विचार / लेख
आशुतोष भारद्वाज
मेरी अभी विनोद कुमार शुक्ल जी से लम्बी बात हुई। उन्होंने रॉयल्टी स्टेटमेंट और प्रकाशक के साथ हुए पत्र मुझे भेजे हैं। उनकी इच्छानुसार कुछ तथ्य सार्वजनिक रहा हूँ।
वाणी से उनकी तीन किताबें प्रकाशित हैं- दीवार में एक खिडक़ी रहती थी, अतिरिक्त नहीं, कविता चयन। दो किताबों के शायद ईबुक संस्करण भी हैं। मई 1996 से लेकर अगस्त 2021, यानी पच्चीस वर्षों में उन्हें वाणी से कुल 1 लाख पैंतीस हजार, अर्थात सालाना करीब पाँच हजार मिले। इसमें से एक किताब को साहित्य अकादमी सम्मान मिला है, बेहिसाब हिंदी लेखकों-पाठकों के घर यह किताब मिल जायेगी।
राजकमल से उनकी छह किताबें हैं- हरिदास की छप्पर वाली झोंपड़ी, नौकर की कमीज, सब कुछ होना बचा रहेगा, कविता से लम्बी कविता, प्रतिनिधि कवितायेँ, कभी के बाद अभी। (सातवीं हाल ही प्रकाशित हुई है।)
उनके अनुसार राजकमल ने उन्हें अप्रैल 2016 से मार्च 2020 तक, चार वर्षों में छह किताबों के करीब 67000 दिए हैं, यानी प्रतिवर्ष सत्रह हजार। पिछले कई वर्षों से रॉयल्टी स्टेटमेंट में कविता संग्रह ‘कभी के बाद अभी’ का जिक्र नहीं है।
(मुझे लगता था कि ‘नौकर की कमीज’ बहुत अधिक बिकी होगी, हर जगह दिखाई दे जाती है।)
लेकिन सबसे त्रासद यह कि वे छह वर्षों से प्रकाशक को लगातार लिख रहे हैं कि ‘मेरी किताब न छापें’, ‘मेरी अनुमति के बगैर नया संस्करण न छापें क्योंकि प्रूफ की कई गलतियाँ हैं’, ‘मेरा अनुबंध समाप्त कर दें।’ लेकिन कोई सुनवाई नहीं।
इन अति-सम्मानित बुजुर्ग लेखक की पीड़ा को समझने के लिए सितम्बर 2019 के इस खत को पढ़ें- ‘मैंने आपको स्पीड-पोस्ट तथा ईमेल भेजा था कि बिना मेरी अनुमति के नया संस्करण नहीं निकालें। इस संबंध में मैंने जब तब फोन से भी अनुरोध किया था, लेकिन आपने फिर नया संस्करण निकाल दिया। इसके पूर्व भी जितने संस्करण निकले हैं, उसकी पूर्व-सूचना मुझे कभी नहीं दी गयी। मैं इससे दुखी हूँ।’


