राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : अदालतों में अहम सुनवाई
19-Apr-2026 5:14 PM
राजपथ-जनपथ : अदालतों में अहम सुनवाई

अदालतों में अहम सुनवाई

प्रदेश की राजनीति और प्रशासन से जुड़े कई चर्चित मामलों पर सोमवार को अहम सुनवाई तय है। बहुचर्चित सेक्स सीडी कांड में जिला अदालत में सुनवाई होगी। इस मामले में पूर्व मंत्री राजेश मूणत से जुड़ी कथित फर्जी सीडी प्रकरण में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, विनोद वर्मा, विजय भाटिया समेत अन्य आरोपी हैं।

सीबीआई की विशेष अदालत पहले भूपेश बघेल को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर चुकी है, लेकिन सेशन कोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को निरस्त करते हुए दोबारा ट्रायल के निर्देश दिए हैं। मामले की सुनवाई जज खिलेश्वरी सिन्हा की अदालत में होगी, जहां पूर्व सीएम की पेशी भी प्रस्तावित है।

उधर, बहुचर्चित रामअवतार जग्गी हत्याकांड में भी सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होगी। हाईकोर्ट द्वारा दोषी ठहराए गए पूर्व विधायक अमित जोगी ने फैसले के खिलाफ याचिका दायर की है। अगर सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिलती है, तो उन्हें सरेंडर करना पड़ सकता है। हाईकोर्ट ने उन्हें तीन सप्ताह के भीतर समर्पण का निर्देश दिया है, जिसकी मियाद 23 अप्रैल को पूरी हो रही है।

इसके अलावा निजी स्कूलों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में भी सुनवाई प्रस्तावित है। मुख्य न्यायाधीश की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है और आरटीई समेत कई मुद्दों पर राज्य सरकार को पहले भी फटकार लगा चुकी है।

चालान से चोर दिखा!

टेक्नॉलॉजी भी कई बार गजब का काम करती है। हैदराबाद में अभी एक आदमी का दुपहिया चोरी हो गया। पुलिस में दर्ज की गई रिपोर्ट पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, लेकिन कुछ दिनों में उसे अपनी गाड़ी का एक ट्रैफिक चालान मिला जिसमें गाड़ी चलाने वाले की चेहरा सहित फोटो भी थी। अब ट्रैफिक कैमरे ने तो ट्रैफिक नियम तोडऩे वाली गाड़ी का फोटो खींचा था, उसे चलाने वाला असली मालिक है, या खालिस चोर है, यह तो कैमरे को पता नहीं था। खैर, इस चालान की फोटो से दुपहिया मालिक को भी चोर के दर्शन हो गए, और पुलिस को भी। तीन महीने पहले चोरी गई दुपहिया का पता अब चालान से लगा, तो उसे ढूंढने के लिए इसके मालिक ने हैदराबाद पुलिस को टैग करते हुए ट्रैफिक चालान की फोटो पोस्ट की, और शायद एआई से उसे सुधारकर चेहरा और साफ दिखाते हुए एक दूसरी फोटो भी।

साड़ी पर घिरी सरकार

प्रदेश में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को घटिया यूनिफॉर्म (साड़ी) वितरण का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। करीब एक लाख से अधिक कार्यकर्ताओं में इसको लेकर नाराजगी देखी जा रही है।

मामले में महिला एवं बाल विकास विभाग और छत्तीसगढ़ खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड के बीच जिम्मेदारी को लेकर आरोप-प्रत्यारोप चल रहे हैं। बताते हैं कि साड़ी की सप्लाई बोर्ड के माध्यम से की गई थी, जबकि सप्लायर सूरजपुर के हैं, जो महिला बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े के विधानसभा क्षेत्र में आता है।

सीएम विष्णुदेव साय भी इस प्रकरण से नाराज बताए जा रहे हैं। मंत्री ने जिला परियोजना अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि खराब साडिय़ों को वापस लेकर एक सप्ताह के भीतर नई साड़ी उपलब्ध कराई जाए।

हालांकि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता इससे संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि यूनिफॉर्म उनकी कार्यप्रणाली का अहम हिस्सा है, इसलिए गुणवत्ता से समझौता नहीं होना चाहिए। कई कार्यकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि यदि बेहतर साड़ी उपलब्ध नहीं कराई जा सकती, तो यूनिफॉर्म की राशि सीधे उनके खातों में ट्रांसफर कर दी जाए।

मामले की जांच के लिए पांच सदस्यीय समिति गठित की गई है, लेकिन अब तक सप्लायर के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। अब सबकी नजर जांच रिपोर्ट पर टिकी हुई है।

कोंटा का मोंटू दिखा रहा है छत्तीसगढ़ की चूक

रायपुर, बिलासपुर और नवा रायपुर। ये तीन बड़े शहर भले ही स्मार्ट सिटी बन गए हों, लेकिन छत्तीसगढ़ इतना भर नहीं है। यह सरगुजा के जनकपुर से लेकर बस्तर के कोंटा तक फैला हुआ है। आपके सामने सुकमा के कोंटा से कुछ किलोमीटर दूर, ओडिशा के मोंटू गांव की एक तस्वीर है, वहां के सरकारी बस स्टैंड की। साफ-सुथरा परिसर, आराम करने की जगह, शुद्ध पानी और रिफ्रेशमेंट की दुकानें। यह तस्वीर दो राज्यों की सोच में फर्क की भी है।

सन् 2000 में जब छत्तीसगढ़ बना, तब तत्कालीन अजीत जोगी सरकार के शुरुआती फैसलों में राज्य परिवहन निगम पर ताला लगाना भी शामिल था। तर्क दिया गया, निगम भारी घाटे में है, सरकार पर बोझ है। लोगों ने तब भी समझ लिया था कि यह फैसला निजी ऑपरेटरों को फायदा पहुंचाने वाला है। सार्वजनिक परिवहन सरकार के हाथ से निकलने का मतलब था, उन इलाकों में बस सेवा का खत्म हो जाना, जहां पहुंच पहले से ही मुश्किल और मुनाफा न के बराबर है।

आज वही हो रहा है। बसें वहीं चलती हैं, जहां निजी ऑपरेटरों को कमाई दिखती है। आखिर वे भी किसी और व्यवसाय की तरह मुनाफे के लिए ही काम करते हैं, जनसेवा के लिए नहीं। भलाई करना सरकार का दायित्व है। इसी का नतीजा है कि बस्तर में निजी बस संचालकों ने हाथ खड़े कर दिए और सरकार को यहां के दूरस्थ क्षेत्रों में अनुदान देकर बसें चलवानी पड़ रही हैं।

बिलासपुर, रायपुर जैसे शहरों में नगर निगमों और स्थानीय निकायों के जिम्मे सार्वजनिक परिवहन को जिंदा रखना है, लेकिन हकीकत यह है कि वे इस जिम्मेदारी पर खरे नहीं उतर पाए। मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा हुआ है। जनहित याचिका पर सुनवाई हो रही है। बैटरी वाली गाड़ी आने की बात की जा रही है। मगर पिछले तीन साल से आई नहीं। हर बार सरकार समय मांग लेती है।

अब पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, और आगे भी बढऩे की आशंका है। ऐसे में दुरुस्त सार्वजनिक परिवहन कोई विकल्प नहीं, जरूरत है। किसी ग्रामीण को 100-150 किलोमीटर दूर जिला मुख्यालय तक जाने में कितना खर्च करना पड़ता होगा, अंदाजा लगाएं? शहरों में भी एक कोने से दूसरे कोने तक जाने के लिए रिक्शों का किराया लोगों पर भारी पड़ रहा है।

तो परिवहन विभाग के मंत्री का काम क्या सिर्फ परमिट और लाइसेंस से मिलने वाले राजस्व पर नजर रखना भर रह गया है? या फिर आम आदमी की सस्ती और सुलभ आवाजाही भी उनकी जिम्मेदारी में शामिल है?


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