राजपथ - जनपथ

छत्तीसगढ़ की धडक़न और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : लालटेन का टोटा पड़ गया
19-Aug-2021 5:35 PM (397)
छत्तीसगढ़ की धडक़न और हलचल पर दैनिक कॉलम : राजपथ-जनपथ : लालटेन का टोटा पड़ गया

लालटेन का टोटा पड़ गया

बिजली की दरों में वृद्धि के खिलाफ प्रदर्शन में भाजपा नेताओं के पसीने छूट गए। पार्टी नेताओं ने कंडील (लालटेन) मार्च निकालने का फैसला तो ले लिया था, लेकिन जब कंडील लेकर मोहल्लों में घूमने की बारी आई, तो पता चला कि किसी के पास कंडील ही नहीं है। तब  कई  नेताओं ने कार्यकर्ताओं को गोलबाजार दौड़ाया, और खरीदकर कंडील का इंतजाम किया। इसके बाद कंडील जलाने की समस्या आ गर्ई। जलाने के लिए मिट्टी तेल नहीं था। कार्यकर्ताओं को तेल का इंतजाम करने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ी।

कुछ को तो गरीब बस्तियों में भेजा गया, लेकिन अब तो ज्यादातर लोग उज्जवला स्कीम में आ चुके हैं, और मिट्टी तेल के बजाए गैस का उपयोग शुरू कर दिया है। फिर भी किसी तरह तेल का इंतजाम किया गया। इसके बाद कुछ कंडील जल पाए, तब कहीं जाकर प्रतीकात्मक प्रदर्शन किया गया। पार्टी नेताओं के मुताबिक यह अब तक का सबसे कठिन प्रदर्शन था। कुछ कार्यकर्ता तो नेताओं को कोसने लगे, जो कि बिना सोचे समझे कंडील रैली का कार्यक्रम बना लिया था।

कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों को लेकर मिथक

छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री के ढाई-ढाई साल के फार्मूले पर काफी चर्चा और बयानबाजी हो चुकी है। इसके बीच छत्तीसगढ़ और अविभाजित मध्यप्रदेश के दौर में छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व करने वाले कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों को लेकर एक रोचक मिथक चर्चा में सामने आया है। कहा जाता है कि छत्तीसगढ़ बनने के बाद और उससे पहले अविभाजित राज्य में छत्तीसगढ़ से मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने वाले किसी भी कांग्रेसी नेता ने पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं किया है। कोई भी तीन साल से ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री नहीं रह पाया। यह अलग बात है कि वे एक से अधिक बार मुख्यमंत्री पद पर रहकर पांच साल से ज्यादा समय तक कुर्सी पर रहे। अलग राज्य बनने से पहले श्यामाचरण शुक्ल मध्यप्रदेश के तीन बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन वे  कभी भी तीन साल से ज्यादा समय तक सीएम नहीं रहे। पहली बार वे मार्च 1969 में मुख्यमंत्री बने और जनवरी 1972 तक पद रहे। तीन साल से करीब दो महीने पहले उन्हें कुर्सी छोडऩी पड़ी। इसके बाद वे दिसंबर 1975 से अप्रैल 1977 तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। इस बार भी तीन साल से कम समय के लिए मुख्यमंत्री रहे। तीसरी बार श्यामाचरण दिसंबर 1989 में सीएम बने और मार्च 1990 तक पद पर रहे और इस बार भी वे 3 साल से कम समय़ के लिए सीएम रहे। इसी तरह छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व करने वाले मोतीलाल वोरा अविभाजित मध्यप्रदेश में दो बार मुख्यमंत्री रहे। पहली बार वे मार्च 1985 से फरवरी 1988 तक मुख्यमंत्री रहे। मतलब तीन साल से एक महीना कम समय के लिए वे सीएम रहे। इसके बाद दूसरी बार वे जनवरी 1989 से दिसंबर 1989 तक राज्य के मुखिया रहे। छत्तीसगढ़ बनने के बाद कांग्रेस के मुख्यमंत्री के रूप में अजीत जोगी ने शपथ ली। वे 1 नवंबर 2000 से 7 दिसंबर 2003 तक मुख्यमंत्री रहे। इस तरह वे 3 साल 34 दिन तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे। उनका कार्यकाल भी एक तरह से तीन साल का ही माना जा सकता है, क्योंकि इस दौरान चुनावों की घोषणा और नई सरकार के गठन तक पद पर रहना संवैधानिक बाध्यता भी है। साल 2003 से 15 साल तक राज्य में बीजेपी की सरकार थी। वर्ष 2018 के चुनाव में कांग्रेस को बहुमत हासिल हुआ। तब 17 दिसंबर 2018 को भूपेश बघेल ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उनके तीन साल का कार्यकाल इस साल दिसंबर में पूरा होगा।

आगे बढक़र स्ट्रोक लगाते महंत !

विधानसभा अध्यक्ष का पद संवैधानिक माना जाता है। इस पद पर बैठे सियासतदार आमतौर प्रोटोकॉल मेंटेंन करते हैं और राजनीतिक बयानबाजियों से परहेज करते हैं, लेकिन राज्य के मौजूदा विधानसभा अध्यक्ष डॉ चरणदास महंत पिछले कुछ दिनों से मीडिया से खूब सियासी और रोचक अंदाज में बातें कर रहे हैं। सियासत को खेल-खेल में समझाने की भी कोशिश कर रहे हैं और संदेश भी दे रहे हैं। मनेन्द्रगढ़वासियों को अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि उनके बयान के दूसरे दिन इलाके के लोग जिले के वासी हो जाएंगे, जबकि उन्होंने काफी स्पष्टता के साथ कह दिया था कि आने वाला कल मनेन्द्रगढ़ के लिए ऐतिहासिक होगा। राज्य के मुखिया ने मनेन्द्रगढ़ को जिला बनाने का ऐलान कर दिया। इतना ही सीएम ने महंत के विधानसभा क्षेत्र के सक्ती को भी जिला बना दिया। वे सबसे ज्यादा जिला बनवाने वाले जनप्रतिनिधि हो गए हैं। यह बात भी उन्होंने खुद स्वीकारी की कि वे सीएम से ज्यादा जिले बनवा चुके हैं। उन्होंने यह भी समझाया कि जिला बनाना था तभी तो सक्ती में पहले से ही आईएएस अधिकारी की पोस्टिंग कर दी गई थी। डॉ महंत इतने में नहीं रूके और उन्होंने कह दिया कि आने वाले चुनाव से पहले छत्तीसगढ़ में 36 जिले होंगे। मतलब तय माना जा रहा है कि सरकार आने वाले में 4 और जिला बनाने की घोषणा कर सकती है। महंत पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं तो कांग्रेस संगठन ने भी उनकी हां में हां मिलाया और कहा कि महंत कह रहे हैं, तो सोच-समझकर कह रहे होंगे और ऐसा जरूर होगा। खैर, महंत के इस नए रूप को देखकर कांग्रेसी और उनको करीब से जानने वाले भी आश्चर्यचकित हैं, क्योंकि लोगों ने महंत को कभी ऐसे आगे बढक़र सियासी स्ट्रोक लगाते नहीं देखा। कुल मिलाकर वे सियासी या प्रशासनिक हर तरह की गेंद को हवा में उछालकर बाउंड्री के बाहर पहुंचा रहे हैं। लिहाजा लोगों का आश्चर्यचकित होना स्वाभाविक है। खैर, खिलाड़ी और खेल से जुड़े लोग तो इस बात को जानते हैं कि मैदान पर कोच का निर्देश मिलने पर खिलाड़ी अक्सर आगे बढक़र स्ट्रोक लगाने उतावला रहते हैं, परन्तु सियासत में ऐसा कोई नियम है नहीं, इसलिए लोग अटकलें ही लगा सकते हैं कि कहीं सियासी मैदान में महंत को कोच से आगे बढक़र स्ट्रोक लगाने का निर्देश तो नहीं मिला है ?

परिंदों का रहवास उजड़ रहा, अफसर एसी कमरों में

बिलासपुर जिले के मोहनभाटा में सेना की जमीन है, जहां द्वितीय विश्व युद्ध के दौर में विमान उतरने के लिए हवाई पट्टियां बनी थीं। इस महंगी जमीन पर बड़े किसानों ने कब्जा कर फल के बगीचे, फॉर्म हाउस बना लिए और छोटे किसान हर साल अपने खेत का बढ़ाते और नया कब्जा करते जा रहे हैं। खेतों में कीटनाशक छिडक़ाव और कृषि गतिविधियों के कारण जीव और वनस्पति जगत पर यहां खतरा बना है।

इसका नुकसान विलुप्त प्राय: हो रहे परिंदों को अपनी अस्तित्व खोने की कीमत देकर चुकाना पड़ है। दस साल पहले मोहन भाटा में 8-10  इंडियन कर्सर बचे थे। फिर 7 और बाद में इनकी संख्या 5  रह गई। वे यहीं प्रजनन करते रहे हैं। इस बार एक माह से ज्यादा वक्त हो गया है मात्र एक ही परिंदा दिखाई दे रहा है, बाकी कहां चले गए या शिकारियों के हाथों जान गंवा चुके पता नहीं।

दरअसल मोहनभाटा की भूमि में बारिश की पहली बौछार के साथ अर्थवर्म तेजी से पनपते हैं जो कई प्रवासी परिंदों की पसन्दीदा खुराक है। वे गीली भूमि पर इनको पकडक़र नूडल्स की तरह सुडक़ते हैं। करीबी गांव वालों की गाय चराई यहां होती है और गोबर में होने वाले कीड़े भी परिन्दों का भोजन है। मरे मवेशियों की सफाई यहां सफेद गिद्ध करते हैं।

राजस्थान में अब मिलने वाले ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को काफी पहले अकलतरा में देखा जाता था, पर वहां क्रशर प्लांट और सीमेन्ट कारखाना लगने के बाद वे विलुप्त हो गये। स्थानीय लोग इस पक्षी को ‘खड़बाग’ कहते थे।

वन विभाग को सब पता है, पर कुर्सी पर जमे ऐसी रूम से निकल कर कभी इधर नहीं पधारे औऱ ना ही इस रहवास को बचाने उनके अमले ने कोई कदम उठाया। छतीसगढ़ में जैव विविधता को बचाने सरकारी अमला है पर वह कोई कार्रवाई करते दिखता नहीं। यहां शिकार से इन पक्षियों का बचाने कुछ पक्षी प्रेमी ऐसे तत्वों को अपनी हिम्मत और जोखिम उठा कर रोकते हैं. जो नाकाफी है।

(प्राण चड्ढा/फेसबुक)

तब तक सरकारी मंच पर नहीं...

मानपुर-मोहला को जिला बनाने को अम्बागढ़ चौकी की उपेक्षा मानते हुए वहां के लोगों ने आंदोलन कर दिया। कांग्रेस विधायक छन्नी साहू ने भी प्रदर्शन में भाग लिया। अब मांग में परिवर्तन लाते हुए कहा जा रहा है कि नाम चाहे मानपुर ही रहे पर जिला मुख्यालय अम्बागढ़-चौकी में स्थापित हो। दूसरी ओर कोरिया की विधायक अंबिका सिंहदेव ने घोषणा कर दी है कि जब तक जिले का सही विभाजन नहीं होगा वे किसी सरकारी कार्यक्रम के मंच पर नहीं चढ़ेंगीं। यहां कहा जा रहा है कि नया जिला तो मनेन्द्रगढ़ बन गया है, पर खडग़वां और सोनहत ब्लॉक को कोरिया जिले में रहने दिया जाये। मनेन्द्रगढ़ में मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद जश्न मनाया गया तो चिरमिरी वालों ने इस मांग को लेकर आंदोलन शुरू कर दिया कि जिला मुख्यालय चिरमिरी हो। अपने विधानसभा की जनता के साथ खड़े रहना, या कम से कम खड़े होते दिखाई देना विधायकों की जरूरत भी है और विवशता भी। क्या यह विरोध नये जिलों को लेकर लिये गये फैसलों पर कोई बदलाव लायेगा, यह देखना होगा।

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