सरगुजा
‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
अम्बिकापुर, 28 अक्टूबर। पारंपरिक वैद्यों को स्वास्थ्य संबंधित विषयों पर जागरूक किया गया।
ज्ञात हो कि आदिवासी उपचारकर्ता अपने समुदाय में प्राकृतिक तरीकों का उपयोग कर उपचार करते हैं। वे स्थानीय जड़ी-बूटियों, पेड़, पौधें, मिट्टी, और प्राकृतिक तत्वों का ज्ञान रखते हैं और उनका उपयोग विभिन्न रोगों के इलाज के लिए करते हैं। पीरामल फाउंडेशन सरगुजा टीम के द्वारा आदिवासी उपचारकर्ताओं के साथ इनके कार्य और पीढिय़ों से चली आ रही ज्ञान को बढ़ावा देने और आगे लाने का प्रयास किया जा रहा है। इन उपचारकर्ताओं के पास पीढिय़ों से अर्जित ज्ञान होता है, जो उन्हें यह सिखाता है कि कौन-सी जड़ी-बूटियाँ, पत्तियाँ या जड़ें किस रोग में प्रभावी हो सकती हैं। वे मसाज, भाप, और पत्तों को पीसकर, उबालकर या लेप बनाकर रोगी को उपचारित करते हैं। इसके अलावा आदिवासी उपचारकर्ता शरीर और मन को संतुलित करने के लिए समुदाय की पारंपरिक मान्यताओं और रीति-रिवाजों का भी सहारा लेते हैं। जैसे कि मंत्र-पूजा, ध्यान, अनुष्ठान।
पीरामल फाउंडेशन का द्वारा इन उपचारकर्ताओं के साथ बैठक व कार्यक्रम करने का उद्देश्य यह है कि समुदाय और ग्रामीणों को टीबी रोग के प्रति समाज में जागरूकता फैलाना और इस बीमारी के लक्षणों, रोकथाम और उपचार के बारे में जानकारी देना है।
टीबी रोग एक गंभीर बीमारी है, टीबी मुक्त भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने व टीबी उन्मूलन के लिए समुदाय और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने, और लोगों को समय पर चिकित्सा सहायता प्रदान करने के लिए प्रेरित करना है। साथ ही इस कार्यक्रम का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है, कि लोग टीबी और अन्य बीमारियों के बारे में सही जानकारी ले और बीमारी को समाप्त करने में सहयोग प्रदान करें।
पीरामल फाउंडेशन राज्य प्रबंधक फैसल रजा खान, राज्य समन्वयक दिग्विजय सिंह और जिला क्षय अधिकारी डॉ. शैलेन्द्र कुमार गुप्ता जी के मार्गदर्शन व सहयोग से जिले में कार्यरत विभिन्न प्रकार के समाजसेवी संस्था, आदिवासी उपचारकर्ता, शिक्षा विभाग, इन सभी के साथ पीरामल फाउंडेशन जिला कार्यक्रम समन्वयक सरस्वती विश्वकर्मा जी के द्वारा कार्य किया जा रहा है। साथ ही प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान के तहत् 2025 तक टीबी खत्म करने हेतु विभिन्न प्रकार के विषयों पर प्रकाश डालते हुए टीबी क्या है, किसे कहते हैं, साथ ही इसके लक्षण, कारण, फैलने के तरीके, और इसके उपचार पर विस्तृत जानकारी दी गई।
कार्यक्रम में उपस्थित सभी पारंपरिक चिकित्सकों को टीबी के उपचार और रोकथाम के लिए उपलब्ध सुविधाओं और सरकार द्वारा दी जा रही सहायता के बारे में भी बताया गया। और यह भी बताया गया कि टीबी और एनीमिया के प्रारंभिक लक्षणों की पहचान करने और जिन लोगों में टीबी के संभावित लक्षण हों, उन्हें जल्द से जल्द जांच कराने और इलाज कराने के लिए प्रोत्साहित किया गया।
पीरामल फाउंडेशन सरगुजा द्वारा लगातार टीबी और एनीमिया के संदर्भ में रोग संबंधित विषयों पर प्रश्न- भी किए गए। कार्यक्रम पश्चात सभी को टीबी की शपथ दिलाई गई, और आईईसी मटेरियल दिया गया।जिसमें यह संदेश दिया गया कि हम शपथ लेते हैं कि टीबी मुक्त भारत और अन्य बीमारी के प्रति अपना योगदान देंगे और लोगों को जागरूक करने का संकल्प लेंगे।
इस बीमारी को जड़ से समाप्त करने की दिशा में काम करने के लिए सभी को शपथ दिलाई गई। साथ ही टीबी हारेगा देश जीतेगा का संदेश दिया गया। कार्यक्रम को सफल बनाने में गांधी फेलो भाग्यश्री सहित पारंपरिक चिकित्सक उपस्थित रहे।


