राजपथ - जनपथ
उपचुनाव में भाजपा-कांग्रेस का प्रदर्शन
नगरीय निकाय उपचुनाव में कांग्रेस को अपेक्षाकृत सफलता नहीं मिल पाई। पार्टी पांच में से केवल दो नगर पंचायतों के अध्यक्ष पद जीतने में सफल रही, जबकि भाजपा के तीन नगर पंचायत अध्यक्ष निर्वाचित हुए हैं। कांग्रेस को उपचुनाव में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद थी। वजह ये है कि पांच में से चार नगर पंचायत, पहले ग्राम पंचायत थी, और वहां कांग्रेस समर्थित सरपंच चुने जाते रहे हैं। मगर नगर पंचायत बनने के बाद चुनाव में स्थिति थोड़ी बदल गई। फिर भी नगरीय निकाय आम चुनाव की तुलना में कांग्रेस का प्रदर्शन संतोषजनक कहा जा सकता है। नगरीय निकाय आम चुनाव में कांग्रेस को बुरी हार का सामना करना पड़ा।
निकाय उपचुनाव में डिप्टी सीएम विजय शर्मा और महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े की प्रतिष्ठा भी दांव पर थी। इसके अलावा महिला कांग्रेस की अध्यक्ष संगीता सिन्हा, और कांग्रेस विधायक श्रीमती हर्षिता स्वामी बघेल, और बालेश्वर साहू की भी परीक्षा की घड़ी थी।
नगर पंचायतों में कांग्रेस को घुमका और पलारी में जीत हासिल हुई, जबकि भाजपा ने सहसपुर-लोहारा, शिवनंदनपुर और बम्हनीडीह में कब्जा जमाया। सहसपुर-लोहारा नगर पंचायत उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा के विधानसभा क्षेत्र कवर्धा में आता है। यहां भाजपा अपना कब्जा बरकरार रखने में सफल रही।
दूसरी तरफ,महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े के विधानसभा क्षेत्र भटगांव के शिवनंदनपुर नगर पंचायत में भाजपा को उल्लेखनीय सफलता मिली है। शिवनंदनपुर पहले ग्राम पंचायत था और नगर पंचायत बनने के बाद यहां पहली बार चुनाव हुए। यह क्षेत्र कांग्रेस का गढ़ माना जाता रहा है। चुनाव के दौरान कांग्रेस नेता पर आपराधिक प्रकरण दर्ज होने के बाद यहां भारी विरोध प्रदर्शन हुआ था। पूर्व उपमुख्यमंत्री टी.एस. सिंहदेव और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज अनशन पर बैठ गए थे। प्रशासन को कांग्रेस नेताओं की मांगें माननी पड़ी थीं।
कांग्रेस के आक्रामक रुख के कारण यहां का चुनाव काफी दिलचस्प हो गया था। तमाम कोशिशों के बावजूद कांग्रेस के अध्यक्ष पद के प्रत्याशी चुनाव हार गए और महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखने में सफल रहीं। हालांकि यहां कांग्रेस के अधिक पार्षद निर्वाचित हुए हैं।
इसके अलावा बालोद जिले की पलारी नगर पंचायत में महिला कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष एवं स्थानीय विधायक संगीता सिन्हा के समर्थक यानेश साहू चुनाव जीतने में सफल रहे। इसी तरह डोंगरगढ़ विधानसभा क्षेत्र की घुमका नगर पंचायत में कांग्रेस की अध्यक्ष प्रत्याशी श्रीमती फुलवती वर्मा को जीत मिली। इस विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व श्रीमती हर्षिता स्वामी बघेल करती हैं।
इसके अलावा जांजगीर-चांपा जिले की बम्हनीडीह नगर पंचायत में भाजपा के प्रत्याशी रूपेश डड़सेना करीब 850 वोटों से जीतने में सफल रहे। बम्हनीडीह जैजैपुर विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा है। जैजैपुर से कांग्रेस के बालेश्वर साहू विधायक हैं, जो पिछले दिनों काफी विवादों में रहे हैं और उनके खिलाफ आपराधिक प्रकरण भी दर्ज हुआ था।
एल्डरमैन, दिन-महीने-साल घट रहे
मनोनीत पार्षदों (एल्डरमैन) की नियुक्ति को लेकर भाजपा भी पिछली कांग्रेस सरकार की तर्ज पर काम कर रही है। निर्वाचित निकायों में चुनाव हुए 15 माह बीत गए हैं लेकिन अब तक नियुक्ति नहीं की जा सकी है। कांग्रेस की बघेल सरकार ने भी 2021-22 में नियुक्तियां की थी और 23 में विधानसभा चुनाव में सरकार बदलने के बाद कांग्रेस के सभी एल्डरमैन की नियुक्ति रद्द कर दी गईं थीं।
निकाय चुनाव में भारी बहुमत के बाद मेहनती कार्यकर्ताओं को उपकृत करने वाली इन नियुक्ति न होने से फील्ड का कार्यकर्ता नाराज है। देरी का कारण पूछने पर डिप्टी सीएम नगरीय प्रशासन अरुण साव ने दो दिन पहले ही कहा कि प्रक्रिया चल रही है।
एल्डरमैन पद के लिए पार्टी उन्हीं को तरजीह देती है जो दावेदारी के बाद भी टिकट न मिलने पर विरोध नहीं करते, चुनाव में अच्छी मेहनत से काम किया हो और बड़े नेताओं के शागिर्द हों। यह एक तरह से मनोनीत सांसदों की तरह राजनीति की पहली सीढ़ी में बिना चुनाव लड़े सरकारी पद पाने जैसा है।
प्रदेश के 194 निकायों में करीब 700 एल्डरमैन नियुक्त किए जाने हैं। इनमें 14 निगमों में 5 से 11, 56 पालिकाओं में 6-6, और 124 नगर पंचायतों में 4-4 एल्डरमैन नियुक्त किए जाने हैं। इस महीने नियुक्ति हो जाती है तो इन्हें 2028 तक ढाई साल का कार्यकाल मिलेगा। वर्ना जितनी देर होगी उतने दिन महीने साल कम होते जाएंगे। निगमों के इन एल्डरमैन को हर माह 75 सौ रू मानदेय, 1.50 लाख तक की पार्षद निधि में से बोनस अलग मिलता है। वहीं पालिका और पंचायतों के एल्डरमैन को केवल 2500 रुपए मानदेय। जहां तक इनके अधिकारों की बात है तो निगम एक्ट के तहत एल्डरमैन को नगर निगम-पालिका की सामान्य बैठकों और सत्रों में भाग लेने, चर्चा करने और अपने सुझाव रखने का पूरा अधिकार होता है। इन्हें निर्वाचित पार्षदों की तरह ही प्रश्नकाल के दौरान सदन में सवाल पूछने का अधिकार होता है। एल्डरमैन विभिन्न निगम समितियों के सदस्य बन सकते हैं । वैसे बता दें कि छत्तीसगढ़ की तरह मप्र में भी इनकी नियुक्ति में देरी की गई। वहां मार्च अंत में की गई थी। यहां भी अगले कुछ दिनों में नियुक्ति के संकेत हैं।
स्वास्थ्य सेवा की हकीकत
कोंडागांव जिले के केशकाल में डॉक्टर शैलेंद्र भोयर शराब के नशे में ड्यूटी पर थे। लाचार मरीज उनको इस हालत में देखकर भी इलाज कराना चाह रहे थे लेकिन वे मना कर रहे थे। विरोध करने पर उन्होंने न केवल मरीज और उनके परिजनों से दुर्व्यहार किया बल्कि खबर लेने के लिए पहुंचे पत्रकारों के साथ भी हाथापाई की।
बस्तर संभाग के जिले हों या सरगुजा के दूरस्थ आदिवासी इलाके। यहां स्वास्थ्य सेवाओं पर संकट राज्य बनने के 26 साल बाद भी बना हुआ है। डॉक्टर इन स्थानों पर पोस्टिंग से बचते हैं, तबादला करा लेते हैं, जिनका तबादला नहीं रुक पाता वे अस्पताल से गायब रहते हैं और जो डॉक्टर पहुंच रहे हैं, उनमें से कई भोयर की तरह। कुल मिलाकर इन इलाकों में मरीज भगवान भरोसे है। इस स्थिति में सुधार के लिए कोई इच्छा शक्ति भी जिम्मेदारों में नहीं दिखती। हर पंद्रह दिन, महीने भर में लचर स्वास्थ्य सेवाओं की खबरें आती हैं, पर हर एक मामले को अलग-अलग करके देखा जाता है और उसी पर कार्रवाई कर बताने की कोशिश की जाती है कि सब ठीक चल रहा है। गर्भाशय कांड, अंखफोड़वा कांड, नसबंदी कांड सब छत्तीसगढ़ के खाते में दर्ज हैं। कुपोषण, एनीमिया, मलेरिया और डायरिया से इन इलाकों में होने वाली मौतों पर भी कोई नियंत्रण नहीं हो पाया है। इन दिनों खरीदी और आउटसोर्सिंग की नियुक्तियों में भ्रष्टाचार की खबरें रह-रह कर बाहर आ रही हैं।
सन् 2024 में आई कैग की रिपोर्ट में बताया गया था कि छत्तीसगढ़ में डॉक्टरों की भारी कमी है, दवाओं की खरीद अनियमित तरीके से हो रही है। इंफ्रास्ट्रक्चर की हालत खस्ता है। बस्तर संभाग को लेकर इस रिपोर्ट में बताया गया था कि स्पेशलिस्ट डॉक्टरों के 93 प्रतिशत पद खाली हैं। रिपोर्ट में कहा गया था कि आदिवासी इलाकों में एनीमिया की दर 70 से 80 प्रतिशत तक है। प्रसव संबंधी जटिलताएं आम बात है। अस्पताल पहुंचने के लिए लोगों को कई-कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। किसी भी पार्टी की सरकार हो, विशेषज्ञ डॉक्टर बस्तर से जल्दी से जल्दी निकालकर राजधानी आ जाना चाहते हैं, और फिर किसी प्रशासनिक कुर्सी पर लपकते हैं। राज्य के 25 बरस हो गए हैं, लेकिन पोस्टिंग और ट्रांसफर में राजनीतिक दखल कभी कम ही नहीं हुई।
एक सरकार ने ऐसी मशीनें खऱीद लीं जिनको चलाने के लिए भी कंपनी का मोहताज रहना रहता है, तो ये मशीनें अगली सरकार की छाती पर भी बोझ बनी रहती हैं।
दरअसल, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी दूसरे इंफ्राक्ट्रचर से जुड़े हुए हैं। दूरस्थ गांवों तक अब तक पक्की सडक़ें नहीं हैं। उनके लिए बेहतर आवास, स्कूल और सुरक्षा के इंतजाम नहीं हैं। इन सबको वे बर्दाश्त भी कर लें अगर वेतन के साथ अच्छा इंसेंटिव भी दिया जाए, पर वह भी नहीं है। शीर्ष पर बैठे अफसरों को पता है कि ज्यादा कठोर कार्रवाई करने पर, जो स्टाफ अभी अस्पतालों में दिख रहे हैं, वे भी आगे काम करने से कतराएंगे। इसलिये ज्यादातर शिकायतों में शुरुआती निलंबन और नोटिस जैसी कार्रवाई तो की जाती है पर आगे रफा-दफा कर दिया जाता है।


