राजपथ - जनपथ
साहब की चुनावी तैयारी
छठवीं विधानसभा का आधा कार्यकाल लगभग बीत चुका है। सत्तारूढ़ भाजपा संगठन ने पिछले दिनों प्रदेश कार्यसमिति की बैठक कर अगले चुनाव में तैयारी शुरू कर दी है। कांग्रेस में फिलहाल वैसी हलचल नहीं है। वहां प्रदेश अध्यक्ष का भविष्य तय होने के बाद कमर कसी जाएगी। दोनों प्रमुख दलों की ऐसी हलचल के बीच कुछ नौकरशाह भी माननीय बनने की जुगत बिछाने लगे हैं। छत्तीसगढ़ में नौकरशाहों का नेता बनने का स्ट्राइक रेट अच्छा है। स्व. अजीत जोगी के बाद, डीएसपी आर के राय, श्याम लाल कंवर,आईएएस ओपी चौधरी, नीलकंठ टेकाम प्रमुख हैं ही।
कुछ कृषि अधिकारी, पटवारी, हवलदार, टीआई भी विधायक चुने गए। इनमें से कुछ को एक ही बार अवसर मिला। बहरहाल अगले चुनाव को लेकर ताजा नाम एक टेक्नोक्रेट का हलचल में है। साहब अपने साथ साथ पत्नी के लिए भी सक्रिय हो गए हैं। टिकट चाहे जिसे मिल जाए। ये टिकट भाजपा, कांग्रेस किसी की भी चलेगी। साहब अनुसूचित जनजाति वर्ग से आते हैं और उनकी जाति के लोग कोरबा जिले की सीट से पहले भी चुने जा चुके हैं। वैसे साहब सेवा स्थल पर विस्तार (एक्सटेंशन) के लिए भी सक्रिय हैं। इनके दो समकक्षों को दो दो बार मिल चुका है। सो उम्मीद बढ़ गई है। और मातहत दावेदार अभी उतने वरिष्ठ नहीं है। एक्सटेंशन मिला तो अगले एक साल सेवा भावना का विस्तार तेजी से होगा। साहब और मैडम की सक्रियता चर्चा में है। देखना होगा आगे क्या नतीजे आते हैं।
बैज के लिए आखिरी मौका ?
नगरीय निकाय और पंचायतों के उपचुनाव चल रहे हैं। इनमें नगरीय निकाय के चुनाव दलीय आधार पर हो रहे हैं। वैसे तो चुनाव को लेकर ज्यादा बातें नहीं हो रही हैं, लेकिन कांग्रेस और भाजपा दोनों ही पूरी गंभीरता से चुनाव लड़ रहे हैं। प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज के कार्यकाल का आखिरी चुनाव है। लिहाजा, उन्होंने पार्टी के तमाम प्रमुख नेताओं को प्रचार में लगा दिया है।
पांच नगर पंचायत अध्यक्ष और पार्षदों के कुल 71 पदों के लिए 1 जून को वोटिंग होगी। नगरीय निकायों के चुनाव ईवीएम से होंगे, जबकि पंचायतों के चुनाव में मतपत्रों का उपयोग होगा। जिन पांच नगर पंचायतों में अध्यक्ष के चुनाव हो रहे हैं, उनमें सूरजपुर जिले की शिवनंदनपुर, जांजगीर-चांपा जिले की बम्हनीडीह, राजनांदगांव जिले की घुमका नगर पंचायत, बलौदाबाजार जिले की पलारी और कवर्धा जिले की सहसपुर लोहारा सीट शामिल हैं।
कांग्रेस ने पूर्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल, विधायक रामकुमार यादव, राघवेंद्र सिंह, बालेश्वर साहू और व्यास कश्यप को बम्हनीडीह चुनाव की कमान सौंपी है। खुद नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत चुनाव प्रचार पर नजर रखे हुए हैं।
सूरजपुर जिले की नगर पंचायत शिवनंदनपुर के चुनाव प्रचार की कमान पूर्व मंत्री अमरजीत भगत और डॉ. प्रेमसाय सिंह संभाल रहे हैं। यह नगर पंचायत महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े के विधानसभा क्षेत्र भटगांव का हिस्सा है। लिहाजा, उनकी भी प्रतिष्ठा दांव पर है। इसी तरह कवर्धा जिले की सहसपुर लोहारा सीट पर कांग्रेस के प्रचार की कमान राजनांदगांव ग्रामीण विधायक इंदरशाह मंडावी और विधायक भोलाराम साहू संभाल रहे हैं। गृहमंत्री विजय शर्मा का विधानसभा क्षेत्र होने के कारण यहां मुकाबला काफी दिलचस्प हो गया है। बलौदाबाजार जिले की पलारी नगर पंचायत में पूर्व मंत्री अनिला भेडिय़ा कांग्रेस प्रत्याशी का प्रचार कर रही हैं, तो भाजपा ने पर्यटन बोर्ड की अध्यक्ष नीलू शर्मा को प्रभारी बनाया है।
प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज की बतौर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष उपलब्धियां लगभग शून्य रही हैं। उनके नेतृत्व में पार्टी को विधानसभा, लोकसभा और फिर नगरीय निकाय व पंचायत चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। अब बैज का कार्यकाल 10 जून को खत्म हो रहा है। ऐसे में उपचुनाव के बहाने उन्हें खुद को साबित करने का आखिरी मौका माना जा रहा है। पार्टी के कुछ नेताओं का मानना है कि यदि चुनाव में कांग्रेस को सफलता मिलती है, तो बैज को बदलना आसान नहीं रहेगा। यही वजह है कि बैज पूरा जोर लगा रहे हैं। देखना है आगे क्या होता है।
उदंती-सीतानदी में रहस्यमयी बाघिन

छत्तीसगढ़ के उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में एक रहस्यमयी बाघिन की मौजूदगी ने इन दिनों वन विभाग और वन्यजीव विशेषज्ञों को हैरान कर रखा है। करीब चार साल उम्र की यह बाघिन अचानक कैमरा ट्रैप में नजर आई, लेकिन देश के किसी भी टाइगर डेटाबेस में उसके पंजों या शरीर की धारियों का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला।
अप्रैल और मई में मिले ताजा कैमरा ट्रैप फोटो से पुष्टि हुई है कि यह बाघिन अब भी उदंती-सीतानदी के जंगलों में सक्रिय है। इससे पहले जनवरी में उसकी पहली तस्वीर सामने आई थी। इसके बाद वन विभाग ने उसकी पहचान के लिए वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया को तस्वीरें भेजीं, लेकिन देश के किसी भी दर्ज टाइगर रिकॉर्ड से उसकी धारियां मेल नहीं खाईं।
जबलपुर स्थित नानाजी देशमुख वेटरनरी साइंस यूनिवर्सिटी में जांच के दौरान उसके मल के नमूनों से पुष्टि हुई कि वह मादा बाघ है। हालांकि वह कहां से आई, यह अब भी रहस्य बना हुआ है। आसपास के राज्यों ओडिशा, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के जंगलों में भी इस बाघिन का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं मिला। विशेषज्ञों का कहना है कि आमतौर पर मादा बाघिनें अपने जन्म क्षेत्र से बहुत दूर नहीं जातीं, जबकि नर बाघ लंबी दूरी तय करते हैं। ऐसे में बिना किसी रिकॉर्ड के इस बाघिन का यहां तक पहुंचना बेहद असामान्य माना जा रहा है।
कभी बाघों के लिए पहचाने जाने वाले उदंती-सीतानदी रिजर्व में पिछले कुछ वर्षों से बाघों की संख्या लगातार घट रही थी। 2014 में यहां तीन बाघ दर्ज किए गए थे, लेकिन 2018 तक केवल एक बाघ बचा था। इसके बाद यहां केवल गुजरने वाले नर बाघ ही कभी-कभार दिखाई देते रहे।
वन विभाग उदंती में बाघों के पुनर्वास की योजना बना रहा था और इसके लिए राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण को प्रस्ताव भी भेजा गया था। अब इस बाघिन की मौजूदगी ने उम्मीद जगा दी है कि शायद प्रकृति खुद इस जंगल को फिर से बाघों का घर बनाने लगी है।


