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छत्तीसगढ़ एक खोज : तिरपनवी कड़ी : प्रवीर चंद्र भंजदेव : अभिशप्त नायक या आदिवासियों के देव पुरुष
29-Jan-2022 11:44 AM
छत्तीसगढ़ एक खोज : तिरपनवी कड़ी :  प्रवीर चंद्र भंजदेव : अभिशप्त नायक या आदिवासियों के देव पुरुष

-रमेश अनुपम

 

27 मार्च सन 1966 के अंग्रेजी समाचारपत्र दंडकारण्य में एक छोटा सा समाचार यह भी प्रकाशित हुआ-
 
WAR PREPARATION
युद्ध की तैयारी

इस समाचार में कमिश्नर राजा वीरभद्र सिंह का जो बयान प्रकाशित हुआ है, वह बेहद दिलचस्प और संदेहास्पद है। कमिश्नर वीरभद्र सिंह अपने उक्त बयान में फरमाते हैं कि आदिवासी बैलगाडिय़ों में तीर धनुष का जखीरा भरकर लाए थे।गोया तीर धनुष का उत्पादन बंदूक की तरह किसी फैक्ट्री में होता हो।

क्या ऐसा संभव है कि आदिवासी तीर धनुष बैलगाडिय़ों में भरकर लाए होंगे?

क्या किसी ने आज तक बस्तर में तीर धनुष से भरी हुई कोई बैलगाड़ी देखी है?

मैं बस्तर में लंबे समय तक रहा हूं मैंने वहां कभी कोई ऐसी बैलगाड़ी नहीं देखी है और न ही ऐसी बैलगाड़ी की कभी कोई चर्चा ही सुनी है।

तब क्या कमिश्नर राजा वीरभद्र सिंह सीधे-सीधे झूठ बोलकर सच्चाई पर पर्दा डाल रहे थे?

बस्तर में बैलगाड़ी की फैंटेसी रच रहे थे? कभी-कभी ब्यूरोक्रेट ऐसी कहानी गढ़ते हैं कि कहानी भी शर्म से पानी-पानी हो जाए।

निहत्थे महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव को राजमहल के उनके ड्रॉइंग रूम में गोलियों से भूनकर पुलिस ने कोई अपनी वीरता का परिचय नहीं दिया था अपितु एक तरह से अपनी कायरता का ही परिचय दिया था।

यह भी सच है कि 25 मार्च को सारे आदिवासियों के पास तीर धनुष नहीं रहे होंगे। कुछ एक आदिवासियों के पास ही तीर धनुष रहे होंगे। राजमहल परिसर में कई दिनों से आदिवासी स्त्रियां भी मौजूद थी।

इस बात का आंकड़ा किसी के पास मौजूद नहीं है कि उस दिन कितने पुरुष आदिवासी और कितनी महिला आदिवासी पुलिस की गोलियों के शिकार हुए थे।

रमेश नैयर देश के सुप्रसिद्ध पत्रकार हैं। वे ‘स्वदेश’, ‘देशबंधु’, ‘ट्रिब्यून’ और ‘संडे ऑब्जर्वर’ के पश्चात रायपुर में लंबे समय तक ‘दैनिक भास्कर’ के संपादक रहे हैं। उनकी गिनती देश के ऐसे पत्रकार के रूप में होती है जिन्होंने हमेशा निष्पक्षता के साथ सत्य का पक्ष लिया है।

बस्तर गोलीकांड के दिनों में वे रायपुर से प्रकाशित ‘युगधर्म’ के संवाददाता थे। 26 वर्षीय युवा रमेश नैयर 26 मार्च की शाम को ही जैसे-तैसे इस घटना की रिपोर्टिंग करने जगदलपुर पहुंच चुके थे।

26 मार्च को पुलिस ने उन्हें राजमहल के भीतर जाने से रोक दिया था। उन्हें ही नहीं बल्कि अन्य किसी भी पत्रकार को उस दिन पुलिस ने राजमहल के भीतर नहीं जाने दिया।

27 मार्च को किसी तरह वे राजमहल के भीतर घुस पाने में सफल हुए थे। उन्होंने राजमहल के भीतर जगह-जगह पुलिस की गोलियों के निशान और दीवारों पर खून देखे।

राजमहल के बाहर रोते-बिलखते हुए आदिवासियों के हुजूम देखे। पुलिस की बर्बरता के सारे साक्ष्य उनकी आंखों के सामने एक खुली किताब की तरह दिखाई दे रहे थे।

उन्होंने इस वीभत्स गोलीकांड का सारा वृत्तांत ‘दिनमान’ पत्रिका को लिख भेजा था। टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप से निकलने वाली पत्रिका ‘दिनमान’ उस समय की सबसे महत्वपूर्ण एवं लोकप्रिय पत्रिका थी।

रमेश नैयर 27 मार्च को याद करते हुए बताते हैं कि जगदलपुर में चारों ओर कफ्र्यू जैसा आलम था चारों ओर केवल पुलिस ही पुलिस दिखाई दे रही थी।

रमेश नैयर महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव को याद करते हुए बताते हैं कि वे एक बेहद गंभीर, संवेदनशील और सुलझे हुए इंसान थे। बस्तर के आदिवासियों से वे बहुत प्रेम करते थे, उन्हें वे अपने बच्चों की तरह चाहते थे।

रमेश नैयर महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव से कई बार रायपुर और जगदलपुर में मिल चुके थे। उनसे इंटरव्यू भी कर चुके थे। महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव ने उन्हें एकबार राजमहल में भोजन पर भी आमंत्रित किया था।

महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव को याद करते हुए वे कहते हैं कि ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में उनकी पढ़ाई-लिखाई हुई थी। इसलिए उनके सोचने-समझने का तौर-तरीका अलग था। वे डेमोक्रेसी का मतलब अच्छी तरह जानते थे। इसलिए बस्तर में जो कुछ भी आदिवासियों के साथ हो रहा था उससे वे दुखी थे। वे जानते थे कि कांग्रेस की नीतियां भी आदिवासियों के पक्ष में नहीं है।

रमेश नैयर के अनुसार महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव दंतेश्वरी देवी के अनन्य भक्त थे। दंतेश्वरी माता के अनन्य भक्त और प्रमुख पुजारी होने का कारण दशहरा में वे देवी के साथ रथारूढ़ हुआ करते थे। आदिवासी भी उन्हें अपना सच्चा हितैषी और भगवान मानते थे।
(बाकी अगले हफ्ते)


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