विचार / लेख
-प्रकाश दुबे
पिछले सहस्राब्द में जनता ने अपना राजा ऐसा चुना जिसकी हाजिरजवाबी, मिलनसारिता और पारदर्शिता से प्रजा अधिक प्रभावित थी, बजाय राजदंड और राज्यसत्ता के। इस लोकप्रिय सत्ताधीश के माथे पर कलंक के घाव का ऐसा निशान बना, जिसके लिए वह स्वयं कतई जिम्मेदार नहीं था। उस कालखंड के अंतिम दिनों में पुष्पक विमान का अपहरण हो गया। वह भी ऐसे पड़ोसी राष्ट्र से, जिसे सत्ता के वैचारिक पुरोहित अपनी मातृशक्ति के कारण ननिहाल का मान देते थे। अपहरणकर्ता खंडित भारत को अधिक खंडित करने में जुटे बंदी राक्षस को मुक्त कराने की मांग कर रहे थे। इस राक्षस ने समूचे आर्यावर्त में आतंक मचा रखा था। वह निरपराधों को सताता। हत्या करता। सत्ता संभाल रहा जननेता अपहर्ताओं के समक्ष झुकने के लिए तैयार नहीं था। लेकिन माध्यम का एक नुमाइंदा चीख-चीखकर हर पल ढिंढोरा पीटकर सैकड़ों निरपराधों के प्राण बचाने की दुहाई दे रहा था। सत्ताधीश का संकल्प और साहस की मर्यादा टूटी। राजा के वनवास का कारण यह कलंक स्वर्गवास के बावजूद आज तक माथे से पोंछा नहीं जा सका।
राक्षस का नाम मसूद अजहर है। कंधार में तालिबान के दखल के बाद वर्ष 1999 के आखिरी दिन रिहा होने के बाद पाकिस्तान में जन्मभूमि के शहर बहावलपुर में ऐश कर रहा है। भारत के विदेश मंत्री जसवंत सिंह और नागरिक उड्डयन मंत्री शरद यादव को बेबसी में तालिबान की शर्तों के आगे कंधार में झुकना पड़ा। कूटनय और इतिहासकार विश्लेषण करें कि करगिल में घुसपैठ का मुंहतोड़ जवाब देने वाले देश को पाकिस्तान में किसकी मदद से भेजा गया। अफगानिस्तान में न तो रूस की लाल सेना के दबाव वाली सरकार चली और न अमेरिका की तिजारत, चंदा, रिश्वत और गोली काम आई। अमेरिका ने रूस के विरुद्ध तालिबान को धन, शस्त्रबल और रणनीतिक सहायता दी। अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद तालिबानी काबुल पर परचम फहरा चुके हैं। मौसम और सत्ता के साथ विशेषज्ञ बदलते हैं। कुछ सदाबहार अपवाद हर मौसम और सत्ता के सलाहकार बने रहते हैं। कंधार विमान अपहरण के दौरान ढिंढोरा पीटकर भारतवासी और सरकार का मनोबल गिराने वाले माध्यम के स्वामी का ससम्मान कानून बनाने वाली संसद में प्रवेश हो चुका हैं। उनके चाकरों तक को विशेष सुरक्षा और सम्मान मुहैया कराया जाता है। ओलम्पिक में भारत को एकमात्र स्वर्ण पदक मिलते देखने वाले देश के युवा खेल मंत्री के पास मौजूद दो टीवी चैनल नुमाइंदों के चेहरे याद करिए। इसी धारा में डुबकी लगाने वाले अफगानिस्तान विशेषज्ञ ने तालिबान से बात करने की मुफ्त सलाह दी है। यह मनोहारी विरोधाभास परोसने वाले विशेषज्ञ किसी वक्त डॉ. राम मनोहर लोहिया के भारत-पाकिस्तान एका महासंघ के मुरीद थे। इन दिनों अखंड आर्यावर्त का शंख फूंक रहे हैं। मुंबई बम विस्फोट के सरगना धुर आतंकवादी हाफिज इब्राहिम से उन्होंने पाकिस्तान जाकर मुलाकात की। 20 जुलाई 2014 को भेंट का पता लगने पर चर्चा थी कि पत्रकार महोदय नरेन्द्र मोदी सरकार के दूत बनकर गए थे। मोदी सरकार की पहली विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने संसद में इस अफवाह का खंडन किया। सुषमा ने तल्ख स्वर में कहा-हम इन पचड़ों में नहीं पड़ते। सुरक्षा परिषद के निर्णय के अनुसार अजहर और इब्राहिम को संयुक्त राष्ट्रसंघ ने वर्ष 2019 में अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित किया। अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों पर नजर रखने वालों को पता है कि विदेश मंत्री जयशंकर कहां कहां और कब कब तालिबान के प्रतिनिधियों से सीधे मिले। अकेले ही नहीं, मुलाकात के समय कई मर्तबा तीसरा पक्ष उपस्थित था। भारत घुटना टेकू वार्ता से असहमत है। पत्रकारीय परामर्श देते समय जयशंकर पहल का तथ्य उजागर नहीं किया गया। सलाह से नया भ्रम फैलेगा-देखो, हमारी आपकी सोच समान है। भोली जनता वाहवाही करेगी-ऐसा विश्लेषक भविष्यवक्ता संभवति युगे युगे।
सिर्फ इसी बात का डर नहीं है। डर इस बात का है कि भारत जब इतिहास के पुनर्लेखन में व्यस्त है, उस समय पड़ोस की ताकतें हमारी आंख के सामने भूगोल बदलने में जुटी हैं। इंदिरा गांधी ने दो बार भूगोल बदला। आपात्काल के दौरान सिक्किम का भारत में विलय किया। बांग्लादेश की मुक्ति में सहयोग किया। दो प्रधानमंत्रियों की चूक का नुकसान अब तक भुगत रहे हैं। चेतावनी के बावजूद जवाहर लाल नेहरू की अनदेखी के कारण चीन ने तिब्बत को गड़प किया। भारत के भूभाग पर चीन ने कब्जा किया। लाल बहादुर शास्त्री को ताशकंद में विजित क्षेत्र छोडऩे पर हामी भरनी पड़ी। कश्मीर मुद्दे पर समाधान की शर्त नहीं जुड़वा सके। तनाव में उनका देहावसान हुआ। अमेरिका को विश्व ठेकेदार समझकर भारत चुनाव प्रचारक तक बना। अब उसी से कहना पड़ता है कि अभी न जाओ छोड़ कर। कोई संप्रभु देश इस तरह की बात कर सकता है? हमें याद रखना है कि कश्मीर मुद्दे पर हम किसी मध्यस्थ को सहन नहीं करेंगे। भय अकारण नहीं है। बड़ी उम्मीदों के साथ ब्रिक्स का गठन हुआ था। रूस और चीन दोनों इस वक्त तालिबान के साथ खड़े हैं। परखा हुआ मित्र रूस बिफर कर भारत से दूर हो चुका है। ब्रिक्स परवान नहीं चढ़ा। ब्राजील और दक्षिण आफ्रीका में चीन का निवेश भारत से अधिक है। सुरक्षा परिषद में किसके बूते प्रवेश करेंगे?
गैरराजनीतिक कारण भी डराते हैं। दो दिन पहले इस अखबार ने शीर्षक दिया-उफ!! गानिस्तान। अनेक ने सराहा। कुछ पाठक कुपित हुए। खिजाया। रवीन्द्रनाथ ठाकुर का काबुलीवाला भुलाने के कारण ऐसा हुआ। वही काबुलीवाला जो भारतीय बच्ची में अपनी बेटी की छवि देखकर गाता था-अय मेरे प्यारे वतन, अय मेरे बिछड़े चमन, तुझपे दिल कुर्बान। निडर बनने के लिए निश्चय और निर्णय चाहिए। तालिबान से नहीं, आम अफगानी से मेरे प्यारे वाला नाता भी।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)


