राजपथ - जनपथ

राजपथ-जनपथ : मुसीबत- फेल हो तो शादी, पास हो तब भी
13-Apr-2026 6:22 PM
राजपथ-जनपथ : मुसीबत- फेल हो तो शादी, पास हो तब भी

मुसीबत- फेल हो तो शादी, पास हो तब भी

छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल द्वारा आयोजित 10वीं बोर्ड परीक्षा में 3 लाख 23 हजार से अधिक विद्यार्थी शामिल हुए। अब उत्तर पुस्तिकाओं की जांच चल रही है और रिजल्ट का इंतजार किया जा रहा है। उत्तर पुस्तिकाओं की जांच के दौरान पता चल रहा है कि जो लोग अपने उत्तीर्ण होने को लेकर सशंकित हैं, उन्होंने जवाब की जगह और भी कुछ-कुछ लिख डाला है। एक ने पूरी हनुमान चालीसा लिख डाली। किसी ने लिखा कि मुझे उत्तीर्ण कर दो तो 33 करोड़ देवी देवताओं का आपको आशीर्वाद मिलेगा।

मगर, कुछ मार्मिक पंक्तियां भी देखने को मिली हैं, मार्मिक ही नहीं हमारे सामाजिक विडंबना का आईना भी है। कॉपी जांचने वाले शिक्षकों की मानें तो एक छात्रा ने लिखा कि इस बोर्ड एग्जाम के तुरंत बाद मेरी शादी होने वाली है, आशीर्वाद स्वरूप मुझे पास कर दीजिए। इसके विपरीत, दूसरी छात्रा ने लिखा है कि सर, मुझे पास कर दीजिए, केवल पासिंग मार्क्स, 33 फीसदी। वरना घर वाले मेरी शादी कर देंगे। उपरोक्त दोनों ही स्थितियों में शादी ही कॉमन फैक्टर है। मगर, परिस्थितियां अलग-अलग हैं। पहली छात्रा मान चुकी है कि उसे 10वीं के बाद शादी करनी है। वह शादी करने के लिए उत्सुक है, बस अपने साथ वह 10वीं पास का मेडल रखना चाहती है। वह खुशी-खुशी शादी के लिए राजी है या माता-पिता का दबाव है यह साफ नहीं है। दूसरी छात्रा शादी के नाम से डर रही है। उसे लग रहा है कि यदि वह पास नहीं हुई तो उसे बस शादी के काबिल समझा जाएगा, आगे पढऩे के लायक नहीं। लगता है, यही है हमारे समाज का वातावरण। 10वीं बोर्ड में पास या फेल होना अंतिम सत्य नहीं है। उच्च शिक्षा और कौशल से भविष्य बनाने के लिए यह नाकाफी है। फेल होने वालों को भी अवसर मिलता रहता है, पर माता-पिता पहले से तय कर लेते हैं कि बच्चियों के सारे सपने एक किनारे रखो, शादी कर दो और जिम्मेदारी से मुक्त हो जाओ। पिछले कुछ समय से एग्जाम फियर से बचाने के लिए बच्चों की काउंसलिंग की जाती है, हेल्पलाइन नंबर जारी किए जाते हैं। शायद यह जरूरी है कि इसमें अभिभावकों को भी जोडऩा चाहिए। उनसे पूछा जाए कि दसवीं में बेटी या बेटा, फेल हो या पास, उसके लिए आपने क्या सोच रखा है?

नाम में क्या रखा है...

महान साहित्यकार विलियम शेक्सपियर की प्रसिद्ध उक्ति कि नाम में क्या रखा है...हमेशा चर्चा में रही है। सामान्य धारणा यही है कि किसी व्यक्ति की असली पहचान उसके गुणों और कर्मों से होती है, लेकिन व्यावहारिक जीवन में नाम और उसके उच्चारण की अपनी अहमियत भी सामने आ जाती है।

ऐसे ही नाम को लेकर नितिन नबीन इन दिनों चर्चा में हैं। उच्चारण और लिखावट की सहजता को ध्यान में रखते हुए अब वे नितिन नबीन की जगह ‘नितिन नवीन’ कहलाने लगे हैं।

बताते हैं कि भाजपा मुख्यालय से राज्यों के मीडिया सेल को निर्देश दिए गए हैं कि राष्ट्रीय अध्यक्ष के उपनाम ‘नबीन’ के स्थान पर ‘नवीन’ लिखा जाए।

नवीन, राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से पहले छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रभारी रह चुके हैं और फिलहाल भी यह जिम्मेदारी उनके पास है। वे लंबे समय तक अपने नाम के साथ ‘नबीन’ ही लिखते आए हैं। दरअसल, बिहार और भोजपुरी में ‘व’ की जगह ‘ब’ के प्रयोग का चलन है, जिसके चलते ‘नवीन’ का उच्चारण ‘नबीन’ के रूप में प्रचलित रहा।

जब वे छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रभारी सचिव बने, तब यहां मीडिया में उन्हें ‘नितिन नवीन’ लिखा जाने लगा था। बाद में पार्टी के मीडिया सेल ने स्पष्ट किया कि वे स्वयं ‘नबीन’ लिखते हैं। अब राष्ट्रीय राजनीति में सक्रियता और दिल्ली की बोलचाल की सहजता को देखते हुए ‘नवीन’ लिखने की शुरुआत हो गई है।

 वीआरएस रोकने नई पहल ....

चर्चा है कि भविष्य में आयकर अधिकारियों खासकर आईआरएस अफसरों को एक सामान्य प्रचलित प्रक्रिया के तहत स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) नहीं मिलने वाली।

सरकार बिना उचित जांच-पड़ताल के किसी भी वीआरएस आवेदन को मंजूरी नहीं देगी। इस जांच में अफसर की सेवा अवधि भी शामिल होगी। बताया जा रहा है कि आयकर विभाग को औसतन हर साल वीआरएस के 20आवेदन मिलते हैं, लेकिन सूत्रों का कहना है कि अब  सरकार द्वारा ऐसे आवेदन की मंजूरी दिए जाने की संभावना कम ही है।

हम इस कालम में पहले भी बताते रहे हैं आयकर विभाग में वीआरएस की संख्या बढ़ती जा रही है। खासकर बीते एक दशक में अधिक ही रहा है। साल 2014 से 25 तक कुल 853 आईआरएस ने वीआरएस लिया था। इसके पीछे इस सर्विस का अब हाईप्रोफाइल न होने के साथ फेसलेस इंक्वायरी, सर्वे और रेड में लोकल कमिश्नरी के बजाय दूसरे सर्किल को जिम्मेदारी आदि आदि। इसका असर इंस्पेक्टर राज की समाप्ति पर भी पड़ा है। वीआरएस की बढ़ती संख्या को देखते हुए वित्त मंत्रालय ने गृह मंत्रालय को इंटर डिपार्टमेंटल नोट भेजा है कि अब डीआरआई की तरह सीबीआई, ईडी में भी आईआरएस अफसरों की नियुक्ति की जाए। चूंकि इन एजेंसियों का भी समकक्ष  काम है ऐसे में इन्फोर्समेंट में मदद भी मिलेगा। और जांच की क्वालिटी में भी पुलिसिया नजर के इतर सुधार आएगा। अब देखना होगा कि गृह मंत्रालय इस पर क्या और कब निर्णय लेता है।

99 पैसे वाली कहानी

बाटा एक ऐसा नाम है जिसने भारत में जूतों की दुनिया को एक अलग पहचान दी। बाटा ने भारत में 1931 में कदम रखा था। उस समय इसका नाम क्चस्ष्ट बाटा शू कम्पनी था, जो बाद में 1973 में बदलकर केवल बाटा रह गया। धीरे-धीरे यह नाम इतना लोकप्रिय हो गया कि जूते का मतलब ही बहुत लोगों के लिए बाटा हो गया।

बाटा की पहचान दो बातों के कारण सबसे ज्यादा बनी, पहली उसकी बेजोड़ मजबूती और दूसरी उसकी अनोखी कीमत।

उस दौर के लोग बताते हैं कि बाटा का जूता पहनते-पहनते आदमी बोर हो जाता था, लेकिन जूता न टूटता था और न ही जल्दी खराब होता था। आज की तरह ‘सीजनल फैशन’ नहीं था। एक बार जूता खरीद लिया तो सालों तक साथ निभाता था। घर में जब नया जूता खरीदने की बात आती तो बुजुर्ग अक्सर कहते थे, बाटा ले लो, टिकाऊ रहेगा।

अब बात करते हैं उसकी कीमत की, जो अपने आप में एक अलग कहानी है।

मुझे आज भी 80 के दशक की वह बात याद है। उस समय हवाई चप्पल—जिसे हमारे छत्तीसगढ़ के गांवों में प्यार से ‘चट्टी’ कहा जाता है, की कीमत होती थी 12 रुपये 99 पैसे। चप्पल पहनकर चलने पर पैर से चट-चट की आवाज आती थी, इसलिए गांव में उसका नाम ही चट्टी पड़ गया।

दूसरे जूतों की कीमत होती थी 44 रुपये 99 पैसे। लोग बड़े आश्चर्य से पूछते थे, भाई, ये 99 पैसे का क्या चक्कर है ? सीधे-सीधे 13 रुपये या 45 रुपये क्यों नहीं रखते?

लेकिन बाटा की यही शैली थी। दुकान से जूता खरीदते समय बिल भी ठीक 12 रुपये 99 पैसे का बनता था। यदि ग्राहक 13 रुपये देता तो दुकानदार बाकायदा एक नया पैसा वापस भी करता था। उस समय वह एक पैसा भी बड़ी कीमत रखता था।

वैसे उस दौर में बाजार में विकल्प भी बहुत कम थे। बाटा और करोना के अलावा हवाई चप्पल की ज्यादा कंपनियां दिखाई नहीं देती थीं। गांवों में अक्सर शिक्षक, पटवारी और ग्राम सेवक जैसे सरकारी कर्मचारी ही बाटा की हवाई चप्पल पहनते दिखते थे, क्योंकि उस समय बारह रुपये भी कम रकम नहीं मानी जाती थी। आज जमाना बदल गया है। बाजार में दर्जनों कंपनियां हैं और हवाई चप्पल तो अब फुटपाथ तक पर मिल जाती है। लेकिन उस दौर के लोगों के लिए बाटा सिर्फ एक जूता नहीं, भरोसे का नाम था। ऐसा जूता जो सालों साथ निभाए, और ऐसी कीमत जो 99 पैसे के साथ भी लोगों की यादों में बस जाए।

सच कहें तो मजबूती और कीमत की यह छोटी-सी ‘99 पैसे वाली कहानी’ ही बाटा को उस समय की यादों में आज भी जिंदा रखे हुए है।


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