याय तब तक संभव नहीं जबतक उसके पास एक संवेदनशील ह्रदय, आमजन से सीधे संवाद की इच्छा और संचिकाओं तथा गवाहों के पार देखने और महसूस करने की आंतरिक शक्ति न हो ! उसके बाद मैंने किसी भी मामले की विवेचना में उस सबक को याद रखा। हर मामले में इंसाफ का दावा तो कोई भी पुलिस अथवा न्यायिक व्यवस्था नहीं कर सकती, लेकिन आज यह सोचकर मुझे संतोष ज़रूर होता है कि अपने सेवाकाल में मुझसे बहुत कम गलतियां हुईं।


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