राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : नाम में क्या रक्खा है? बहुत कुछ...
20-Apr-2026 6:20 PM
राजपथ-जनपथ : नाम में क्या रक्खा है? बहुत कुछ...

नाम में क्या रक्खा है? बहुत कुछ...

ब्रिटिश राज के दौरान के भवनों, सडक़ों के नाम बदलने का क्रम जारी है। केंद्र सरकार ने पहले पीएम आवास और वहां जाने वाली सडक़ 9 रेस कोर्स का नाम बदला। अब यह लोक कल्याण मार्ग और निवास सेवा सदन कहलाता है। भले ही लोग बोलचाल में पीएम हाउस कहते हों। इसके बाद बारी आई केंद्रीय कार्यालय परिसरों नार्थ ब्लॉक, साऊथ ब्लॉक। जो अब एकीकृत रूप से कर्तव्य भवन के रूप में जाना जाता है। यह भवन जहां हैं उसे अंग्रेजियत भरा सेंट्रल विस्टा नाम दिया गया है! इसके बाद पिछले साल 25 दिसंबर को राज्यपाल निवास राजभवन को लोक भवन में बदला गया। अब तक देश के 28 राज्यों में यह नेम प्लेट बदला दिया गया है। राज्यों में तैनात गर्वनर्स के आवास को गर्वनर हाउस कहा जाता था। आजादी के बाद इन्हें राजभवन कहा जाने लगा।

बताया जाता है कि आजादी के बाद पहले गवर्नर जनरल सी राजगोपालाचारी ने इनका नाम राजभवन रखा, लेकिन इसका कोई रिकॉर्ड नहीं मिलता। किसने इन्हें राजभवन का नाम दिया था। फिर अब इन राजभवनों के नाम क्यों लोकभवन किए जा रहे हैं। इस बदलाव में क्या क्या बदलेगा।यह अब तक  स्पष्ट नहीं किया जा सका है। नाम बदलने का अधिकार केंद्रीय गृह विभाग को होता है।

अब इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए केंद्र सरकार अधिकारियों के निवास स्थल क्षेत्र सिविल लाइन्स और कैंटोनमेंट (छावनी )के नए नाम करण को लेकर भी कवायद कर रही है। आला अधिकारियों के ऐसे निवास क्षेत्र देश के हर बड़े मध्यम शहर में हैं।  गूगल सर्च में पता चलता है कि ये नाम भी 19 वीं सदी की शुरुआत में अंग्रेजों के जमाने से चले आ रहे हैं। कंटोनमेंट या छावनी किस जमाने का नाम है यह स्पष्ट नहीं है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अब ‘सिविल लाइंस’ का नाम बदलने का ज्यादा प्रभाव नहीं होगा, क्योंकि इन इलाकों की पहचान समय के साथ बदल चुकी है। हालांकि, सरकार का उद्देश्य औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकलकर भारतीय पहचान को मजबूत करना है।

जहां तक राजधानी रायपुर के सिविल लाइन में अब बड़े कलेक्टर एसपी जैसे बड़े अफसर रहते नहीं। इनके लिए आफिसर्स कालोनी देवेन्द्र नगर में नए बंगले हैं। अब सिविल लाइन में द्वितीय श्रेणी के दर्जन भर अफसर ही रहते हैं। यह इलाका अब सीएम हाउस का क्षेत्र कहलाने लगा है। छावनी सैन्य स्थल को कहा जाता रहा है। रायपुर में कंटोनमेंट तो नहीं है भिलाई में अवश्य छावनी क्षेत्र है। 

दूसरी ओर कुछ इसी तरह की भावना लिए हमारे गृहमंत्री प्रदेश दौरे के समय किसी भी सर्किट हाउस में गार्ड ऑफ ऑनर परेड की सलामी न लेने की घोषणा कर चुके हैं।

बंगाल के लिए यहां भी मेहनत

छत्तीसगढ़ भाजपा का पूरा संगठन इस बार पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पूरी ताकत झोंकता दिख रहा है। 23 और 29 अप्रैल को होने वाले मतदान के लिए जितनी सक्रियता दिख रही है, वैसी पहले किसी दूसरे राज्य के चुनाव में कम ही देखने को मिली थी।

प्रदेश के नेता करीब 55 विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव प्रबंधन संभाल रहे हैं। निगम-मंडलों के पदाधिकारी और कार्यकर्ता बीते तीन महीने से बंगाल में डटे हुए हैं, जहां बूथ स्तर तक रणनीति बनाई जा रही है।

खास बात यह है कि रायपुर दक्षिण के बंगाली मतदाताओं के जरिए भी चुनावी समीकरण साधे जा रहे हैं। डिप्टी सीएम विजय शर्मा यहां बंगाली परिवारों के साथ छोटी-छोटी बैठकें कर रहे हैं और उनसे बंगाल में अपने रिश्तेदारों को भाजपा के पक्ष में मतदान के लिए प्रेरित करने की अपील कर रहे हैं।

रायपुर दक्षिण में करीब 7 हजार बंगाली वोटर हैं, जिनके रिश्तेदार पश्चिम बंगाल के अलग-अलग जिलों में रहते हैं। ऐसे में यह नेटवर्क भी चुनावी रणनीति का हिस्सा बन गया है, जहां छत्तीसगढ़ से बैठकर बंगाल के बूथ तक नजर रखी जा रही है।

खरीफ की तैयारी को होर्मुज का झटका

देश के साथ-साथ छत्तीसगढ़ में जून-जुलाई से खरीफ फसलों की बोनी शुरू हो जाएगी। छत्तीसगढ़ की कृषि अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ा योगदान धान का है, जिसके लिए जरूरत पड़ती है भारी मात्रा में रासायनिक खाद की। खाद की मारामारी, कालाबाजारी हर साल दिखाई देती है मगर होर्मुज जलमार्ग में तनाव खत्म होते नजर नहीं आ रहा है और जिसका असर धान के उत्पादन पर पडऩे की आशंका है।

राज्यों की तरफ से हर साल रकबा के आधार पर उर्वरक की जरूरत के लिए केंद्र को प्रस्ताव भेजा जाता है। इसके आधार पर केंद्र उर्वरकों का आवंटन करता है। इस बार 15.55 लाख मीट्रिक टन की आपूर्ति छत्तीसगढ़ के लिए की गई है। सबसे अधिक आपूर्ति यूरिया की, करीब 7.25 लाख मीट्रिक टन, उसके बाद डीएपी की लगभग 3 लाख मीट्रिक टन होगी। बाकी अन्य उर्वरक है। 30 मार्च 2026 की स्थिति में राज्य के गोदामों और सहकारी समितियों में कुल 7.48 लाख मीट्रिक टन उर्वरक उपलब्ध है। यानि अभी जरूरत से सिर्फ आधी मात्रा में, लगभग 48 प्रतिशत ही उर्वरक उपलब्ध हैं। सरकार ने दावा किया है कि मई महीने में आपूर्ति बढ़ाई जाएगी और जून-जुलाई में जब किसानों को इसकी जरूरत होगी, उनकी मांग पूरी कर दी जाएगी। हालांकि अन्य वर्षों में, अप्रैल माह से आपूर्ति और भंडारण की शृंखला बढ़ा दी जाती है, पर इसे अब इस माह में सिर्फ 10 दिन बाकी हैं। छत्तीसगढ़ सहित खरीफ फसलों के पर निर्भर दूसरे राज्यों को दो ही परिस्थितियों से राहत मिल सकती है। यदि केंद्र को दूसरे देशों से समय पर पर्याप्त आपूर्ति हो जाए, जैसे रूस और मोरक्को। या फिर होर्मुज को लेकर आया दुनियाभर के जहाजों के परिवहन में आया संकट जल्दी खत्म हो जाए। यह व्यवधान लंबा खिंचा तो यह केवल किसान परिवारों की आमदनी का सवाल नहीं रह जाएगा। यह अन्न के संकट और बाजार की रौनक से जुड़ी चिंता भी है।

साबित कर दिया, मांसाहार पसंद है..

छत्तीसगढ़ ही नहीं पूरे देश में पश्चिम बंगाल में चल रहे विधानसभा चुनाव को बड़ी दिलचस्पी से देखा जा रहा है। मुख्यमंत्री ममता बेनर्जी ने पश्चिम बंगाल की संस्कृति और खान-पान को भाजपा के खिलाफ चुनाव प्रचार का मुद्दा बनाया है। वे मंचों से बार-बार कह रही हैं कि यदि यहां भाजपा की सरकार बनी तो मांस, मछली, अंडे पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा। देश के दूसरे कई हिस्सों की तरह नार्थ ईस्ट में भी मांसाहार खान-पान का अहम हिस्सा है। जब बेनर्जी बात कर रही हैं तो भाजपा को भी साबित करना जरूरी है कि वह भ्रम फैला रही हैं, लोगों को डरा रही हैं। नगालैंड सरकार में पर्यटन, संस्कृति और उच्च शिक्षा मंत्री तेंजम इम्ना एलांग ने इसी बात पर जोर देने के लिए एक फोटो, बेनर्जी की ऑडियो क्लिप के साथ शेयर की है। इसमें वे उनके समीप बैठे दूसरे साथी नॉन वेज खा रहे हैं। लिखा है... दीदी, बुरा न मानिए....हम भाजपा में हैं और मांसाहार हमारी पसंदीदा है।


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