विचार / लेख
-द्वारिका प्रसाद अग्रवाल
बिलासपुर के ज्येष्ठ नागरिक संघ के एक कार्यक्रम में मुझे वरिष्ठजनों के (शेष) जीवन को सार्थक दिशा देने हेतु व्याख्यान के लिए बुलाया गया था। उन्हें मैंने कुछ ‘टिप्स’ दिए लेकिन आप तो जानते हैं कि सूखे पौधे पर पानी देने से कोई खास लाभ नहीं होता बल्कि पानी व्यर्थ चला जाता है किन्तु कुछ अपवाद भी होते हैं।
अगले दिन एक सज्जन जिनकी उम्र अस्सी से अधिक रही होगी, लडख़ड़ाकर चलते हुए मेरी होटल में मुझसे मिलने पधारे। कार्यक्रम की बातों से प्रभावित होकर वे अपनी पारिवारिक समस्या पर मुझसे सलाह लेने आए। वार्तालाप इस तरह था, पढि़ए-
‘मुझे जानते हो?’ उन्होंने मुस्कुराते हुए बात शुरू की।
‘जी, मैं आपको पहचानता हूँ।’ मैंने विनयपूर्वक कहा।
‘कल आपने बहुत अच्छा बोला इसलिए मुझे ऐसा लगा कि मैं अपनी एक व्यक्तिगत समस्या पर आपकी राय लूँ।’
‘आप मुझसे इतने सीनियर हैं, मैं आपको भला क्या राय दे सकता हूँ!’
‘ऐसा मत कहिये।’
‘चलिए, बताइए।’
‘मेरी पत्नी को स्वर्गवासी हुए बहुत समय बीत गया, मेरे साथ बेटा-बहू रहते हैं। बेटा वकालत करता है और बहू तीस किलोमीटर दूर एक सरकारी स्कूल में ‘टीचर’ है।’
‘जी।’
‘बहू रोज सुबह साढ़े नौ बजे हमारे लिए खाना बनाकर नौकरी पर निकल जाती है, बेटा ग्यारह बजे कचहरी चला जाता है। दोपहर एक बजे जब मुझे भूख लगती है तो मैं अपने हाथ से खाना परोसकर खाता हूँ पर ठंडा हो जाने के कारण मुझसे खाया नहीं जाता।’
‘तो, गरम कर लिया करें।’
‘दाल-सब्जी हो जाती है पर रोटी और चावल दोबारा गरम करने में भाता नहीं।’
‘जी, आप ठीक कह रहे हैं,’
‘मैं बहू को समझाता हूँ कि नौकरी छोड़ दे, मेरी पेंशन और बेटे की वकालत से घर चल जाता है परन्तु वह मानती नहीं। बेटा भी अपनी घरवाली की तरफदारी करता है। मैं बहुत दुखी हूँ। असल में मैं शुरू से ही गुस्सैल रहा हूँ, कोई कहना नहीं मानता तो मुझे आग सी लग जाती है।’
‘मेरी राय है कि सबसे पहले आप यह बात समझें कि आपकी पत्नी की तरह कोई दूसरा आपकी देखभाल और सेवा नहीं कर सकता।‘
‘सही है।’
‘अब मैं आपसे एक प्रश्न करता हूँ, घर में आप देवी-देवताओं की पूजा करते हैं या नहीं ?’
‘हाँ, प्रतिदिन करता हूँ।’
‘लक्ष्मीजी और दुर्गाजी की ?
‘हाँ,’
‘तो उनके चित्रों के समीप अपनी बहू का भी चित्र रख लीजिए।’
‘क्यों ?’
‘क्योंकि वे आपके घर में विराजमान साक्षात देवी अन्नपूर्णा हैं। सुबह-सुबह नौकरी पर निकलने के पहले आपके लिए भोजन तैयार करके जाती हैं, सोचिए, वे आपकी कितनी फि़क्र करती हैं!’
‘अरे, इस बात में मेरा कभी ध्यान नहीं गया लेकिन अब मेरी समझ में आ रहा है; लेकिन मैं क्या करूँ, मुझे गुस्सा बहुत आता है।’
‘अब गुस्सा करोगे तो किस पर, अंकल जी ? आपका गुस्सा सहने वाली आपकी पत्नी तो आपको छोडक़र जा चुकी!’ मैंने उनसे कहा। वे जब मुझसे मिलने आए थे तो लडख़ड़ाते हुए आए थे लेकिन जब वापस जा रहे थे तो उनके कदम सधे हुए थे।
(आत्मकथा का एक अंश है यह)


