विचार / लेख

राहतभाई : रोज का ही साथ
14-Aug-2021 12:27 PM
राहतभाई : रोज का ही साथ

-चिन्मय मिश्र

राहत भाई के एक काव्य संग्रह का शीर्षक ह ‘मेरे बाद’ परंतु मुझे महसूस होता है कि उनके चले जाने के बाद वह पहले से भी ज्यादा हमारे साथ हो गए हैं। आदमी जब आपके नजदीक होता है, आसपास होता है ए तो वह होता तो है, महसूस नहीं होता। न दिख पाने के बाद वह महसूस होने लगता है, वह आपका ही नहीं, आपकी परछाई का भी हिस्सा बन जाता है, जो हमेशा अपनी मौजूदगी का एहसास कराती रहती है। राहत भाई से पहली मुलाकात मिल्की वे टॉकीज के अहाते की साइनबोर्ड पेंटिंग की दुकान में हुई थी। तब वे इस काम को छोड़ चुके थे। वहां उनकी बैठक मोहन पेंटर की दुकान पर थी। हम वहां मालवा उत्सव के होर्डिंग बनवाने जाते थे। उनकी ठहाकेदार मौजूदगी और होर्डिंग बनाने में उनका रचनात्मक सहयोग बताता था कि चित्रकला की उनकी समझ कितनी रंगभरी है। उनसे आखिरी मुलाकात अक्टूबर 2017 में छोटे भाई आदिल के अंतिम संस्कार के दौरान छोटी खजरानी कब्रिस्तान में हुई थी। तब वे नहीं उनके आंसू बोल रहे थे। उस दिन उनके ठंडे हाथों का बहुत ठंडा एहसास आज फिर महसूस हो रहा है। राहत भाई भी उसी कब्रिस्तान में सुपुर्द ए खाक हुए। दोनों भाई के ठहाकों से कब्रिस्तान की गहराई शायद अभी भी गूंजती रहती हो।

 

हमने सीखी नहीं है किस्मत से,
ऐसी उर्दू जो फारसी भी लगे।

राहत भाई की शायरी की सबसे बड़ी खासियत शायद यही थी कि वह हमेशा सम्प्रेषणी यही होती थी। इसका सबसे बड़ा फायदा यह था कि आप उनकी शायरी से असहमत भी हो सकते थे। सीधी बात को सीधे तरीके से रखने के वे कायल थे। शेर कहने का उनका अनूठा अंदाज आपको कहीं और भटकने नहीं देता था। साथ ही बीच-बीच में उनकी आती. जाती टिप्पणियां आपको कुछ क्षण के लिए शायरी की डूब से बाहर निकाल लेती थीं। वह आपको डूबने नहीं देती थी। शायद वे चाहते थे कि हम उनकी शायरी में डूबे नहीं तैरें। कुछ उद्यम करें। पानी को पहचाने, धारा के विपरीत तैरने की कोशिश यानी उन्हें समझने की, उनकी शायरी को समझने कोशिश करें। जर्मनी के प्रसिद्ध नाट्यकार बर्तोल्तब्रेख्त कहते हैं, कि उन्हें अच्छा नहीं, समझदार अभिनेता चाहिए। राहत साहब को भी समझदार श्रोता और दर्शक चाहिए होते थे, इसीलिए वे उन्हें उस तन्द्रा जिसकी वजह वे खुद ही थे ऐसे बाहर निकालना चाहते थे। वे हमें अपने से दूर करके अपनी शायरी से जोडऩा चाहते थे, समझदार बनाना चाहते थे।

एक और बात जो उन्हें बेहद महत्वपूर्ण बनाती है, वह है,
‘जो तौर है दुनिया का उसी तौर से बोलो,
बहरों का इलाका है, जरा जोर से बोलो।’

उनका सुनाने का अंदाज कमोबेश यही तो जतलाता चाहता था। राहत भाई की शब्द संरचना अपने आप में अनूठी थी वे तमाम प्रचलित शब्दों को नए सिरे से डालने में माहिर थे। इस शेर को ही लीजिए,
‘अपने हाकिम की फकीरी पे तरस आता हैए
जो गरीबों से पसीने की कमाई मांगे।’

या फिर इस शेर को देखें
‘उसकी याद आई है सांसों जरा आहिस्ता चलो,
धडक़नों से भी इबादत में खलल पड़ता है।’

राहत भाई ने अपनी धडक़ने रोक लीं, पर वह हमसे इबादत जारी रखने की उम्मीद रख गए हैं। एक रचनात्मक व्यक्तित्व की अमरता का मानदंड तय कर पाना बेहद कठिन कार्य है। परंतु उनके लेखन की सहजता कई बार महानकथाकार प्रेमचंद की याद दिलाती है। कितना मुश्किल होता है सहज होना, सरल लिखना और ऐसा लगातार लिखते रहना। ऐसा शायद तभी संभव है जब आप जान लें कि,
‘दोस्ती जब किसी से भी की जाए,
दुश्मनों की भी राय ली जाए।’

वे किसी को अपना बनाते-बनाते अपने विलोम को नजरअंदाज नहीं करते। इन पंक्तियों को देखें-
श्रोजपत्थर की हिमायत में गज़़ल लिखते हैं,
रोज शीशे से कोई काम निकल आता है।’

अपने आपको किसी ध्वंस से रोक लेने का इससे बेहतर तरीका और क्या हो सकता है। उनका सिद्ध होना इस बात का सबूत है कि वे तीन जीवंत पीढिय़ों के पसंदीदा शायर हैं। वे बहुत शिद्दत से कहते हैं,
‘यह हादसा तो किसी दिन गुजरने वाला था,
मैं बच भी जाता तो एक रोज मरने वाला था।
मगर फि राक साहब कहते हैं,

‘यह माना जिंदगी चार दिन की, बहुत होते हैं यारों चार दिन भी। राहत भाई की सांसों से हमारा साथ भले ही चार दिन का रहा हो लेकिन उनकी रूह यानी शायरी से तो अनंत तक साथ बना रहेगा।


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