राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : कर्नाटक में अमल में आया 36गढ़ का फार्मूला
28-May-2026 6:45 PM
राजपथ-जनपथ : कर्नाटक में अमल में आया 36गढ़ का फार्मूला

कर्नाटक में अमल में आया 36गढ़ का फार्मूला

कर्नाटक में कांग्रेस के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया के इस्तीफे की चर्चाओं के बीच एक बार फिर ढाई-ढाई साल के सीएम फार्मूले पर चर्चा तेज हो गई है।

छत्तीसगढ़ में वर्ष 2018 में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर ढाई-ढाई साल के फार्मूले की खूब चर्चा हुई थी, लेकिन यह फार्मूला अमल में नहीं आ पाया। कर्नाटक में भी कांग्रेस ने सत्ता में आने के बाद इसी तरह का फार्मूला लागू किया। इसके तहत सिद्धरमैया को तीन साल बाद कुर्सी छोडऩी पड़ी और डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार के सीएम बनने का रास्ता साफ हो गया।

कर्नाटक में कांग्रेस को बहुमत मिलने के बाद प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते डीके शिवकुमार सीएम पद के स्वाभाविक दावेदार थे। मगर पार्टी हाईकमान ने विधायकों की राय और स्थानीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए सिद्धरमैया को मुख्यमंत्री बनाया। इसके बाद डीके शिवकुमार को डिप्टी सीएम पद के लिए राजी किया गया और उन्हें ढाई साल बाद सीएम बनाने का भरोसा दिया गया।

बहुत कम लोगों को मालूम है कि डीके शिवकुमार, छत्तीसगढ़ में ढाई-ढाई साल के फार्मूले का हश्र देखकर शुरुआत में तैयार नहीं थे। उन्होंने इस फार्मूले को लेकर विस्तार से जानकारी ली और दिल्ली में टीएस सिंहदेव को लंच पर आमंत्रित किया। सिंहदेव ने उन्हें उस समय की पूरी परिस्थितियों से अवगत कराया। बाद में शिवकुमार, पार्टी की पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी के हस्तक्षेप के बाद डिप्टी सीएम पद के लिए तैयार हुए।

खास बात यह है कि छत्तीसगढ़ में सीएम पद के लिए ढाई-ढाई साल के फार्मूले से सोनिया गांधी अलग थीं। यह फार्मूला खुद भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव तत्कालीन कांग्रेस प्रभारी पीएल पुनिया को लेकर राहुल गांधी के पास पहुंचे थे। वजह यह थी कि हाईकमान की ओर से मुख्यमंत्री पद के लिए ताम्रध्वज साहू का नाम तय किया गया था, जिसके लिए भूपेश बघेल, टीएस सिंहदेव और डॉ. चरणदास महंत तैयार नहीं थे। राहुल गांधी ने भूपेश और सिंहदेव के फार्मूले को मंजूरी दी और भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बन गए।

बाद में ढाई साल पूरे होने पर भूपेश समर्थक 53 विधायकों ने दिल्ली में डेरा डाल दिया। इससे हाईकमान पर दबाव बढ़ा और अंतत: भूपेश बघेल पूरे पांच साल सीएम बने रहे।

दिलचस्प यह भी है कि सरकार बनने के समय सिंहदेव समर्थक विधायकों की संख्या सबसे ज्यादा मानी जाती थी, लेकिन सीएम बनने के बाद अधिकांश विधायक भूपेश बघेल के साथ चले गए। हाईकमान को भूपेश बघेल की राजनीतिक ताकत के आगे झुकना पड़ा। कर्नाटक में भी इस बार कमोबेश ऐसी ही स्थिति रही, लेकिन वहां हाईकमान ने सख्ती दिखाई और डीके शिवकुमार के सीएम बनने का रास्ता साफ कर दिया।

बीन बजाएं बाहर आ जाएगा....

बुधवार को मंत्रालय के श्रम विभाग में सांप घुस आया था। यह विभाग पांच मंजिला भवन के ग्राउंड पर डी गेट के पास है। इसके ठीक बगल के नगरीय प्रशासन विभाग में भी पिछले माह एक सांप घुसा था।  अलमारी के नीचे घुसे इस सांप  29 अप्रैल को मार दिया गया था। कल का  सांप फाइलों के बीच मुड़ कर सोया, फंसा हुआ था। पता नहीं कब से, फाइलों के बीच था, कल एक फाइल को खोजते समय दिखाई दिया। यह ख़बर फैलते ही कर्मचारी के वाट्सएप ग्रुप तरह तरह की रोचक टिप्पणियों से भर गया।

पहली ही सूचना पर जवाब आया कि-बीन बजाएं बाहर आ जाएगा। तो जवाब आया श्रम विभाग में आया है और फाइल में छिपा है कहीं फाइल सक्ती के वेदांता ब्लास्ट मामले की तो नहीं।

एक ने कहा - मंत्रालय में सेटअप स्वीकृति की खबर सुनकर सांप भी काम करने आ गया लगता है। या फिर इसका भी आई कार्ड बन गया होगा भंडारे का।

करीब एक-पौन घंटे की मशक्कत के बाद जंगल सफारी के स्नेक कैचर बुलाकर सांप को पकड़ा गया। पूरे खेत खलिहान में बने महानदी इंद्रावती भवन में बीते वर्षों में भी कई बार सांप घुसते रहे हैं। एक बारगी इंद्रावती भवन के तीसरे फ्लोर में घुसा था।

 इन वाकयों को याद करते हुए  टिप्पणी हुई कि मंत्रालय में सर्प मित्र की पदस्थापना होनी चाहिए। जवाब मिला-खुद के यहां सांप घुसा तो ही सर्पमित्र भर्ती की याद आई। वैसे भी बहुत सांप मंत्रालय में हैं जिनका रंग काला है। इनमें दुध नाग भी होगें । किसी ने कहा ढोढिय़ा है। तब स्नेक कैचर के  हवाले से बताया कि कल का सांप धामन था। चलो इसी बहाने सांप की प्रजाति की पहचान हो गई और यह भी कि कौन से सांप से बचना चाहिए।

इंद्रधनुषी झबरी शेकरू बारनवापारा में

छत्तीसगढ़ के बारनवापारा अभयारण्य के देवपुर जंगल में दुर्लभ जायंट मालाबार स्क्विरल देखने को मिला है। रंग-बिरंगे शरीर और लंबी झबरी पूंछ वाली यह विशाल गिलहरी अपने आप में प्रकृति का अद्भुत नमूना है। 

इसका वैज्ञानिक नाम रतूफा इंडिका है।  प्राणी विज्ञान के छात्र और वन विभाग के अफसर इसे इंडियन जायंट स्क्विरल, मालाबार जायंट स्क्विरल कहते हैं। महाराष्ट्र में शेकरू जैसा आसान नाम चलता है, क्योंकि इसे वहां राजकीय वन्यजीव का दर्जा मिला हुआ है।

माना जाता है, भारत में पाई जाने वाली गिलहरियों में यह सबसे बड़ी प्रजाति है। पूंछ सहित इसकी लंबाई लगभग तीन फीट तक पहुंच जाती है। मगर, इसका सबसे रिझा देने वाली बात इसका बहुरंगी शरीर है। बैंगनी-भूरा, गहरा लाल, क्रीम, पीला और काला रंग। ये सब मिलाकर इसे किसी चित्रकार की बनाई कलाकृति जैसी शक्ल देती है। सामान्य तौर पर हम भूरे रंग की गिलहरियों से ही परिचित हैं, जो आंगन, गार्डन में दिख जाती हैं। इसका रूप उनसे बहुत अलग है।

यह जीव पूरी तरह वृक्षों पर रहने वाला यानी आर्बोरियल या कहें, वृक्षवासी है। बंदर और लंगूर की तरह कभी-कभी ही जमीन पर उतरते हैं। ऊंचे पेड़ों की शाखाओं पर तेजी से दौड लेते हैं। एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक 15 से 20 फीट तक छलांग लगा लेते हैं। इसकी लंबी और घनी पूंछ हवा में संतुलन बनाए रखने में मदद करती है। खतरा महसूस होने पर यह पेड़ के तने से चिपककर खुद को छिपा लेती है।

शेकरू की और विशेषता बताएं तो यह मोटे तौर पर फल, बीज, फूल, पेड़ों की छाल और पत्तियां खाती हैं। कभी-कभी कीड़े-मकोड़े और पक्षियों के अंडे भी इसका भोजन बनते हैं। वन पारिस्थितिकी में इसकी भूमिका जरूरी होती है, क्योंकि यह बीजों को जंगल में फैलाकर नए पौधों के उगाने में मदद करती है। इस वजह से इसे जंगलों के प्राकृतिक पुनर्जीवन का सहयोगी जीव भी कहते हैं।

आम तौर पर शेकरू पश्चिमी घाट, सतपुड़ा क्षेत्र, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु के घने जंगलों में पाई जाती है। छत्तीसगढ़ के बार नवापारा में इसका दिखना इसलिए खास माना जा सकता है क्योंकि यह केवल उन्हीं क्षेत्रों में जीवित रह पाती है जहां जंगल अपेक्षाकृत शांत हो और घना हो। बता दें, वन्यजीव वैज्ञानिक इसे इंडिकेटर स्पीशीज- यानी स्वस्थ वन वातावरण का संकेत देने वाली प्रजाति मानते हैं।

यह जानकर आपको अच्छा लग सकता है कि अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ-आईयूसीएन ने इसे लीस्ट कंसर्न श्रेणी में रखा है। यानि इनके जल्दी लुप्त होने का खतरा नहीं है। मगर छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में भी लगातार घटते जंगल, वन कटाई से इनकी जीने की क्षमता प्रभावित हो रही है।

बार नवापारा अभयारण्य को लेकर और बात करें तो यहां पहले से ही गौर, तेंदुआ, स्लॉथ बियर, चार सींगी हिरण, सांभर, चीतल और 250 से अधिक पक्षी प्रजातियों का ठिकाना है। ऐसे में जायंट मालाबार स्क्विरल की मौजूदगी यह बताती है कि छत्तीसगढ़ के जंगल अभी भी देश की महत्वपूर्ण जैव-विविधता धरोहरों में शामिल हैं।

टेबल के नीचे फसल लहलहा रही...

सरकार के कुछ मंत्रियों के पीए को लेकर काफी कुछ बातें हो रही हैं। कई को तो बदला भी जा चुका है। ऐसे ही भाजपा के अंदरूनी मामलों के एक जानकार ने फेसबुक पर एक मंत्री के पीए का फोटो पोस्ट किया है। पोस्ट में मंत्रीजी के पीए पर तंज कसते हुए लिखा है कि उनकी मेहनत की फसल टेबल के नीचे लहलहाती है। जैसे ही फसल पककर तैयार होती है, साहब दो-तीन महीने में अपना हिस्सा समेटते हैं, और सीधे गोवा उड़ जाते हैं। वहां भी बीच समंदर में खड़ी केसिनो जहाज में वे नोटों के ऐसे बीच बोते हैं कि पूछो ही मत। इस पोस्ट की पार्टी के अंदरखाने में काफी चर्चा हो रही है।


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