विशेष रिपोर्ट
‘छत्तीसगढ़’ की विशेष रिपोर्ट-शशांक तिवारी
रायपुर, 2 अप्रैल (‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता)। पश्चिम एशिया में युद्ध के चलते छत्तीसगढ़ से चावल के निर्यात पर असर पड़ा है। बताया गया है कि शिपिंग यार्ड का किराया महंगा हो गया है और निर्यातकों को ‘वार सरचार्ज’ तक देना पड़ रहा है।
छत्तीसगढ़ चावल का प्रमुख निर्यातक राज्य है। यहां से सालाना करीब 40 लाख टन चावल का निर्यात होता है, जिसमें ब्रोकन चावल भी शामिल है। मगर पिछले डेढ़ महीने से ईरान और अमेरिका-इजराइल युद्ध की वजह से चावल निर्यात पर फर्क पड़ा है।
बताया गया कि युद्ध की चपेट में पूरा पश्चिम एशिया आ गया है। पश्चिम एशिया के देश चावल के प्रमुख आयातक हैं, लेकिन इन देशों को चावल निर्यात तकरीबन बंद है।
छत्तीसगढ़ के प्रमुख चावल निर्यातक अतुल अग्रवाल ने ‘छत्तीसगढ़’ से चर्चा में कहा कि पश्चिम एशिया में संकट की वजह से निर्यातकों को अलग तरह की समस्या से जूझना पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि पश्चिम एशिया के देशों में बासमती चावल का निर्यात ज्यादा होता है, जबकि छत्तीसगढ़ गैर-बासमती निर्यातक राज्य है।
उन्होंने कहा कि युद्ध की वजह से छत्तीसगढ़ पर ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ा है, लेकिन अफ्रीकी देशों और रूस आदि, जहां छत्तीसगढ़ का चावल निर्यात होता है, वहां तक भेजना महंगा हो गया है। शिपिंग यार्ड और अन्य तरह का भाड़ा देना पड़ रहा है। कुल मिलाकर यह एक तरह का ‘वार सरचार्ज’ है, जो पहले कभी नहीं था। अब निर्यात में करीब डेढ़ गुना तक खर्च करना पड़ रहा है।
बताया गया कि कुछ समय पहले तक बांग्लादेश से भारत के रिश्ते खराब थे तब दूसरे वस्तुओं के निर्यात पर फर्क पड़ा था, लेकिन छत्तीसगढ़ से बांग्लादेश को चावल के निर्यात जारी रहा। इसमें किसी तरह की कमी नहीं आई। इसकी एक वजह चावल की बेहतर गुणवत्ता, और अन्य चावल निर्यातक देशों के मुकाबले कीमत में कम होना भी है।
राइस मिल एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष योगेश अग्रवाल ने बताया कि छत्तीसगढ़ का चावल अमेरिका और एक-दो खाड़ी देशों में जाता था, जो फिलहाल बंद है। हालांकि साउथ अफ्रीका जैसे देशों में चावल निर्यात जारी है।
चावल कारोबारियों के मुताबिक छत्तीसगढ़ के मुकाबले हरियाणा और पंजाब को ज्यादा नुकसान हो रहा है, क्योंकि ये राज्य बासमती उत्पादक हैं और उनका निर्यात खाड़ी देशों पर निर्भर है, जो वर्तमान में प्रभावित हैं।
चावल कारोबारियों का कहना है कि मार्च-अप्रैल के महीने से निर्यात की शुरुआत होती है, लेकिन युद्ध बंद नहीं हुआ तो चावल के निर्यात पर व्यापक असर पड़ेगा। छत्तीसगढ़ भी अछूता नहीं रहेगा।


