विचार / लेख

पहले मन का विभाजन होता है, फिर भूगोल का। तो पहले मन को जोड़िये
15-Aug-2021 9:26 AM
पहले मन का विभाजन होता है, फिर भूगोल का। तो पहले मन को जोड़िये

-पुष्य मित्र

सबसे पहले मन बंटता है, फिर भूगोल बंटता है। ऐसा सिर्फ मुल्कों के मामले में ही नहीं परिवारों के मामले में भी होता है। और अक्सर ऐसा होता है कि भूगोल बंट जाने पर भी मन का विभाजन कम नहीं होता, वह जस का तस बना रहता है और कई दफा बढ़ता भी रहता है। ऐसा ही 1947 में भी हुआ और आज भी हो रहा है।

हिंदुस्तान का मन क्यों बंटा? क्योंकि कुछ लोगों को लगता था कि भारत एक राष्ट्र नहीं है। यह दो राष्ट्र हैं। हिन्दू और मुसलमान। दोनों दो अलग-अलग राष्ट्र हैं। ऐसा सोचने वाले कौन थे, यह जानने के लिये इतिहास के पन्नों को पलटिए। एक तरह मुस्लिम लीग था तो दूसरी तरह कथित हिन्दू राष्ट्रवादी। जो एक दूसरे से लड़ते-झगड़ते रहने के बावजूद इस बात को लेकर सहमत थे कि हिन्दू और मुसलमान कभी एक देश में, एक झंडे के तले साथ नहीं रह सकते। उनके मन के इसी विभाजन की परिणति 1947 में देश के भौगोलिक विभाजन के रूप में हुई। 

हमें यह भी जानना चाहिये कि उस वक़्त कौन था जो इस द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत से असहमत था। तो वह कांग्रेस पार्टी थी। उसमें शामिल राष्ट्रवादी हिन्दू और मुसलमान थे। दोनों मानते थे कि हम हमेशा से एकसाथ रहे हैं और आजादी के बाद भी एक दूसरे के साथ बराबरी का व्यवहार करते हुए साथ रह सकते हैं। इसलिये कांग्रेस आखिर तक विभाजन के खिलाफ रहा। हां, यह जरूर हुआ कि आखिर-आखिर में उसके कई बड़े नेताओं ने घुटने टेक दिये और खून खराबे के भय से विभाजन को बुझे मन से स्वीकार कर लिया मगर एक इंसान आखिर तक यह सब रोकने के लिये लड़ता रहा। 

वह नोआखली से लेकर बिहार तक, कोलकाता से दिल्ली तक भागता रहा।लोगों के मन को जोड़ता रहा। क्योंकि उसे मालूम था कि मन को जोड़ना जरूरी है। जब मन जुड़ जायेगा तो भूगोल का विभाजन खुद रुक जायेगा। न भी रुके तो बेमतलब हो जायेगा। वह गांधी था।

कोरोना के दोनों लहरों के बीच में लगातार इन्हीं किस्सों को पढ़ता रहा हूं, इसलिये यह सब समझ पा रहा हूं। नोआखली में नंगे पांव घूमना, बिहार में दंगा पीड़ितों को फिर से उनके गांव में बसाने के लिये चन्दा जुटाना। कोलकाता में मार काट को रोक देना। दिल्ली की भंगी बस्ती में बैठकर जहरीले मन को जहर मुक्त करने की कोशिश करना और यह तय कर लेना कि मेरी शहादत से ही मन का विभाजन रुकेगा। यह सब पढ़ते हुए झुरझुरी होती है।

हम आज भी उतने ही बंटे हुए हैं जितने पिछ्ली सदी के तीसरे-चौथे दशक में थे। और अब तो यह बंटवारा लोगों के लिये सत्ता पाने और बनाये रखने का उपकरण हो गया है। मगर उस इंसान के पास जिसे हम राष्ट्रपिता कहते हैं, एक फार्मूला जरूर था बंटे हुए मन को जोड़ने का। 

विभाजन का दंश याद करने की चीज नहीं है। वह सबक लेने की चीज है कि कैसे राजनेताओं की महत्वाकांक्षाओं की कीमत लाखों लोग चुकाते हैं। वह यह सीखने का अवसर देता है कि लड़ने से नहीं प्रेम करने से दुनिया बेहतर होती है। जिन्ना ने अपने समर्थकों को लड़कर पाकिस्तान बनाना सिखाया, गांधी ने प्रेम से टूटे दिलों को जोड़ने का प्रयोग किया। अब यह आपके हाथ में है कि आप जिन्ना के प्रयोग को सीखते हैं या गांधी के। 

मैने तो कल तय किया है कि मैं गांधी के उस आखिरी प्रयोग की कहानी लिखूंगा जिसने उन्होने प्रेम और शहादत के औजारों से टूटे हुए दिलों को जोड़ने की कोशिश की थी। मन का विभाजन खत्म करने की कोशिश की थी।

आजादी के अमृत वर्ष में अपने लिये यही लक्ष्य तय किया है। देखिये, मुमकिन हो भी पाता है या नहीं।

 


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