विचार / लेख
चेख़व (बाएँ) और गोर्की (दाएँ)
- अपूर्व गर्ग
गोर्की ने लिखा है अन्तोन चेख़व के जनाजे वाली बात मैं भूल नहीं सकता. उस दिन मास्को के स्टेशन पर भारी भीड़ इकट्ठी हुई. लोगों ने आश्चर्य से देखा चेख़व के शव को भारी मिलिट्री ठाठ के साथ निकाला जा रहा है पर ये भारी भूल थी.
उस दिन जनरल केलर का जनाजा मंचूरिया से लाया गया था, जो ठीक उसी समय पहुंचा था. चेख़व के जनाजे के लिए तो माल ढोने वाली गाड़ी लायी गयी थी और कुछ ही लोग थे.
गोर्की बताते हैं वो भड़कीले कपड़े पहने दो वकीलों के पीछे चल रहे थे जो कुत्ते की होशियारी पर लेक्चर बघार रहे थे. एक महिला किसी बुड्ढे को विश्वास दिलाना चाहती थी कि मृतक एक योग्य लेखक था और ये सुनकर वृद्ध महाशय ने अविश्वासपूर्ण खाँसना शुरू कर दिया था ...सारा दृश्य साधारण और बाज़ारू लग रहा था.
चेख़व का जनाजा 15 जुलाई 1904 को निकला था तब रूस में रूसी जार निकोलस द्वितीय का शासन था.
वहीं जब गोर्की का जनाजा 18 जून 1936 को निकला था तब समाजवादी सोवियत संघ था और करीब 800,000 लोग उनकी अंतिम यात्रा में शामिल थे. इनमें स्वयं स्टालिन और मोलोतोव भी शामिल थे.
समाजवादी व्यवस्था और पूंजीवादी व्यवस्था में बस इतना सा ही फर्क है !!
और ज़्यादा बेहतर समझना चाहते हैं तो कोरोना काल में दवा, इलाज और ऑक्सीजन के अभाव में दम तोड़ चुके हमारे देश के ही शीर्षस्थ साहित्यकारों को याद कर लीजिये और ठीक उसी पल याद करिये कैसे क्यूबा अपने डॉक्टर्स को दुनिया भर में भेज रहा था.
योगी आदित्यनाथ को समझना चाहिए केरल ऐसे ही केरल नहीं है. शैलजा टीचर जो कोरोना काल में हीरो बनी ऐसे ही नहीं बनी.
यूपी में तो साहित्य जगत के सशक्त हस्ताक्षरों को अस्पताल में बेड तक नहीं मिल रहा था ...
दरअसल, जब साहित्यकारों के प्रतिरोध पर उन्हें गैंग करार देकर दुश्मन समझा जाए तो ऐसी व्यवस्था और
रूसी जार की व्यवस्था में कोई फ़र्क नहीं रहेगा और ये लोग सम्मान नहीं सिर्फ दमन ही करेंगे.
ये भी याद रहे...
1902 में चेखव को 'सम्मानित अकदमीशियन' की उपाधि मिली; लेकिन जब 1902 में रूसी जार निकोलस द्वितीय ने गोर्की को इसी प्रकार की उपाधि देने के फैसले को रद्द कर दिया तब चेखव ने विरोधस्वरुप अपना अवार्ड भी त्याग दिया था.
ये और बात है जार कितना भी दमनकारी था पर चेख़व को अवार्ड वापसी गैंग नहीं कहा था !


