विचार / लेख

युद्ध विरोधी बनिए
26-Feb-2022 5:18 PM
युद्ध विरोधी बनिए

-अंजलि मिश्रा
अपने शरीर से अलग होने पर उस कटे हुए हिस्से का दर्द सदा साथ रहता है।

पाकिस्तान के अलग हो जाने का दर्द हर भारतीय  जानता है। पीड़ा तब और बढ़ जाती है जब अपने देश से अलग हुवा वो हिस्सा किसी और के बहकावे में आकर हमारे लिए खतरा बन जाए। पाकिस्तान का यहाँ भी उदाहरण दिया जा सकता है।

 यही हाल  यूक्रेन का भी है। यूक्रेन को अमेरिका ने बहकाया विश्वास दिलाया उसकी रक्षा करेगा उसे नाटो में शामिल करेगा, बदले में यूक्रेन की जो सीमा रूस के सबसे नजदीक थी  वहाँ तक अमेरिकी सेनाओं ने अपने सैनिकों की गतिविधि शुरू कर दी।
 
रूस का विघटन होने पर  उससे अलग हुए देशों का रूस के बदले अमेरिका की तरफ झुकना रूस के लिए सुखदायी तो नहीं ही था।

लेकिन अमरीका ने रूस के विघटन को एक अवसर के रूप में लिया उसने इसे दो बड़े देशों के बीच  संघर्ष का अंत  ना मानते हुए शांत रहने के बदले अपने फायदे  में इस अवसर को तबदील करने में ज्यादा रुचि ली।

आज लोग रूस जो कर रहा है उसे देख रहे लेकिन रूस के विघटन के बाद अमेरिका ने क्या क्या किया वो भूल गए।

आज यूक्रेन को युद्ध में ढकेल कर अमेरीका सिर्फ बयानबाजी में लगा है।

अलग होकर भी देश अलग नहीं होते कुछ जुड़ा रहता है। जैसे हम पाकिस्तान से जुड़े है।

पाकिस्तान के जरिए आतंकवाद का भारत में आना पाकिस्तान का चीन का साथ देना ये सब हम देख चुके हैं आज आम भारतीयों के मन में पाकिस्तान को लेकर नफरत की भावना है।

पाकिस्तान के साथ क्रिकेट मैच जीतना नाक का सवाल बन जाता है। नेताओं ने इस भावना को कैश करवाया वो हर बात में पाकिस्तान के प्रति बयानबाजी करते  ही रहते है।

हमारी इस नफरत का फायदा पाकिस्तान के सियासतदारों  और भारत के  दोनों ने  काफी उठाया है। अलग होने के इतने वर्षों बाद भी हम मन से पाकिस्तान से अलग नहीं हो पाये, हो जाते तो उसके प्रति असंवेदनशील बन जाते  लेकिन हम पाकिस्तान में क्या बुरा हुआ  इसकी ज्यादा चिंता करते है इसके इतर यूक्रेन पर जब रूस ने हमला किया तो  वहा के हजारों नागरिक नो वार की तखती टांगे सडक़ पर पुतिन के विरोध में खड़े दिखे। वो पुतिन को हीरो मानते है फिर भी उन्होंने युद्ध का विरोध किया, पुतिन का साथ नहीं दिया।

इस दुनिया ने युद्ध की विभीषिका देखी है कोई भी सभ्य देश युद्ध को आज जायज नहीं मानता हर कोई जानता है कि युद्ध में आम लोग ही परेशानी झेलते है।

हमारे देश में कई ऐसे समाचार चैनल है जो भारत और चीन के बीच विवाद होते ही मोदी चीन को धूल चटा दिए युद्ध को लेकर जरूरत से ज़्यादा उन्मादी दिखते है। फेसबुक में युद्ध विरोधी बयान  पर लोग देशद्रोही  बोल कर  पाकिस्तानी चले जाओ कि बात करते दिखने लगते है।

रूसी लोग हमसे बेहतर मिसाल रख कर दिखा दिए कि नेताओं की सोच जनता की सोच नहीं होती।

युद्ध विरोधी बनिए।


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