विशेष रिपोर्ट
नक्सलवाद पर पूर्व डीजी ने कहा
आरके विज से तृप्ति सोनी की खास बातचीत
रायपुर, 2 अप्रैल (‘छत्तीसगढ़’) । छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खात्मे को लेकर सरकार के ऐलान के बाद भले ही राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहे हों, लेकिन साढ़े 5 सौ से अधिक नक्सलियों के मारे जाने और ढाई हजार से अधिक के सरेंडर करने के आंकड़े सरकारी दावों को काफी हद तक मजबूती देते नजर आते हैं। इस पूरे मामले पर लंबे समय तक नक्सल मोर्चे पर काम कर चुके रिटायर्ड डीजी आरके विज का मानना है कि यह बदलाव अचानक नहीं आया है, बल्कि इसके पीछे 20-25 सालों की लगातार मेहनत और रणनीति काम कर रही है। उन्होंने आगाह किया कि सरेंडर कर चुके लोगों को समय पर आर्थिक मदद और रोजगार नहीं मिला, तो असंतोष पैदा हो सकता है।
छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद को लेकर 31 मार्च की तय समयसीमा खत्म होने के बाद बहस तेज हो गई है। इस मुद्दे पर ‘छत्तीसगढ़’ से खास बातचीत में आरके विज ने कहा कि आज जो बदलाव दिखाई दे रहा है, वह लंबे समय की रणनीतिक कोशिशों का परिणाम है।
उन्होंने बताया कि शुरुआत में 31 मार्च की समयसीमा को एक राजनीतिक बयान के रूप में देखा जा रहा था, क्योंकि खुद सुरक्षा तंत्र से जुड़े लोग भी यह नहीं मानते थे कि माओवाद इतनी जल्दी कमजोर हो जाएगा। लेकिन मौजूदा हालात जमीनी स्तर पर बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रहे हैं।
विज ने कहा कि वर्ष 2004 से 2010 के बीच नक्सलवाद अपने चरम पर था। इस दौरान नक्सलियों ने तेजी से विस्तार किया और बस्तर के अंदरूनी इलाकों से निकलकर महासमुंद समेत अन्य क्षेत्रों तक अपनी पहुंच बना ली। संगठनात्मक रूप से भी वे मजबूत हुए,छोटे दस्तों से लेकर बड़ी कंपनियां और बटालियन तक गठित की गईं। उस समय गांवों में उनका प्रभाव गहरा था और भर्ती लगातार जारी थी।
हालांकि 2011-12 के बाद स्थिति बदलनी शुरू हुई। विज ने कहा कि खुद नक्सलियों की रिपोर्ट में यह स्वीकार किया गया कि उनका जनाधार घट रहा है और जितने नए लोग जुड़ रहे हैं, उससे ज्यादा संगठन छोड़ रहे हैं। इसके पीछे सरकारों द्वारा सुरक्षा व्यवस्था को लगातार मजबूत किया जाना एक प्रमुख कारण रहा।
उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य में अलग-अलग दलों की सरकारों के बावजूद नक्सलवाद के खिलाफ अभियान लगातार जारी रहा। पुलिस थानों को सुदृढ़ किया गया, इंटेलिजेंस तंत्र को मजबूत किया गया, विशेष बलों का गठन हुआ और सरेंडर व पुनर्वास नीतियों में सुधार किया गया। राज्य गठन के समय जहां पुलिस बल की संख्या 22-23 हजार के आसपास थी, वहीं अब यह बढक़र 80 हजार से अधिक हो गई है। बटालियनों की संख्या में भी कई गुना वृद्धि हुई है और जवानों को जंगल युद्ध की विशेष ट्रेनिंग दी गई है।
विज ने बताया कि नक्सल विरोधी अभियान में डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड (डीआरजी) की भूमिका निर्णायक रही। इसमें स्थानीय युवाओं और पूर्व नक्सलियों को शामिल किया गया, जिससे ऑपरेशन ज्यादा प्रभावी बने। उन्होंने केंद्रीय बलों के योगदान को भी अहम बताया।
पिछले दो वर्षों में आए तेज बदलाव के पीछे विज ने तीन प्रमुख कारण गिनाए।सरकार की मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा बलों की बढ़ती पहुंच और तकनीक का व्यापक उपयोग। बड़ी संख्या में नए कैंप स्थापित किए गए और अबूझमाड़ जैसे दुर्गम इलाकों तक पहुंच बनाई गई, जिससे ऑपरेशन आसान हुए और नक्सलियों की घेराबंदी संभव हो सकी। ड्रोन, बेहतर संचार प्रणाली और आधुनिक उपकरणों ने भी अभियानों को अधिक प्रभावी बनाया है, हालांकि आईईडी जैसी चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं।
उन्होंने बताया कि मई 2025 में बड़े नक्सली नेता बसवा राजू के मारे जाने से संगठन को बड़ा झटका लगा। इसके बाद नेतृत्व कमजोर हुआ, आंतरिक मतभेद बढ़े और कई वरिष्ठ नेताओं ने आत्मसमर्पण किया। इससे संगठन के निचले स्तर तक यह संदेश गया कि संघर्ष अब अधिक समय तक नहीं चल सकता।
सरकार जहां इसे पुनर्वास की प्रक्रिया बता रही है, वहीं विज का मानना है कि हथियार छोडऩा सरेंडर है और पुनर्वास उसका अगला चरण है। उनका कहना है कि अब सरकार का उद्देश्य दंड देना नहीं, बल्कि उन्हें मुख्यधारा में शामिल करना है।
मानवाधिकार के सवाल पर उन्होंने कहा कि पुलिस को प्रशिक्षण के दौरान आम नागरिकों को नुकसान न पहुंचाने की सख्त हिदायत दी जाती है। कुछ मामलों में त्रुटियां जरूर हुई होंगी, लेकिन उन पर कार्रवाई भी की गई है।
विज ने कहा कि आगे की सबसे बड़ी चुनौती पुनर्वास को प्रभावी ढंग से लागू करना है। यदि आत्मसमर्पण कर चुके लोगों को समय पर आर्थिक सहायता, आवास और रोजगार नहीं मिला, तो असंतोष पैदा हो सकता है। उन्होंने जोर दिया कि केवल एकमुश्त राशि देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि स्थायी रोजगार की व्यवस्था जरूरी है, ताकि वे सामान्य जीवन जी सकें। साथ ही, उन्हें उनके सामाजिक परिवेश में बसाने का प्रयास किया जाना चाहिए, ताकि वे समाज से दोबारा जुड़ सकें।
कुल मिलाकर, छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद का कमजोर होना किसी एक घटना का परिणाम नहीं, बल्कि वर्षों की रणनीति, सुरक्षा बलों की सतत मेहनत और सरकार की मजबूत इच्छाशक्ति का नतीजा है। अब जरूरत इस बात की है कि इस स्थिति को स्थायी बनाया जाए, ताकि प्रदेश में शांति और विकास की दिशा और अधिक मजबूत हो सके।


