विचार / लेख
अभी कुछ दिनों पहले बस्तर संभाग के एक पुलिस कप्तान ने अधिकृत तौर पर कहा और सरकार को सूचित किया कि इस आदिवासी क्षेत्र में ईसाइयत के पक्ष में तेजी से धर्मांतरण मिशनरियों द्वारा किया जा रहा है। स्वाभाविक ही उसकी पक्ष विपक्ष में काफी प्रतिक्रिया हुई। कुछ अरसा पहले मुझे एक शुभचिंतक पाठक ने भी टेलीफोन पर विस्तार से बस्तर में किए जा रहे धर्मांतरण को लेकर कई बातें बताई थीं। वे भी एक सरकारी कर्मचारी हैं। भारत में अंगरेजी राज आने का यह भी एक असर या अभिशाप हुआ है कि ईसाइयत का धर्मपरिवर्तन के सहारे काफी फैलाव हुआ। हालांकि धर्मातरित ईसाइयों की संख्या अब भी मुख्य अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय के मुकाबले बहुत कम है। अंगरेजी हुकूमत ईसाइयत के लिए स्वर्ण युग कहा जाएगा। उसके पहले मुगलिया सल्तनत के रहते अल्पसंख्यक होते हुए भी मुसलमान भारतीय संस्कृति में इस तरह रच बस गए हैं कि उनके उससे अलग होने की न तो कल्पना है और न ही संभावना। विवेकानन्द ने धर्मांतरण के खिलाफ जेहाद बोला ही था। उन्हें अमेरिका में जिस तरह बौद्धिकों और धर्माचार्यों द्वारा जलील भी किया गया। तो उनका झल्लाकर बहुत कुछ कह देना स्वाभाविक था। वैसे रामकृष्ण मिशन बनाने का ख्याल उनके अनुसार उन्हें ईसा मसीह के जन्मदिन ही इलहाम की तरह आया था। इसके बरक्स उन्होंने अपने दोस्त मोहम्मद सरफराज हुसैन को पत्र लिखकर यहां तक कहा कि जिस दिन इस्लामी देह में वेदांती मन होगा। वह धार्मिकता का उदय कहलाएगा। यह बात उन्होंने भारत के संदर्भ में कही थी।
आदिवासियों को दुनियावी कारणों से भले ही ईसाइयत में जबरिया या लालच के आधार पर धर्मांतरित कर लिया जाता रहा हो लेकिन उसे आदिवासी होने की मानसिकता का ईसाइयत में अंतरण नहीं कहा जा सकता। गोविन्द गारे कहते हैं चाहे ईसाई हों या हिन्दू-दोनों ही आदिवासियों के उन्नयन और सुधार के नाम पर उनके अस्तित्व के मूल ढांचे पर आक्रमण करते हैं। उन्हें ऐसी अबूझ स्थिति में धार्मिक कहते हिन्दू या ईसाई बनाते हैं। तब वह आदिवासी की आस्था पर हमला होने से किसी तरह सांस्कृतिक परिवर्तन नहीं कर सकता। ग्रेस कुजूर अपने इंटरव्यू में कहती हैं कि शहरी सभ्यता से दिन प्रतिदिन व्यापक और सघन संपर्क होने के कारण आदिवासियों की बोली, रहन-सहन, भाषा और पहनावे में आधुनिकता के नाम पर हो रहा बदलाव स्वाभाविक है। उस पर रोक लगाने की जरूरत नहीं है। इन सब ऊपरी तत्वों की आड़ में आधुनिक सभ्यता का हमला आदिवासी जीवन के कई प्रतिमानों पर पड़ तो रहा है। इसलिए आदिवासी अपनी मूल अस्मिता सुरक्षित रख पाने में असमर्थ महसूस कर रहे हैं। बदलाव प्रकृति का नियम होता है लेकिन अपनी जड़ों से उखड़ जाना नहीं।
भारतीय आदिवासी जनमंच के अध्यक्ष विवेक मणि लकड़ा के अनुसार आदिवासियों की सरना संस्कृति गायब होती जा रही है। उनका आरोप है कि आदिवासी समाज बिखरा दिया गया है। इसका लाभ उठाते बड़े पैमाने पर आदिवासियों को ईसाइयत में शामिल किया जा रहा है। आदिवासी समाज कच्चे माल की तरह उपयोग की वस्तु समझा जा रहा है। ब्रिटिश हुकूमत के दिनों में आदिवासियों के सांस्कृतिक जीवन में हस्तक्षेप की प्रक्रिया शुरू हुई थी। जनजातियों की गरीबी के कारण ईसाई मिशनरियों ने उनके बीच धर्मांतरण का कुचक्र चलाया। बड़े पैमाने पर मिशनरियों को सफलता भी मिलती रही। नतीजतन ईसाइयत में तब्दील होती जनजातियों की सांस्कृतिक और सामाजिक आदतों की खाई मूल जनजातियों से बढ़ती गई।
लकड़ा का आरोप है कि ईसाई मिशनरी उग्र, आक्रामक, धर्म प्रचार करते अनापशनाप धन खर्च करते हैं। ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्यप्रदेश, गुजरात और नागालैंड जैसे कई राज्यों में ईसाई मिशनरियों की गैरजरूरी गतिविधियों के कारण आदिवासियों के आपसी सौहाद्र को खतरा पैदा हो गया है। पूर्वोत्तर प्रदेशों में आदिवासियों की बहुतायत ही है। धर्मांतरण को लेकर वहां कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट मतावलंबियों के बीच भी आपस में भारी हिंसा होती रहती है।
धर्म प्रचार और धर्म परिवर्तन करने के बीच छोटा सा स्पेस है। धर्मांतरण कराने वाले ईसाई मिशनरी जानबूझकर उसे नहीं देखते। उनका मकसद धर्म प्रचार करने की आड़ में आदिवासियों का ईसाइयत में शामिल कर लेना है। इसलिए कई राज्यों ने इस प्रक्रिया को लेकर हस्तक्षेप शुरू किया है। आदिवासी इलाकों में ब्रिटिश हुकूमत के जमाने में ईसाई मिशनरियों ने शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य कई तरह के आवश्यक जीवनयापन के साधनों पर बहुत धन खर्च किया गया। उनकी सेवा भी की। इस वजह से बेहतर जीवन जीने की उम्मीद लिए गरीब आदिवासी ईसाई धर्म की ओर अपने आप आगे होते रहे। उन्हें धीरे-धीरे महसूस होता रहा कि धर्म परिवर्तित करने से उनका जीवन स्तर सुधरा है। उनकी चिंताएं कम हुई हैं। अपने आप अगली पीढिय़ों में ईसाइयत के प्रति आकर्षण भी पैदा होने लगा। वह अस्वाभाविक मानवीय प्रक्रिया नहीं कही जा सकती।
भारत के आदिवासी समुदाय के एकमात्र कार्डिनल आर्चबिशप तिल्सेफर टोप्पो मानते रहे हैं कि जनजातियों के बीच कैथोलिक चर्च अभी शिशु अवस्था में ही है। संकेत है कि चर्च को जनजातियों के बीच आगे बढऩे की संभावनाएं दिखाई दे रही है। भारत सरकार या प्रदेशों की सरकारों ने आदिवासियों के जीवन इंडेक्स के लिए बुनियादी सुविधाएं मुहैया नहीं कराई हैं। आजादी के सत्तर वर्ष बाद भी आदिवासी इलाकों में बदहाली है, कर्ज है, खूब शराबखोरी है, जिस्मखोरी का आलम है। पुलिस, राजस्व, जंगल और उद्योग विभाग सहित सरकारी विभागों के कर्मचारी बादशाहों की तरह आदिवासियों को गरीब कहते सलूक करते हैं। उनकी संपत्ति और अस्मिता तक की लूट हो रही है। आदिवासी ज्ञान पर डाका डाला जा रहा है। नक्सलवाद खत्म करने के नाम पर सुरक्षा सैनिक बड़ी संख्या में तैनात किए जा रहे हैं। वे भी शोषकों के रूप में भी नया चेहरा भारत के इतिहास को दिखा रहे हैं।
संविधान के अनुसार ईसाई धर्म अल्पसंख्यक धर्म है। आदिवासी संवैधानिक रूप से घोषित अल्पसंख्यक नहीं हैं। आदिवासी के ईसाइयत में धर्मपरिवर्तित होने पर उसकी पहचान आदिवासी के रूप में सुरक्षित रहती है। जब वे ईसाइयों के रूप में समाज आचरण करते सरकारों से व्यवहार करते हैं, तो कहते हैं कि हमें अल्पसंख्यक माना जाए। जब संवैधानिक और अन्य तरह की सुरक्षाएं दी जाती हैं, जिसके वे नौकरी, विधायन में निर्वाचन तथा शिक्षा आदि के लिए हकदार हैं, तब कहते हैं हम आदिवासी हैं। ईसाइयत में परिवर्तित हुए सभी ईसाई आदिवासी दोहरा चरित्र जीवन जीने और दोहरे लाभ भी उठाने को मजबूर हैं। इसलिए भी गैरईसाई आदिवासियों और धर्म परिवर्तित आदिवासियों के बीच एक माहौल देश में गर्म हो रहा है। पूर्वोत्तर प्रदेशों में बुनियादी आदिवासी अर्थात् गैरईसाई आदिवासी लगभग खत्म हो चुके हैं। नागालैंड, मिजोरम और मेघालय जैसे राज्य तो ईसाई राज्य ही बन गए हैं। वहां ईसाइयों की आबादी, मसलन मेघालय में लगभग 65 प्रतिशत है और मुश्किल से हिंदू 150 प्रतिशत बचे हैं। नागालैंड में ईसाईयों का प्रतिशत 98 प्रतिशत है और हिंदू आबादी केवल 20 प्रतिशत रह गई है। मिजोरम में भी यही हालात हैं, वहां 850 प्रतिशत ईसाई हैं।
अपनी किताब ‘क्रिश्चियनिटी एंड ट्राइबल रिलीजन इन झारखंड’ में जे. एन. एक्का ने लिखा है कि वर्ष 1850 में पहली बार चार स्थानीय उरांव आदिवासियों को ईसाई बनाया गया। बाद में तीन वापस अपने पुराने धर्म में आ गए। फिर विरोध या सामाजिक बहिष्कार के डर से झारखंड से भाग गए थे। सरना आदिवासी समिति के महासचिव संतोष तिर्की आदिवासियों के ईसाई बनने के खिलाफ हैं। यह भी है कि 1970 के दशक में आदिवासियों के जाने माने नेता कार्तिक उरांव ने संसद में मांग की थी कि ईसाई आदिवासियों को नौकरियों में जनजाति के नाम पर मिलने वाले आरक्षण से बाहर कर देना चाहिए क्योंकि वह दोहरा लाभ लेते हैं। भाजपा और सरना धर्म अनुयायियों सहित कुछ और लोगों का भी तर्क है कि जो आदिवासी ईसाई बन गए हैं, उन्हें जनजातीय संस्कृति और परंपरा से दूर होते देखने पर उन्हें आरक्षण का फायदा नहीं मिलना चाहिए। सवाल संविधान का है। अभी तक कौन आदिवासी है और कौन आदिवासी नहीं है। इसके प्रतिमान तक स्थिर नहीं हुए हैं।
महात्मा गांधी ने कहा है कि ईसाई धर्म प्रचारक कई पीढिय़ों से आदिवासियों की सेवा करते आ रहे हैं, लेकिन मेरी विनम्र समझ में, उनके काम में एक खामी यह है कि आखिर में वे इन भोले-भाले लोगों से ईसाई बनने की उम्मीद करते हैं। यदि ईसाई धर्म प्रचारक भी धर्मान्तरण के मकसद को छोडक़र सिर्फ इंसानी नजरिए से ही उनकी सेवा करें तो कितना अच्छा हो। गांधी ने यह भी कहा कि आप भारत में सच्चे मनुष्यों की खोज करना चाहते हैं और यदि आप उनको पाना चाहते हैं तो आपको गरीबों के झोंपड़ों में जाना होगा और उन्हें कुछ देने के लिए नहीं बल्कि बने तो उनसे कुछ लेने के लिए ही। मुझे आपमें सीखने की नम्रता और भारत के जनसाधारण से तादात्म्य स्थापित करने की इच्छा दिखाई नहीं देती।
ईसाई मिशनरी और ईसाइयत में धमांतरित आदिवासी लोग भाजपा, विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आदि के खिलाफ हिंसा का आरोप लगाते हैं। उनका कहना है ये संस्थाएं ईसाइयों को जबरिया हिंदू धर्म में वापसी कराने तयशुदा अभियान चला रही हैं। ईसाई आदिवासियों और चर्च पर हमलावर होते हैं जिससे डर के कारण हिंदू धर्म में लौट जाने के हालात बनें। ईसाइयत का प्रचार भी रोका जा सके। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री कार्यकाल में राष्ट्रीय स्वयंसेक संघ, विश्व हिंदू परिषद और भाजपा द्वारा हमले लगातार बढ़ रहे हैं। आरोप यह भी है कि जिन राज्यों में भाजपा सरकारें होती हैं, वहां हमले अचानक बढ़ जाते हैं। पुलिस तो कार्रवाई करने से पूरी तौर पर इंकार करती है। इस मुद्दे पर संयुक्त राज्य अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने भारत के खिलाफ प्रतिबंध लगाने की सिफारिश तक की है।
आयोग के नोट में छत्तीसगढ़ के धर्मांतरण विरोधी कानून का विशेष उल्लेख है। झारखंड में भी रघुवर दास सरकार ने धर्मांतरण पर प्रतिबंध लगाने झारखंड रिलिजस फ्रीडम बिल 2017 पास किया था। सरना धर्म को मानने वाले गैरईसाई आदिवासियों का आरोप है कि चर्च उनके खिलाफ साजिश रचता रहता है और उनके धर्म तथा संस्कृति को नुकसान पहुंचाता है जिससे उनकी मौलिकता और पहचान खत्म कर उन्हें जबरन फुसलाया जा सके। धर्म परिवर्तित ईसाई आदिवासियों तथा मूल आदिवासियों में सामाजिक दूरियां लगातार बढ़ती रहती हैं, बल्कि दोनों पक्षों की ओर से बढ़ाई जाती रहती हैं। कुछ धर्मपरिवर्तित ईसाईयों का यह भी कहना है कि हम अपनी जड़ों और संस्कृति से कटे नहीं हैं। हमने केवल परिवेश बदला है। उस बदलाव के बावजूद हम अपनी ही मिट्टी की उपज हैं। हमें शिक्षा, स्वास्थ्य और आधुनिक मूल्यों के प्रति जागरूकता मिली है, लेकिन हम किसी हालत में आदिवासी संस्कृति से अलग या कटे हुए नहीं माने जा सकते। इस सिलसिले में पीडि़त और प्रभावित पक्ष के कई आदिवासी छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट तक मुकदमा लेकर गए हैं। उन्हें वहां से कुछ न कुछ अनुकूल आदेश भी मिले हैं। हालांकि उनकी शिकायत है कि आदेश होने के बाद भी सरकार की ओर से कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है।
सरना धर्म को मानने वाले गैरईसाई आदिवासी हैं। उनका आरोप है कि चर्च उनके खिलाफ साजिश रच रहा है और उनके धर्म और संस्कृति को नुकसान पहुंचाता है ताकि उनकी मौलिकता और पहचान खत्म होकर उन्हें जबरन फुसलाया जा सके। धर्म परिवर्तित ईसाई आदिवासियों तथा मूल आदिवासियों के बीच सामाजिक स्तर पर दूरियां लगातार बढ़ती जा रही हैं। बल्कि दोनों पक्षों की ओर से बढ़ाई जा रही हैं। इसके बरक्स कुछ धर्म परिवर्तित ईसाईयों का कहना है कि हम अपनी जड़ों और संस्कृति से कटे नहीं हैं। केवल परिवेश बदला है, उस प्रभाव के बावजूद हम अपनी ही मिट्टी और परिवेश की उपज हैं। हमें शिक्षा, स्वास्थ्य और आधुनिक मूल्यों के प्रति जागरूकता तो मिली है। लेकिन हम किसी भी हालत में अपनी आदिवासी संस्कृति से अलग या कटे हुए नहीं माने जा सकते। इस सिलसिले में पीडि़त और प्रभावित पक्ष के कई आदिवासी छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट तक मुकदमा लेकर गए हैं। उन्हें वहां से कुछ न कुछ अनुकूल आदेश भी मिले हैं हालांकि उनकी शिकायत है कि ऐसे आदेश होने के बाद भी उन पर सरकार की ओर से कोई भी कार्यवाही नहीं की जा रही है।
छत्तीसगढ़ में भी ईसाइयत का धर्मप्रचार होने के साथ साथ आदिवासी इलाकों में धर्मांतरण तो हुआ है। सी.पी. एण्ड बरार प्रदेश रहने के वक्त जस्टिस टी.पी. नियोगी की विस्तृत रिपोर्ट भी इस संबंध में बहुत कुछ कहती है। गांधी के साथ दिलचस्प यह हुआ कि दक्षिण अफ्रीका में उनके ईसा मसीह और ईसाइयत को लेकर व्याख्यान या लेख प्रसारित होते थे। कुछ पादरियों ने मिलकर गांधी को ईसाई बनाना चाहा। उनका एक जत्था उस घर में पहुंचा जहां गांधी रहते थे। घंटों की असफल तकरीर के बाद सबसे बड़े ईसाई पादरी ने बाहर निकलकर अपने कनिष्ठ सहयोगियों से कहा कि इस आदमी को ईसाई बनाने का ख्याल दिमाग से निकाल दो। यह हम तुम सबसे ज्यादा बड़ा मानसिक और आध्यात्मिक समझ में खुद ईसाई है। हिन्दू धर्म को देखने की गांधी की दृष्टि इसीलिए हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई के नारे की राह में गीत गाती थी। इन सबके बावजूद यह इतिहास का सच है कि गांधी ने सबके लिए तो किया लेकिन आदिवासियों के लिए सार्थक कुछ कर सकने का वक्त ने उन्हें मौका नहीं दिया। इसका उन्हें जीवन भर मलाल रहा है। पिछले दिनों कोंडागांव में आदिवासी और गैर आदिवासी के नाम से हुए संघर्ष में अन्य लोगों के अलावा गांधीवादी समझ की मानव अधिकार कार्यकर्ता मेधा पाटकर भी आई थीं। तब भी पुलिसिया और प्रशासनिक विवाद हुए। हिंसक झड़पें हुई। सब मिलाकर आदिवासी तो खरबूजा हैं। हर मजहबी चाकू उनके ऊपर गिरती है और वे ही कटते हैं।


