सरगुजा

सरगुजा अंचल में अनेक रूपों और नामों से पूजी जाती हैं मां भगवती, चैत्र नवरात्रि में उमड़ती है आस्था की लहर
22-Mar-2026 9:31 PM
सरगुजा अंचल में अनेक रूपों और नामों से पूजी जाती हैं मां भगवती, चैत्र नवरात्रि में उमड़ती है आस्था की लहर

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
अंबिकापुर, 22 मार्च।
सरगुजा अंचल में चैत्र नवरात्रि के अवसर पर देवी भक्ति की विशेष धूम देखने को मिल रही है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक पूरे क्षेत्र में मां भगवती की पूजा-अर्चना विभिन्न रूपों और नामों से पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ की जाती है। गांव-गांव में देवी मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है और वातावरण देवी सेवा गीतों व जस गीतों से गूंज रहा है।
इस दौरान विशेष रूप से जनजातीय समुदाय के लोग पारंपरिक लोकगीतों और वाद्य यंत्रों जैसे किंदरा, डमफा और डोल के साथ देवी आराधना करते हैं। रामनवमी के अवसर पर जवारा बोकर नौ दिनों तक सेवा गीत गाए जाते हैं। कई स्थानों पर ग्रामीण देवी का रूप धारण कर घर-घर दर्शन देते हैं और लोगों को रोग व कष्टों से मुक्ति का आशीर्वाद देते हैं।
साहित्यकार अजय कुमार चतुर्वेदी के अनुसार सरगुजा अंचल में देवी की पूजा अलग-अलग नामों से होती है। अंबिकापुर में मां महामाया को राजपरिवार की कुलदेवी और अंचल की आराध्य देवी माना जाता है। वहीं सूरजपुर जिले के कुदरगढ़ में कुदरगढ़ी देवी, महोली में गढ़वतिया देवी, प्रतापपुर में मां समलेश्वरी, महामाया और काली, तथा रमकोला में ज्वालामुखी देवी के रूप में पूजा की जाती है।
शंकरगढ़ के चलगली स्थित महामाया मंदिर की विशेष मान्यता है, जहां देवी की मूर्ति नहीं बल्कि खडग और नगाड़े की पूजा की जाती है। मान्यता है कि देवी का स्वरूप नगाड़े में विराजमान है। यहां क्वार नवरात्रि की पंचमी को राजपरिवार द्वारा विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
इसी तरह सूरजपुर जिले के ओडग़ी ब्लॉक अंतर्गत कुदरगढ़ पर्वत पर स्थित कुदरगढ़ी देवी धाम भी आस्था का प्रमुख केंद्र है। घने जंगलों के बीच स्थित इस शक्तिपीठ में दोनों नवरात्रि के दौरान हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। जनश्रुति के अनुसार वनवास काल में भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता ने भी यहां पूजा-अर्चना की थी। कुदरगढ़ी देवी की महिमा पर आधारित गौरव गाथा केंद्रीय विश्वविद्यालय बिलासपुर की पुस्तक ‘शक्तिपीठ’ में भी प्रकाशित है।
अंबिकापुर स्थित मां महामाया मंदिर को सरगुजा अंचल का प्रमुख शक्तिपीठ माना जाता है। मान्यता है कि यहां आने वाला कोई भी भक्त खाली हाथ नहीं लौटता। ऐतिहासिक रूप से भी यह क्षेत्र समृद्ध रहा है, जहां रियासत काल में प्रतापपुर राजधानी रही, जिसे बाद में अंबिकापुर स्थानांतरित किया गया।
सरगुजा अंचल में देवी की उपासना ज्वालामुखी देवी, महामाया, कुदरगढ़ी देवी, खुडिय़ा रानी, रमपुरहिन दाई और बडक़ी माई जैसे विभिन्न नामों से की जाती है। श्रद्धालु नौ दिनों तक माता के नौ रूपों की पूजा पूरे श्रद्धा और विश्वास के साथ करते हैं और मनचाहा वरदान प्राप्त करने की कामना करते हैं।


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