विचार / लेख

गांधी और उनके समय की भारतीय आध्यात्मिक दुनिया में उनका स्थान
28-Dec-2021 1:24 PM
गांधी और उनके समय की भारतीय आध्यात्मिक दुनिया में उनका स्थान

-आलोक बाजपेयी

करीब 15 साल पहले एक बार प्रोफेसर बिपिन चन्द्र के साथ विवेकानंद पर हुई अनौपचारिक बातचीत में उन्होंने रामकृष्ण परमहंस के बारे में बहुत प्रशंसात्मक बातें की और कहा कि वो कमाल शख्स थे। उन्हें जरूर पढ़ो। बिपिन खुद नास्तिक थे और एक आध्यात्मिक संत को पढऩे की सलाह दे रहे थे। मैंने रामकृष्ण परमहंस को लगभग पूरा पढ़ा। उनको पढऩा मेरे जीवन का कुछ सबसे अच्छा पढऩा साबित हुआ। अगर किसी को भारत की हिन्दू आध्यत्मिक परंपरा की गहराई और ऊंचाइयों को महसूस करना है तो रामकृष्ण परमहंस से बड़ा कोई शिक्षक नहीं है। उनमें सरलता से और एक ईश्वरीय आहट के साथ अपनी बात को निडरता से कहने की जो प्राकृतिक कला है वह अद्भुत है। मैं उन्हें एक महान मनोवैज्ञानिक भी मानता हूं। उनमें एक बूंद भी साम्प्रदायिक पूर्वाग्रह नहीं है और न ही कोई ‘सर्वश्रेष्ठता बोध’ ही है। उनका हास्य बोध कमाल का है और ढोंग, पाखंड को पलक झपकते पकड़ लेने की क्षमता है।

रामकृष्ण को पढऩे के बाद मेरे मन मे एक ऐतिहासिक जिज्ञासा पैदा हुई कि हिन्दू धर्म बल्कि तत्कालीन भारत की समग्र आध्यात्मिक परंपरा आखिर है क्या और क्या इसमे कोई धार्मिक पूर्वाग्रह व अपने धर्म को ही श्रेष्ठ समझने का किंचित भाव भी है या नही? इस क्रम में मैं उस समय से लगाकर लगभग 1960 तक तक के लगभग सभी आध्यात्मिक संतों के बारे में जो भी उपलब्ध हुआ, पढ़ता गया। आपको एक संत ऐसा नही मिलेगा जो ये कहता हो कि हिन्दू धर्म ही दुनिया का सर्वश्रेष्ठ धर्म है। सब यही कहते हैं कि सब धर्म अपनी जगह सही और सच्चे हैं। हर धर्म और संप्रदाय  में अलग अलग रास्ते बताए गए हैं लेकिन सबकी मंजिल और मूल शिक्षाएं  एक ही हैं।

एक बात जो मैंने नोट की कि आध्यात्मिक परंपरा में गुरु शिष्य परंपरा चलती है। यानि गुरु अपने शिष्य को बहुत तरीके से अपने शिष्य की बौद्धिक व आध्यात्मिक क्षमता व रुझान अनुसार अध्यात्म में प्रशिक्षित करते थे। गुरु स्वयं हर विधा में पारंगत नहीं होता। तो गुरु अपने शिष्य को अलग अलग आध्यात्मिक क्षेत्र के विशेषज्ञों के पास रहने और उनसे सीखने के लिए भेजते थे।
अब आते हैं पोस्ट के शीर्षक पर।
उस समय आध्यात्मिक गुरु अपने शिष्य को महात्मा गांधी के पास भी भेजते थे कि वह कर्म क्षेत्र के सबसे बड़े महात्मा हैं, उनके पास जाओ और उन्हें देखो-समझो। कहने का मतलब यह है कि महात्मा गांधी के समकालीन आध्यात्मिक संत उन्हें बहुत ऊंचा सम्मान देते थे और उनमें आध्यात्मिक शक्ति देखते थे।

ऐसे ही एक संत अपने गुरु के निर्देशानुसार गांधी जी के आश्रम में गए और करीब सात दिन वहां रहे। उन्होंने एक बड़ा दिलचस्प ऑब्जरवेशन गांधी जी पर दिया है। उन्होंने लिखा है कि ‘मैंने गांधीजी को देखकर यह महसूस किया कि यह व्यक्ति तो साक्षात आत्मा है, उनको देखकर शरीर का आभास नहीं होता, बस आत्मा का पुंज ही दिखता है, शरीर तो जैसे बस उस आत्मा के निर्देश से पीछे पीछे चलता भर है।’
बिपिन ने गांधीजी को देखा था। उन्होंने मुझसे कहा था कि गांधीजी के चेहरे के चारों ओर एक आभा सी थी। जैसे कोई रोशनी उनके चेहरे से फूटती थी।

 


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